ग़ाफिर · 58/85
अनुवाद उच्चारण — ग़ाफिर
وَمَا يَسْتَوِي الْأَعْمَىٰ وَالْبَصِيرُ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَلَا الْمُسِيءُ ۚ قَلِيلًا مَّا تَتَذَكَّرُونَ ۝٥٨
Wa maa yastawil a`maa walbaseeru wallazeena aamanoo wa `amilus saalihaati wa lal museee`; qaleelam maa tatazakkaroon
📖 हिंदी अर्थ
और अंधा और ऑंख वाला (दोनों) बराबर नहीं हो सकते और न मोमिनीन जिन्होने अच्छे काम किए और न बदकार (ही) बराबर हो सकते हैं बात ये है कि तुम लोग बहुत कम ग़ौर करते हो, कयामत तो ज़रूर आने वाली है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الأَعْمَىٰ (अंधा): यहाँ इससे आशय वह व्यक्ति है जो सत्य को देखने, समझने और उसका अनुसरण करने से वंचित है।
  • الْبَصِيرُ (देखने वाला): वह व्यक्ति जो सत्य को देखता है, उसे समझता है और उस पर चलता है।
  • الْمُسِيءُ (बुराई करने वाला): वह व्यक्ति जो गलत विश्वास रखता है और बुरे कर्म करता है।
  • قَلِيلًا مَّا تَتَذَكَّرُونَ (तुम बहुत कम याद करते हो): अर्थात तुम बहुत कम सोचते-समझते हो और नसीहत हासिल नहीं करते।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में एक स्पष्ट और सच्चा उदाहरण देते हुए फ़रमाते हैं कि जिस प्रकार एक अंधा व्यक्ति और एक आँखों वाला व्यक्ति कभी बराबर नहीं हो सकते, उसी प्रकार सत्य के अनुयायी और असत्य के पुजारी कभी समान नहीं हो सकते। जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए, उसके रसूलों की तस्दीक़ की और अच्छे कर्म किए, वे उन लोगों के बराबर नहीं हो सकते जो अल्लाह की आयतों को झुठलाते हैं, उसके रसूलों की अवज्ञा करते हैं और बुरे कर्मों में लिप्त रहते हैं।

यहाँ अल्लाह तआला ने अंधे और देखने वाले की मिसाल देकर यह समझाना चाहा है कि जिस प्रकार अंधा व्यक्ति प्रकाश को नहीं देख सकता और हर कदम पर ठोकर खाता है, उसी प्रकार जो व्यक्ति ईमान और अच्छे कर्मों से वंचित है, वह जीवन के हर मोड़ पर भटकता है और सीधे रास्ते से दूर रहता है। जबकि ईमान वाला व्यक्ति ईमान के नूर से रौशन होता है, उसका दिल अल्लाह की याद से जुड़ा होता है और उसके कर्म उसे जन्नत की ओर ले जाते हैं।

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि ये दोनों फ़रीक़ (समूह) कभी बराबर नहीं हो सकते। एक फ़रीक़ वह है जो अल्लाह की इबादत करता है, उसकी राह में चलता है और अच्छे कर्म करता है, और दूसरा फ़रीक़ वह है जो अल्लाह की नाफ़रमानी करता है, बुराई में डूबा रहता है और अपने आख़िरत को बर्बाद करता है। यह अंतर उतना ही स्पष्ट है जितना अंधे और देखने वाले में, उजाले और अंधेरे में, और जन्नत और जहन्नम में।

इसके बाद अल्लाह तआला फ़रमाते हैं: "तुम बहुत कम याद करते हो" — यानी ऐ लोगो! तुम अल्लाह की इन नसीहतों और हिदायतों से बहुत कम सबक़ हासिल करते हो। अगर तुम सच में सोचो और समझो तो तुम्हें यह स्पष्ट हो जाएगा कि ईमान वालों और बुराई करने वालों के बीच कितना बड़ा फ़र्क़ है, और तुम अपने आपको उन लोगों में शामिल करने की कोशिश करो जो अल्लाह की रज़ा के लिए अच्छे कर्म करते हैं।

दावती पहलू (उपदेशात्मक पहलू):

यह आयत हमें सिखाती है कि जीवन में सबसे बड़ी सफलता यह है कि हम अल्लाह पर ईमान लाएँ और अच्छे कर्म करें। जो व्यक्ति इस राह पर चलता है, वह दुनिया में भी चैन और सुकून पाता है और आख़िरत में भी कामयाब होता है। अल्लाह तआला ने हमें अंधे और देखने वाले की मिसाल देकर यह बताया है कि जो लोग ईमान से वंचित हैं, वे असल में अंधे हैं, चाहे उनकी आँखें खुली हों। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी आँखों से नहीं, बल्कि अपने दिलों से देखें, अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर करें और उसके बताए रास्ते पर चलें। यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुँचाएगा और अल्लाह की रज़ा और मुहब्बत हासिल कराएगा।



📜 आयत 56-60 — ग़ाफिर

56إِنَّ الَّذِينَ يُجَادِلُونَ فِي آيَاتِ اللَّهِ بِغَيْرِ سُلْطَانٍ أَتَاهُمْ ۙ إِن فِي صُدُورِهِمْ إِلَّا كِبْرٌ مَّا هُم بِبَالِغِيهِ ۚ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ ۖ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ
जिन लोगों के पास (ख़ुदा की तरफ से) कोई दलील तो आयी नहीं और (फिर) वह ख़ुदा की आयतों में (ख्वाह मा ख्वाह) झगड़े निकालते हैं, उनके दिल में बुराई (की बेजां हवस) के सिवा कुछ नहीं हालाँकि वह लोग उस तक कभी पहुँचने वाले नहीं तो तुम बस ख़ुदा की पनाह माँगते रहो बेशक वह बड़ा सुनने वाला (और) देखने वाला है
57لَخَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ أَكْبَرُ مِنْ خَلْقِ النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
सारे आसमान और ज़मीन का पैदा करना लोगों के पैदा करने की ये निस्बत यक़ीनी बड़ा (काम) है मगर अक्सर लोग (इतना भी) नहीं जानते
58وَمَا يَسْتَوِي الْأَعْمَىٰ وَالْبَصِيرُ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَلَا الْمُسِيءُ ۚ قَلِيلًا مَّا تَتَذَكَّرُونَ
और अंधा और ऑंख वाला (दोनों) बराबर नहीं हो सकते और न मोमिनीन जिन्होने अच्छे काम किए और न बदकार (ही) बराबर हो सकते हैं बात ये है कि तुम लोग बहुत कम ग़ौर करते हो, कयामत तो ज़रूर आने वाली है
59إِنَّ السَّاعَةَ لَآتِيَةٌ لَّا رَيْبَ فِيهَا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ
इसमें किसी तरह का शक नहीं मगर अक्सर लोग (इस पर भी) ईमान नहीं रखते
60وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ
और तुम्हारा परवरदिगार इरशाद फ़रमाता है कि तुम मुझसे दुआएं माँगों मैं तुम्हारी (दुआ) क़ुबूल करूँगा जो लोग हमारी इबादत से अकड़ते हैं वह अनक़रीब ही ज़लील व ख्वार हो कर यक़ीनन जहन्नुम वासिल होंगे
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अनुवाद — ग़ाफिर 58

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Tuesday, August 18, 2026

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