आल-इमरान · 22/200
अनुवाद उच्चारण — सूरा आल-इमरान
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ وَمَا لَهُم مِّن نَّاصِرِينَ ۝٢٢
Ulaaa`ikal lazeena habitat a`maaluhum fid dunyaa wal Aaakhirati wa maa lahum min naasireen
📖 हिंदी अर्थ
यही वह (बदनसीब) लोग हैं जिनका सारा किया कराया दुनिया और आख़ेरत (दोनों) में अकारत गया और कोई उनका मददगार नहीं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حَبِطَتْ (हबितत) – बेकार हो गईं, नष्ट हो गईं, उनका कोई फल न रहा।
  • أَعْمَالُهُمْ (आ'मालुहुम) – उनके कर्म, उनके अच्छे काम।
  • نَّاصِرِينَ (नासिरीन) – मददगार, सहायक, रक्षक।

तफ़सीर (व्याख्या):

ये वे लोग हैं जिनके सारे अच्छे कर्म और नेकियाँ इस दुनिया और आख़िरत दोनों में बेकार और नष्ट हो गईं। उनके किए हुए कामों का कोई फल उन्हें नहीं मिलेगा, क्योंकि उन्होंने अल्लाह पर ईमान नहीं लाया और उसके दीन को नकार दिया। उनके अच्छे काम, चाहे वे दिखने में कितने ही भले क्यों न हों, अल्लाह की दृष्टि में उनका कोई मूल्य नहीं रखते, क्योंकि उनकी नींव ही ईमान और सच्ची नीयत पर नहीं टिकी थी।

दुनिया में उनके कर्मों का फल यह हुआ कि उन्हें न तो अल्लाह की रहमत मिली और न ही उनके कामों में बरकत हुई। आख़िरत में तो उन्हें कोई बचाव नहीं मिलेगा। जब अल्लाह का अज़ाब आएगा, तो उन्हें बचाने वाला कोई नहीं होगा। न कोई दोस्त, न कोई रिश्तेदार, न कोई शक्तिशाली व्यक्ति उनकी मदद कर सकेगा। वे पूरी तरह अकेले और बेसहारा होंगे, और अल्लाह की पकड़ से उन्हें कोई छुटकारा नहीं दे सकेगा।


फ़ायदे (सबक):

  1. ईमान ही कर्मों की स्वीकृति की शर्त है: यह आयत सिखाती है कि अच्छे कर्म तभी अल्लाह के यहाँ क़बूल होते हैं जब उनके साथ सच्चा ईमान और सही नीयत हो। बिना ईमान के किए गए कर्म, चाहे कितने ही बड़े क्यों न हों, आख़िरत में किसी काम नहीं आएँगे।
  2. अल्लाह की पकड़ से बचाने वाला कोई नहीं: यह आयत हमें याद दिलाती है कि अल्लाह के अज़ाब से बचाने वाला कोई नहीं है। इसलिए हमें केवल अल्लाह की राह पर चलना चाहिए और उसकी नाराज़गी से बचना चाहिए।
  3. कर्मों की नींव ईमान पर होनी चाहिए: जिस तरह एक इमारत की नींव मज़बूत होनी चाहिए, उसी तरह हमारे सारे कर्मों की नींव ईमान और अल्लाह के प्रति समर्पण पर होनी चाहिए। यही वह चीज़ है जो हमारे कर्मों को अल्लाह के यहाँ मूल्यवान बनाती है।
  4. अल्लाह की रहमत की ओर लौटने की प्रेरणा: यह आयत हमें सचेत करती है कि अगर हमारे कर्म ईमान के बिना हैं, तो हमें जल्दी से जल्दी अल्लाह की ओर लौटना चाहिए, ताकि हमारे कर्म बेकार न जाएँ और हम आख़िरत में कामयाब हों।


📜 आयत 20-24 — सूरा आल-इमरान

20فَإِنْ حَاجُّوكَ فَقُلْ أَسْلَمْتُ وَجْهِيَ لِلَّهِ وَمَنِ اتَّبَعَنِ ۗ وَقُل لِّلَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ وَالْأُمِّيِّينَ أَأَسْلَمْتُمْ ۚ فَإِنْ أَسْلَمُوا فَقَدِ اهْتَدَوا ۖ وَّإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُ ۗ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِالْعِبَادِ
(ऐ रसूल) पस अगर ये लोग तुमसे (ख्वाह मा ख्वाह) हुज्जत करे तो कह दो मैंने ख़ुदा के आगे अपना सरे तस्लीम ख़म कर दिया है और जो मेरे ताबे है (उन्होंने) भी) और ऐ रसूल तुम अहले किताब और जाहिलों से पूंछो कि क्या तुम भी इस्लाम लाए हो (या नही) पस अगर इस्लाम लाए हैं तो बेख़टके राहे रास्त पर आ गए और अगर मुंह फेरे तो (ऐ रसूल) तुम पर सिर्फ़ पैग़ाम (इस्लाम) पहुंचा देना फ़र्ज़ है (बस) और ख़ुदा (अपने बन्दों) को देख रहा है
21إِنَّ الَّذِينَ يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ النَّبِيِّينَ بِغَيْرِ حَقٍّ وَيَقْتُلُونَ الَّذِينَ يَأْمُرُونَ بِالْقِسْطِ مِنَ النَّاسِ فَبَشِّرْهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
बेशक जो लोग ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते हैं और नाहक़ पैग़म्बरों को क़त्ल करते हैं और उन लोगों को (भी) क़त्ल करते हैं जो (उन्हें) इन्साफ़ करने का हुक्म करते हैं तो (ऐ रसूल) तुम उन लोगों को दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी दे दो
22أُولَٰئِكَ الَّذِينَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ وَمَا لَهُم مِّن نَّاصِرِينَ
यही वह (बदनसीब) लोग हैं जिनका सारा किया कराया दुनिया और आख़ेरत (दोनों) में अकारत गया और कोई उनका मददगार नहीं
23أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِّنَ الْكِتَابِ يُدْعَوْنَ إِلَىٰ كِتَابِ اللَّهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ وَهُم مُّعْرِضُونَ
(ऐ रसूल) क्या तुमने (उलमाए यहूद) के हाल पर नज़र नहीं की जिनको किताब (तौरेत) का एक हिस्सा दिया गया था (अब) उनको किताबे ख़ुदा की तरफ़ बुलाया जाता है ताकि वही (किताब) उनके झगड़ें का फैसला कर दे इस पर भी उनमें का एक गिरोह मुंह फेर लेता है और यही लोग रूगरदानी (मुँह फेरने) करने वाले हैं
24ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا لَن تَمَسَّنَا النَّارُ إِلَّا أَيَّامًا مَّعْدُودَاتٍ ۖ وَغَرَّهُمْ فِي دِينِهِم مَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ
ये इस वजह से है कि वह लोग कहते हैं कि हमें गिनती के चन्द दिनों के सिवा जहन्नुम की आग हरगिज़ छुएगी भी तो नहीं जो इफ़तेरा परदाज़ी ये लोग बराबर करते आए हैं उसी ने उन्हें उनके दीन में भी धोखा दिया है
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अनुवाद — आल-इमरान 22

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Monday, September 28, 2026

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