अस-साफ्फात · 166/182
अनुवाद उच्चारण — अस-साफ्फात
وَإِنَّا لَنَحْنُ الْمُسَبِّحُونَ ۝١٦٦
Wa innaa lanah nul musabbihoon
📖 हिंदी अर्थ
और हम तो यक़ीनी (उसकी) तस्बीह पढ़ा करते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْمُسَبِّحُونَ: अल्लाह की पवित्रता बयान करने वाले, उसे हर ऐब और कमी से पाक-साफ़ क़रार देने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत फ़रिश्तों के उस बयान का हिस्सा है जिसमें वे अल्लाह की इबादत और उसकी तारीफ़ का ज़िक्र कर रहे हैं। फ़रिश्ते कहते हैं: "और हम ही हैं जो अल्लाह की तस्बीह (पवित्रता का बयान) करते हैं।" यानी हम अल्लाह को हर उस चीज़ से पाक और मुंज़्ज़ह (पवित्र) मानते हैं जो उसकी शान के लायक़ नहीं है — न उसका कोई साथी है, न कोई औलाद, न वह किसी चीज़ का मोहताज है, और न उसकी कोई मिसाल या मशबीह (समानता) किसी से है। हम उसे हर ऐब, हर कमी और हर उस चीज़ से बरी (मुक्त) क़रार देते हैं जो उसकी अज़मत (महानता) और कमाल (पूर्णता) के ख़िलाफ़ हो।

फ़रिश्ते अपने इस बयान में यह भी बताते हैं कि वे अल्लाह की इबादत में सफ़ें बाँधकर खड़े रहते हैं — एक अदब और तरतीब के साथ, जैसा कि पिछली आयतों में ज़िक्र आया। यह उनकी फ़रमाँबरदारी (आज्ञाकारिता) और इबादत की पूरी हालत को बयान करता है। वे न केवल इबादत करते हैं बल्कि अल्लाह की तारीफ़ और तस्बीह में भी मशग़ूल रहते हैं, और यही उनकी फ़ितरत (स्वभाव) है।

दावती पहलू (प्रेरक संदेश):

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि अल्लाह की तस्बीह और तारीफ़ सिर्फ़ फ़रिश्तों का काम नहीं है, बल्कि हम इंसानों को भी इसी राह पर चलना चाहिए। जब फ़रिश्ते — जो गुनाहों से पाक हैं — लगातार अल्लाह की तस्बीह करते हैं, तो हम पर कितना ज़रूरी है कि हम अपने गुनाहों के बावजूद अल्लाह की पवित्रता का बयान करें और उसकी बड़ाई करें। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की इबादत में तरतीब और अदब होना चाहिए — जैसे फ़रिश्ते सफ़ें बाँधकर खड़े होते हैं, वैसे ही हमें अपनी नमाज़ों में और अपनी ज़िंदगी के हर काम में अल्लाह के हुक्म की पैरवी करनी चाहिए। तस्बीह (सुब्हान अल्लाह) कहना बहुत आसान है, लेकिन इसका असली मतलब है दिल से अल्लाह की बड़ाई को मानना और अपनी ज़िंदगी को उसी के हिसाब से ढालना। जो बंदा अल्लाह की तस्बीह करता है, अल्लाह उसे दुनिया और आख़िरत में इज़्ज़त देता है और उसके दिल को सुकून व इत्मिनान अता करता है।



📜 आयत 164-168 — अस-साफ्फात

164وَمَا مِنَّا إِلَّا لَهُ مَقَامٌ مَّعْلُومٌ
और फरिश्ते या आइम्मा तो ये कहते हैं कि मैं हर एक का एक दरजा मुक़र्रर है
165وَإِنَّا لَنَحْنُ الصَّافُّونَ
और हम तो यक़ीनन (उसकी इबादत के लिए) सफ बाँधे खड़े रहते हैं
166وَإِنَّا لَنَحْنُ الْمُسَبِّحُونَ
और हम तो यक़ीनी (उसकी) तस्बीह पढ़ा करते हैं
167وَإِن كَانُوا لَيَقُولُونَ
अगरचे ये कुफ्फार (इस्लाम के क़ब्ल) कहा करते थे
168لَوْ أَنَّ عِندَنَا ذِكْرًا مِّنَ الْأَوَّلِينَ
कि अगर हमारे पास भी अगले लोगों का तज़किरा (किसी किताबे खुदा में) होता
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अनुवाद — अस-साफ्फात 166

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Tuesday, August 18, 2026

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