अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- الأَعْمَىٰ (अंधा): यहाँ इससे आशय वह व्यक्ति है जो सत्य को देखने, समझने और उसका अनुसरण करने से वंचित है।
- الْبَصِيرُ (देखने वाला): वह व्यक्ति जो सत्य को देखता है, उसे समझता है और उस पर चलता है।
- الْمُسِيءُ (बुराई करने वाला): वह व्यक्ति जो गलत विश्वास रखता है और बुरे कर्म करता है।
- قَلِيلًا مَّا تَتَذَكَّرُونَ (तुम बहुत कम याद करते हो): अर्थात तुम बहुत कम सोचते-समझते हो और नसीहत हासिल नहीं करते।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में एक स्पष्ट और सच्चा उदाहरण देते हुए फ़रमाते हैं कि जिस प्रकार एक अंधा व्यक्ति और एक आँखों वाला व्यक्ति कभी बराबर नहीं हो सकते, उसी प्रकार सत्य के अनुयायी और असत्य के पुजारी कभी समान नहीं हो सकते। जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए, उसके रसूलों की तस्दीक़ की और अच्छे कर्म किए, वे उन लोगों के बराबर नहीं हो सकते जो अल्लाह की आयतों को झुठलाते हैं, उसके रसूलों की अवज्ञा करते हैं और बुरे कर्मों में लिप्त रहते हैं।
यहाँ अल्लाह तआला ने अंधे और देखने वाले की मिसाल देकर यह समझाना चाहा है कि जिस प्रकार अंधा व्यक्ति प्रकाश को नहीं देख सकता और हर कदम पर ठोकर खाता है, उसी प्रकार जो व्यक्ति ईमान और अच्छे कर्मों से वंचित है, वह जीवन के हर मोड़ पर भटकता है और सीधे रास्ते से दूर रहता है। जबकि ईमान वाला व्यक्ति ईमान के नूर से रौशन होता है, उसका दिल अल्लाह की याद से जुड़ा होता है और उसके कर्म उसे जन्नत की ओर ले जाते हैं।
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि ये दोनों फ़रीक़ (समूह) कभी बराबर नहीं हो सकते। एक फ़रीक़ वह है जो अल्लाह की इबादत करता है, उसकी राह में चलता है और अच्छे कर्म करता है, और दूसरा फ़रीक़ वह है जो अल्लाह की नाफ़रमानी करता है, बुराई में डूबा रहता है और अपने आख़िरत को बर्बाद करता है। यह अंतर उतना ही स्पष्ट है जितना अंधे और देखने वाले में, उजाले और अंधेरे में, और जन्नत और जहन्नम में।
इसके बाद अल्लाह तआला फ़रमाते हैं: "तुम बहुत कम याद करते हो" — यानी ऐ लोगो! तुम अल्लाह की इन नसीहतों और हिदायतों से बहुत कम सबक़ हासिल करते हो। अगर तुम सच में सोचो और समझो तो तुम्हें यह स्पष्ट हो जाएगा कि ईमान वालों और बुराई करने वालों के बीच कितना बड़ा फ़र्क़ है, और तुम अपने आपको उन लोगों में शामिल करने की कोशिश करो जो अल्लाह की रज़ा के लिए अच्छे कर्म करते हैं।
दावती पहलू (उपदेशात्मक पहलू):
यह आयत हमें सिखाती है कि जीवन में सबसे बड़ी सफलता यह है कि हम अल्लाह पर ईमान लाएँ और अच्छे कर्म करें। जो व्यक्ति इस राह पर चलता है, वह दुनिया में भी चैन और सुकून पाता है और आख़िरत में भी कामयाब होता है। अल्लाह तआला ने हमें अंधे और देखने वाले की मिसाल देकर यह बताया है कि जो लोग ईमान से वंचित हैं, वे असल में अंधे हैं, चाहे उनकी आँखें खुली हों। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी आँखों से नहीं, बल्कि अपने दिलों से देखें, अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर करें और उसके बताए रास्ते पर चलें। यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुँचाएगा और अल्लाह की रज़ा और मुहब्बत हासिल कराएगा।
📜 आयत 56-60 — ग़ाफिर
अनुवाद — ग़ाफिर 58
सूरा ग़ाफिर आयत 58 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और अंधा और ऑंख वाला (दोनों) बराबर नहीं हो सकते…सूरा आयत 58/85 — ग़ाफिर غافر (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: ग़ाफिर सुनें, ग़ाफिर अनुवाद, ग़ाफिर mp3, ग़ाफिर pdf. आयत 56–60. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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