आल-इमरान · 106/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
يَوْمَ تَبْيَضُّ وُجُوهٌ وَتَسْوَدُّ وُجُوهٌ ۚ فَأَمَّا الَّذِينَ اسْوَدَّتْ وُجُوهُهُمْ أَكَفَرْتُم بَعْدَ إِيمَانِكُمْ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ ۝١٠٦
Yawma tabyaddu wujoohunw wa taswaddu wujooh; faammal lazeenas waddat wujoohum akafartum ba`da eemaanikum fazooqul `azaaba bimaa kuntum takfuroon
📖 हिंदी अर्थ
(उस दिन से डरो) जिस दिन कुछ लोगों के चेहरे तो सफैद नूरानी होंगे और कुछ (लोगो) के चेहरे सियाह जिन लोगों के मुहॅ में कालिक होगी (उनसे कहा जायेगा) हाए क्यों तुम तो ईमान लाने के बाद काफ़िर हो गए थे अच्छा तो (लो) (अब) अपने कुफ़्र की सज़ा में अज़ाब (के मजे) चखो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَبْيَضُّ وُجُوهٌ: चेहरे सफेद (रोशन) होंगे — यह खुशी, सुरूर और नूर की निशानी है।
  • تَسْوَدُّ وُجُوهٌ: चेहरे काले होंगे — यह रुसवाई, ग़म और अंधेरे की निशानी है।
  • أَكَفَرْتُم: क्या तुमने कुफ्र (इनकार) किया?
  • فَذُوقُوا: तो चखो (अज़ाब का मज़ा चखो)।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत क़ियामत के उस महान दिन का मंज़र पेश करती है जब अल्लाह तआला अपने बंदों का हिसाब लेगा। उस दिन लोगों के चेहरे उनके ईमान और अमल के हिसाब से बदल जाएँगे। जिन लोगों ने दुनिया में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ पर ईमान लाया, उनकी नेकियों पर अमल किया, और अल्लाह के अहकाम की पैरवी की — उनके चेहरे सफेद और रोशन होंगे, जैसे चाँद चमकता है। यह सफेदी खुशी, सुकून और अल्लाह की रहमत की निशानी होगी। उनके चेहरों पर नूर होगा और वे जन्नत की तरफ बढ़ेंगे।

इसके विपरीत, जिन लोगों ने अल्लाह के रसूलों को झुठलाया, उसकी आयतों से मुँह मोड़ा, और गुनाहों में डूबे रहे — उनके चेहरे काले और उदास होंगे। उनके चेहरों पर रुसवाई और शर्मिंदगी के निशान साफ दिखेंगे। यह कालापन उनके कुफ्र और नाफ़रमानी का नतीजा होगा।

फिर अल्लाह तआला फरमाता है कि जिन लोगों के चेहरे काले होंगे, उनसे पूछा जाएगा: "क्या तुमने ईमान लाने के बाद कुफ्र किया?" — यानी जब तुमने अल्लाह के साथ ईमान का अहद किया था, उसकी रुबूबियत का इक़रार किया था, तो फिर तुमने उसे तोड़कर कुफ्र और शिर्क का रास्ता क्यों चुना? यह सवाल उन्हें शर्मिंदा करने और उनकी गलती याद दिलाने के लिए होगा। उस दिन उनसे कहा जाएगा: "अब चखो अज़ाब का मज़ा — यह उस कुफ्र की सज़ा है जो तुम दुनिया में करते रहे।"


दावती पहलू (नसीहत):

यह आयत हमारे लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी और नसीहत है। यह हमें बताती है कि आज की ज़िंदगी में हम जो भी कर रहे हैं, उसका नतीजा क़ियामत के दिन हमारे चेहरे पर ज़ाहिर होगा। अगर हम आज ईमान, नमाज़, रोज़ा, सच्चाई और नेकी का रास्ता अपनाएँ, तो उस दिन हमारे चेहरे रोशन होंगे और हम जन्नत के हक़दार बनेंगे। लेकिन अगर हम गुनाह, कुफ्र और नाफ़रमानी में जीवन बिताएँ, तो उस दिन हमारे चेहरे काले होंगे और हमें शर्मिंदगी और अज़ाब का सामना करना पड़ेगा।

तो आओ, हम अपनी ज़िंदगी को संवारें, अल्लाह की इबादत को अपनी आदत बनाएँ, और उसके रसूल ﷺ की सुन्नत पर चलें। याद रखें, आज का हर अमल कल के चेहरे की रोशनी या अंधेरे का ज़रिया बनेगा। अल्लाह हमें उन लोगों में शामिल करे जिनके चेहरे उस दिन सफेद और रोशन होंगे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 104-108 — आल-इमरान

104وَلْتَكُن مِّنكُمْ أُمَّةٌ يَدْعُونَ إِلَى الْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
और तुमसे एक गिरोह ऐसे (लोगों का भी) तो होना चाहिये जो (लोगों को) नेकी की तरफ़ बुलाए अच्छे काम का हुक्म दे और बुरे कामों से रोके और ऐसे ही लोग (आख़ेरत में) अपनी दिली मुरादें पायेंगे
105وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَاخْتَلَفُوا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ ۚ وَأُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ
और तुम (कहीं) उन लोगों के ऐसे न हो जाना जो आपस में फूट डाल कर बैठ रहे और रौशन (दलील) आने के बाद भी एक मुंह एक ज़बान न रहे और ऐसे ही लोगों के वास्ते बड़ा (भारी) अज़ाब है
106يَوْمَ تَبْيَضُّ وُجُوهٌ وَتَسْوَدُّ وُجُوهٌ ۚ فَأَمَّا الَّذِينَ اسْوَدَّتْ وُجُوهُهُمْ أَكَفَرْتُم بَعْدَ إِيمَانِكُمْ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
(उस दिन से डरो) जिस दिन कुछ लोगों के चेहरे तो सफैद नूरानी होंगे और कुछ (लोगो) के चेहरे सियाह जिन लोगों के मुहॅ में कालिक होगी (उनसे कहा जायेगा) हाए क्यों तुम तो ईमान लाने के बाद काफ़िर हो गए थे अच्छा तो (लो) (अब) अपने कुफ़्र की सज़ा में अज़ाब (के मजे) चखो
107وَأَمَّا الَّذِينَ ابْيَضَّتْ وُجُوهُهُمْ فَفِي رَحْمَةِ اللَّهِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
और जिनके चेहरे पर नूर बरसता होगा वह तो ख़ुदा की रहमत(बहिश्त) में होंगे (और) उसी में सदा रहेंगे
108تِلْكَ آيَاتُ اللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِالْحَقِّ ۗ وَمَا اللَّهُ يُرِيدُ ظُلْمًا لِّلْعَالَمِينَ
(ऐ रसूल) ये ख़ुदा की आयतें हैं जो हम तुमको ठीक (ठीक) पढ़ के सुनाते हैं और ख़ुदा सारे जहॉन के लोगों (से किसी) पर जुल्म करना नहीं चाहता
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अनुवाद — आल-इमरान 106

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Tuesday, August 18, 2026

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