आल-इमरान · 158/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلَئِن مُّتُّمْ أَوْ قُتِلْتُمْ لَإِلَى اللَّهِ تُحْشَرُونَ ۝١٥٨
Wa la`im muttum `aw qutiltumla ilal laahi tuhsharoon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर तुम (अपनी मौत से) मरो या मारे जाओ (आख़िरकार) ख़ुदा ही की तरफ़ (क़ब्रों से) उठाए जाओगे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُتُّمْ: तुम मर गए (स्वाभाविक मृत्यु)।
  • قُتِلْتُمْ: तुम मारे गए (युद्ध या किसी अन्य कारण से शहीद हुए)।
  • تُحْشَرُونَ: तुम इकट्ठे किए जाओगे (हश्र के दिन उठाए जाओगे)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मुसलमानों को सांत्वना और चेतावनी देते हुए फ़रमाता है कि चाहे तुम अपने बिस्तरों पर प्राकृतिक मौत मरो, या युद्ध के मैदान में शहीद होकर मारे जाओ, अंततः तुम सबको एक ही स्थान पर एकत्र होना है। मौत का तरीक़ा चाहे जो भी हो, अंजाम सबका एक ही है—अल्लाह की ओर लौटना। वहाँ तुम्हें तुम्हारे सभी कर्मों का हिसाब दिया जाएगा, और तुम्हारे अच्छे या बुरे कामों के अनुसार तुम्हें बदला मिलेगा। यह बात इसलिए कही गई ताकि मुसलमानों को युद्ध से पीछे हटने या मौत से डरने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि मौत किसी भी हालत में आनी है, और अल्लाह के पास ही सबको जाना है। जो लोग अल्लाह की राह में लड़ते हुए मरते हैं, वे शहीद हैं और उनका अज्र अल्लाह के पास महान है, और जो अपनी मौत मरते हैं, वे भी अल्लाह की रहमत के मोहताज हैं। दोनों ही सूरतों में अल्लाह की ओर ही पलटना है, इसलिए मौत के डर से ईमान और जिहाद जैसे अफ़ज़ल कामों को नहीं छोड़ना चाहिए।

फ़ायदे (सबक़):

  1. मौत की हक़ीक़त: यह आयत हमें सिखाती है कि मौत से भागना बेकार है, क्योंकि चाहे हम किसी भी हाल में मरें, हमें अल्लाह के सामने हाज़िर होना ही है। यह यक़ीन इंसान को बहादुर बनाता है और उसे अल्लाह की राह में कुर्बानी के लिए तैयार करता है।
  2. हश्र का विश्वास: इस आयत से हमें आख़िरत के दिन पर ईमान मज़बूत होता है, कि हमारे सारे कर्म दर्ज हैं और हमें उनका हिसाब देना है। यह विश्वास इंसान को नेक कामों की तरफ़ राग़िब करता है और गुनाहों से बचाता है।
  3. शहादत की फ़ज़ीलत: जब मुसलमान जानता है कि मरना या मारा जाना दोनों ही अल्लाह की ओर ले जाते हैं, तो वह अल्लाह की राह में जिहाद से पीछे नहीं हटता। शहीद की मौत को मौत नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत का ज़रिया समझा जाता है, जो इस्लाम की तालीमात में बड़ी तरग़ीब है।
  4. अल्लाह पर भरोसा: यह आयत मुसलमान को सिखाती है कि हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखे, क्योंकि उसी की तरफ़ लौटना है। यह भरोसा इंसान के दिल को सुकून देता है और उसे दुनिया के दुख-दर्द से बेपरवाह बनाता है।
  5. अमल की अहमियत: चूँकि हमें अल्लाह के सामने हाज़िर होकर अपने कर्मों का हिसाब देना है, इसलिए हर पल नेक अमल करने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि उस दिन हमारा पलड़ा भारी हो और हम कामयाबी पाएँ।
🎧 सुनें

