आल-इमरान · 23/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِّنَ الْكِتَابِ يُدْعَوْنَ إِلَىٰ كِتَابِ اللَّهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ وَهُم مُّعْرِضُونَ ۝٢٣
Alam tara ilal lazeena ootoo naseebam minal Kitaabi yud`awna ilaa Kitaabil laahi liyahkuma bainahum summa yatawallaa fareequm minhum wa hum mu`ridoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) क्या तुमने (उलमाए यहूद) के हाल पर नज़र नहीं की जिनको किताब (तौरेत) का एक हिस्सा दिया गया था (अब) उनको किताबे ख़ुदा की तरफ़ बुलाया जाता है ताकि वही (किताब) उनके झगड़ें का फैसला कर दे इस पर भी उनमें का एक गिरोह मुंह फेर लेता है और यही लोग रूगरदानी (मुँह फेरने) करने वाले हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَصِيبًا – हिस्सा, भाग
  • يُدْعَوْنَ – उन्हें बुलाया जाता है
  • لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ – ताकि वह उनके बीच फैसला करे
  • يَتَوَلَّى – मुँह मोड़ लेता है
  • مُعْرِضُونَ – किनारा करने वाले, उपेक्षा करने वाले

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! क्या आपने उन लोगों की हालत पर ग़ौर नहीं किया, जिन्हें किताब (तौरात) से एक हिस्सा दिया गया था? वे जानते थे कि आपके द्वारा लाया गया धर्म सत्य है, क्योंकि उनकी अपनी किताब में इसकी भविष्यवाणी मौजूद थी। उन्हें अल्लाह की किताब (क़ुरआन या तौरात) की ओर बुलाया जाता है ताकि वह उनके आपसी विवादों में उनके बीच फैसला करे। लेकिन जब उन्हें सच्चाई की ओर बुलाया जाता है, तो उनमें से एक गिरोह — ख़ासकर उनके विद्वान और नेता — मुँह मोड़ लेते हैं और उस फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं, बशर्ते कि वह उनकी इच्छाओं और मनमानी के अनुकूल न हो। यह उनकी पुरानी आदत है कि वे हमेशा सत्य से किनारा करते हैं, भले ही उनके पास उसे पहचानने का ज्ञान हो। उन्हें चाहिए था कि जब वे अपनी किताब पर ईमान रखने का दावा करते हैं, तो वे सबसे पहले उसके फैसले के आगे सिर झुकाते, लेकिन उन्होंने इसके विपरीत किया।

फ़ायदे (लाभ):

  1. इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि ज्ञान और समझ होना ही काफी नहीं है, बल्कि असली कसौटी यह है कि इंसान सत्य के आगे अपनी इच्छाओं को त्याग दे। जो लोग सिर्फ़ अपनी मनमानी पर चलते हैं, वे ज्ञान पाकर भी हिदायत से महरूम रहते हैं।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि विवादों में हमेशा अल्लाह की किताब और उसके फैसले को ही मानना चाहिए, न कि अपनी राय या परंपराओं को। यही ईमान का तक़ाज़ा है।
  3. इससे यह भी पता चलता है कि इस्लाम दीन-ए-फ़ितरत है, जो इंसान को अंधी परंपराओं और बुज़ुर्गों की अंधी पैरवी से निकालकर सीधे अल्लाह की किताब और उसके रसूल की ओर ले जाता है। यही वह रास्ता है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत की कामयाबी तक पहुँचाता है।
  4. आयत में उन लोगों की निंदा की गई है जो सत्य को जानते हुए भी उससे मुँह मोड़ते हैं। यह हमें सच्चाई के प्रति सच्चा और वफ़ादार होने की तालीम देता है, चाहे वह हमारी इच्छाओं के खिलाफ ही क्यों न हो।
🎧 सुनें

📜 आयत 21-25 — आल-इमरान

21إِنَّ الَّذِينَ يَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ النَّبِيِّينَ بِغَيْرِ حَقٍّ وَيَقْتُلُونَ الَّذِينَ يَأْمُرُونَ بِالْقِسْطِ مِنَ النَّاسِ فَبَشِّرْهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
बेशक जो लोग ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते हैं और नाहक़ पैग़म्बरों को क़त्ल करते हैं और उन लोगों को (भी) क़त्ल करते हैं जो (उन्हें) इन्साफ़ करने का हुक्म करते हैं तो (ऐ रसूल) तुम उन लोगों को दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी दे दो
22أُولَٰئِكَ الَّذِينَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ وَمَا لَهُم مِّن نَّاصِرِينَ
यही वह (बदनसीब) लोग हैं जिनका सारा किया कराया दुनिया और आख़ेरत (दोनों) में अकारत गया और कोई उनका मददगार नहीं
23أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِّنَ الْكِتَابِ يُدْعَوْنَ إِلَىٰ كِتَابِ اللَّهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ وَهُم مُّعْرِضُونَ
(ऐ रसूल) क्या तुमने (उलमाए यहूद) के हाल पर नज़र नहीं की जिनको किताब (तौरेत) का एक हिस्सा दिया गया था (अब) उनको किताबे ख़ुदा की तरफ़ बुलाया जाता है ताकि वही (किताब) उनके झगड़ें का फैसला कर दे इस पर भी उनमें का एक गिरोह मुंह फेर लेता है और यही लोग रूगरदानी (मुँह फेरने) करने वाले हैं
24ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا لَن تَمَسَّنَا النَّارُ إِلَّا أَيَّامًا مَّعْدُودَاتٍ ۖ وَغَرَّهُمْ فِي دِينِهِم مَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ
ये इस वजह से है कि वह लोग कहते हैं कि हमें गिनती के चन्द दिनों के सिवा जहन्नुम की आग हरगिज़ छुएगी भी तो नहीं जो इफ़तेरा परदाज़ी ये लोग बराबर करते आए हैं उसी ने उन्हें उनके दीन में भी धोखा दिया है
25فَكَيْفَ إِذَا جَمَعْنَاهُمْ لِيَوْمٍ لَّا رَيْبَ فِيهِ وَوُفِّيَتْ كُلُّ نَفْسٍ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
फ़िर उनकी क्या गत होगी जब हम उनको एक दिन (क़यामत) जिसके आने में कोई शुबहा नहीं इक्ट्ठा करेंगे और हर शख्स को उसके किए का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा और उनकी किसी तरह हक़तल्फ़ी नहीं की जाएगी
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अनुवाद — आल-इमरान 23

सूरा आल-इमरान आयत 23 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) क्या तुमने (उलमाए यहूद) के हाल पर नज़र…

सूरा आयत 23/200 — आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: आल-इमरान सुनें, आल-इमरान अनुवाद, आल-इमरान mp3, आल-इमरान pdf. आयत 21–25. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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