अज़-ज़ुमर · 57/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
أَوْ تَقُولَ لَوْ أَنَّ اللَّهَ هَدَانِي لَكُنتُ مِنَ الْمُتَّقِينَ ۝٥٧
Aw taqoola law annal laaha hadaanee lakuntu minal muttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
या ये कहने लगे कि अगर ख़ुदा मेरी हिदायत करता तो मैं ज़रूर परहेज़गारों में से होता

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • هَدَانِي: मुझे मार्गदर्शन देता, मुझे सही रास्ता दिखाता
  • الْمُتَّقِينَ: परहेज़गार, डरने वाले (अल्लाह से डरकर गुनाहों से बचने वाले)

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस हालत का वर्णन कर रही है जो क़यामत के दिन कुछ लोगों की होगी। वे लोग जिन्होंने दुनिया में अल्लाह के हुक्मों को नहीं माना और गुनाहों में डूबे रहे, जब वे अज़ाब देखेंगे तो अफ़सोस और पछतावे के मारे कहेंगे: "काश! अल्लाह ने मुझे हिदायत दी होती तो मैं भी उन परहेज़गारों में से होता जो उसके अज़ाब से डरते हैं और उसकी इबादत करते हैं।"

यहाँ अल्लाह तआला हमें बता रहे हैं कि क़यामत के दिन कोई भी बहाना काम नहीं आएगा। कुछ लोग कहेंगे कि अगर अल्लाह चाहता तो हमें हिदायत देता, लेकिन यह सिर्फ एक झूठा बहाना है। क्योंकि अल्लाह ने हर इंसान को अक़्ल दी है, रसूल भेजे हैं, किताबें उतारी हैं और सही रास्ता दिखाया है। हिदायत का ज़रिया तो मौजूद था, लेकिन उन्होंने खुद उसे अपनाना नहीं चाहा।

अल्लाह तआला ने इंसान को आज़ादी दी है कि वह चाहे तो सही रास्ता अपनाए और चाहे तो गलत। हिदायत का दरवाज़ा हर किसी के लिए खुला है। जो लोग सच्चे दिल से अल्लाह की तरफ रुजू करते हैं, अल्लाह उनके दिलों में हिदायत की रोशनी डाल देता है। लेकिन जो लोग खुद ही अंधेरा चुनते हैं, वे क़यामत के दिन यह बहाना नहीं बना सकते कि हमें हिदायत नहीं मिली।

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें आज ही अपनी ज़िंदगी को सुधार लेना चाहिए। कल का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। क्योंकि जब मौत आ जाएगी या क़यामत आ जाएगी, तो पछतावे का कोई फायदा नहीं होगा। हमें अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए कि उसने हमें मुसलमान बनाया और हमें सही रास्ता दिखाया। हमें अपने उन भाइयों के लिए भी दुआ करनी चाहिए जो अभी हिदायत से महरूम हैं, कि अल्लाह उन्हें भी सीधा रास्ता दिखाए।

याद रखिए! अल्लाह की रहमत बहुत वसी (व्यापक) है। जो भी सच्चे दिल से तौबा करके अल्लाह की तरफ लौटता है, अल्लाह उसे गले लगा लेता है। इसलिए आज ही अपने अंदर तक़वा (परहेज़गारी) पैदा करें, नमाज़ क़ायम करें, गुनाहों से बचें और अल्लाह की इबादत में मशगूल रहें। यही वह रास्ता है जो हमें जहन्नुम की आग से बचाकर जन्नत की तरफ ले जाएगा।



📜 आयत 55-59 — अज़-ज़ुमर

55وَاتَّبِعُوا أَحْسَنَ مَا أُنزِلَ إِلَيْكُم مِّن رَّبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَكُمُ الْعَذَابُ بَغْتَةً وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
और जो जो अच्छी बातें तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल हई हैं उन पर चलो (मगर) उसके क़ब्ल कि तुम पर एक बारगी अज़ाब नाज़िल हो और तुमको उसकी ख़बर भी न हो
56أَن تَقُولَ نَفْسٌ يَا حَسْرَتَا عَلَىٰ مَا فَرَّطتُ فِي جَنبِ اللَّهِ وَإِن كُنتُ لَمِنَ السَّاخِرِينَ
(कहीं ऐसा न हो कि) (तुममें से) कोई शख्स कहने लगे कि हाए अफ़सोस मेरी इस कोताही पर जो मैने ख़ुदा (की बारगाह) का तक़र्रुब हासिल करने में की और मैं तो बस उन बातों पर हँसता ही रहा
57أَوْ تَقُولَ لَوْ أَنَّ اللَّهَ هَدَانِي لَكُنتُ مِنَ الْمُتَّقِينَ
या ये कहने लगे कि अगर ख़ुदा मेरी हिदायत करता तो मैं ज़रूर परहेज़गारों में से होता
58أَوْ تَقُولَ حِينَ تَرَى الْعَذَابَ لَوْ أَنَّ لِي كَرَّةً فَأَكُونَ مِنَ الْمُحْسِنِينَ
या जब अज़ाब को (आते) देखें तो कहने लगे कि काश मुझे (दुनिया में) फिर दोबारा जाना मिले तो मैं नेकी कारों में हो जाऊँ
59بَلَىٰ قَدْ جَاءَتْكَ آيَاتِي فَكَذَّبْتَ بِهَا وَاسْتَكْبَرْتَ وَكُنتَ مِنَ الْكَافِرِينَ
उस वक्त ख़ुदा कहेगा ( हाँ ) हाँ तेरे पास मेरी आयतें पहुँची तो तूने उन्हें झुठलाया और शेख़ी कर बैठा और तू भी काफिरों में से था (अब तेरी एक न सुनी जाएगी)
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
75आयत
मक्कीRevelation
57आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुमर 57

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Tuesday, August 18, 2026

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