अस-साफ्फात · 57/182
अनुवाद उच्चारण — अस-साफ्फात
وَلَوْلَا نِعْمَةُ رَبِّي لَكُنتُ مِنَ الْمُحْضَرِينَ ۝٥٧
Wa law laa ni`matu Rabbee lakuntu minal muhdareen
📖 हिंदी अर्थ
और अगर मेरे परवरदिगार का एहसान न होता तो मैं भी (इस वक्त) तेरी तरह जहन्नुम में गिरफ्तार किया गया होता

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • نِعْمَةُ رَبِّي – मेरे रब की कृपा और अनुग्रह
  • الْمُحْضَرِينَ – उन लोगों में से जिन्हें (आज़ाब के लिए) हाज़िर किया जाए, यानी जो अज़ाब में डाले जाएँ

तफ़सीर:

यह आयत उस मोमिन (ईमानवाले) के क़ौल को बयान कर रही है जो अपने काफ़िर साथी (जो बहिश्त में उससे बात कर रहा है) से कह रहा है। वह उस काफ़िर से कहता है: "अगर मेरे रब की मेहरबानी और उसकी नेमत न होती, जिसने मुझे ईमान की हिदायत दी और मुझे उस पर क़ायम रखा, तो मैं भी तुम्हारी तरह उस अज़ाब में मौजूद होता जिसमें तुम अभी हो।"

यानी वह मोमिन यह स्वीकार कर रहा है कि उसका ईमान और नजात उसके अपने दम-ख़म से नहीं, बल्कि अल्लाह की फज़ल-ओ-करम से है। अल्लाह ने उसे हिदायत दी, उसे साबित क़दम रखा और उसे कुफ़्र और गुमराही से बचाया। अगर अल्लाह की यह नेमत न होती, तो वह भी उन्हीं लोगों में से होता जिन्हें जहन्नुम के अज़ाब के लिए हाज़िर किया जाता है।

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान और नेकी अल्लाह की बड़ी नेमत है। हमें चाहिए कि हम अपने ईमान पर घमंड न करें, बल्कि हर वक़्त अल्लाह का शुक्र अदा करें कि उसने हमें इस नेमत से नवाज़ा। हमें यह भी समझना चाहिए कि अल्लाह की हिदायत के बग़ैर कोई भी इंसान नेक रास्ते पर नहीं चल सकता। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह से दुआ करनी चाहिए कि वह हमें ईमान पर साबित क़दम रखे और हमें उन लोगों में से न बनाए जो अज़ाब में डाले जाएँगे।

यह क़िस्सा हमें बताता है कि दोस्तों की सोहबत का इंसान पर गहरा असर होता है। वह काफ़िर दोस्त अपने मोमिन दोस्त को गुमराह करना चाहता था, लेकिन अल्लाह की रहमत ने उस मोमिन को बचा लिया। इससे हमें सबक़ लेना चाहिए कि हम अपने दोस्तों के चुनाव में होशियार रहें और उन लोगों की सोहबत से बचें जो हमें अल्लाह के रास्ते से भटका सकते हैं। साथ ही, हमें उन लोगों के लिए दुआ करनी चाहिए जो गुमराही में हैं, कि अल्लाह उन्हें भी हिदायत दे।



📜 आयत 55-59 — अस-साफ्फात

55فَاطَّلَعَ فَرَآهُ فِي سَوَاءِ الْجَحِيمِ
तो क्या तुम लोग भी (मेरे साथ उसे झांक कर देखोगे) ग़रज़ झाँका तो उसे बीच जहन्नुम में (पड़ा हुआ) देखा
56قَالَ تَاللَّهِ إِن كِدتَّ لَتُرْدِينِ
(ये देख कर बेसाख्ता) बोल उठेगा कि खुदा की क़सम तुम तो मुझे भी तबाह करने ही को थे
57وَلَوْلَا نِعْمَةُ رَبِّي لَكُنتُ مِنَ الْمُحْضَرِينَ
और अगर मेरे परवरदिगार का एहसान न होता तो मैं भी (इस वक्त) तेरी तरह जहन्नुम में गिरफ्तार किया गया होता
58أَفَمَا نَحْنُ بِمَيِّتِينَ
(अब बताओ) क्या (मैं तुम से न कहता था) कि हम को इस पहली मौत के सिवा फिर मरना नहीं है
59إِلَّا مَوْتَتَنَا الْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ
और न हम पर (आख़ेरत) में अज़ाब होगा
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अनुवाद — अस-साफ्फात 57

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Tuesday, August 18, 2026

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