📜 आयत 156-160 — आल-इमरान

156يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ كَفَرُوا وَقَالُوا لِإِخْوَانِهِمْ إِذَا ضَرَبُوا فِي الْأَرْضِ أَوْ كَانُوا غُزًّى لَّوْ كَانُوا عِندَنَا مَا مَاتُوا وَمَا قُتِلُوا لِيَجْعَلَ اللَّهُ ذَٰلِكَ حَسْرَةً فِي قُلُوبِهِمْ ۗ وَاللَّهُ يُحْيِي وَيُمِيتُ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
ऐ ईमानदारों उन लोगों के ऐसे न बनो जो काफ़िर हो गए भाई बन्द उनके परदेस में निकले हैं या जेहाद करने गए हैं (और वहॉ) मर (गए) तो उनके बारे में कहने लगे कि वह हमारे पास रहते तो न मरते ओर न मारे जाते (और ये इस वजह से कहते हैं) ताकि ख़ुदा (इस ख्याल को) उनके दिलों में (बाइसे) हसरत बना दे और (यूं तो) ख़ुदा ही जिलाता और मारता है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उसे देख रहा है
157وَلَئِن قُتِلْتُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَوْ مُتُّمْ لَمَغْفِرَةٌ مِّنَ اللَّهِ وَرَحْمَةٌ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
और अगर तुम ख़ुदा की राह में मारे जाओ या (अपनी मौत से) मर जाओ तो बेशक ख़ुदा की बख्शिश और रहमत इस (माल व दौलत) से जिसको तुम जमा करते हो ज़रूर बेहतर है
158وَلَئِن مُّتُّمْ أَوْ قُتِلْتُمْ لَإِلَى اللَّهِ تُحْشَرُونَ
और अगर तुम (अपनी मौत से) मरो या मारे जाओ (आख़िरकार) ख़ुदा ही की तरफ़ (क़ब्रों से) उठाए जाओगे
159فَبِمَا رَحْمَةٍ مِّنَ اللَّهِ لِنتَ لَهُمْ ۖ وَلَوْ كُنتَ فَظًّا غَلِيظَ الْقَلْبِ لَانفَضُّوا مِنْ حَوْلِكَ ۖ فَاعْفُ عَنْهُمْ وَاسْتَغْفِرْ لَهُمْ وَشَاوِرْهُمْ فِي الْأَمْرِ ۖ فَإِذَا عَزَمْتَ فَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَوَكِّلِينَ
(तो ऐ रसूल ये भी) ख़ुदा की एक मेहरबानी है कि तुम (सा) नरमदिल (सरदार) उनको मिला और तुम अगर बदमिज़ाज और सख्त दिल होते तब तो ये लोग (ख़ुदा जाने कब के) तुम्हारे गिर्द से तितर बितर हो गए होते पस (अब भी) तुम उनसे दरगुज़र करो और उनके लिए मग़फेरत की दुआ मॉगो और (साबिक़ दस्तूरे ज़ाहिरा) उनसे काम काज में मशवरा कर लिया करो (मगर) इस पर भी जब किसी काम को ठान लो तो ख़ुदा ही पर भरोसा रखो (क्योंकि जो लोग ख़ुदा पर भरोसा रखते हैं ख़ुदा उनको ज़रूर दोस्त रखता है
160إِن يَنصُرْكُمُ اللَّهُ فَلَا غَالِبَ لَكُمْ ۖ وَإِن يَخْذُلْكُمْ فَمَن ذَا الَّذِي يَنصُرُكُم مِّن بَعْدِهِ ۗ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ
(मुसलमानों याद रखो) अगर ख़ुदा ने तुम्हारी मदद की तो फिर कोई तुमपर ग़ालिब नहीं आ सकता और अगर ख़ुदा तुमको छोड़ दे तो फिर कौन ऐसा है जो उसके बाद तुम्हारी मदद को खड़ा हो और मोमिनीन को चाहिये कि ख़ुदा ही पर भरोसा रखें
आल-इमरानकुरान सूची
200आयत
मदनीRevelation
158आयत

अनुवाद — आल-इमरान 158

सूरा आल-इमरान आयत 158 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और अगर तुम (अपनी मौत से) मरो या मारे जाओ…

सूरा आयत 158/200 — आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: आल-इमरान सुनें, आल-इमरान अनुवाद, आल-इमरान mp3, आल-इमरान pdf. आयत 156–160. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए