अश-शूरा · 29/53
अनुवाद उच्चारण — अश-शूरा
وَمِنْ آيَاتِهِ خَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَابَّةٍ ۚ وَهُوَ عَلَىٰ جَمْعِهِمْ إِذَا يَشَاءُ قَدِيرٌ ۝٢٩
Wa min Aayaatihee khalqus samaawaati wal ardi wa maa bassa feehimaa min daaabbah; wa Huwa `alaa jam`ihim izaa yashaaa`u Qadeer
📖 हिंदी अर्थ
और उसी की (क़ुदरत की) निशानियों में से सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करना और उन जानदारों का भी जो उसने आसमान व ज़मीन में फैला रखे हैं और जब चाहे उनके जमा कर लेने पर (भी) क़ादिर है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • بَثَّ: फैलाना, फैलाना और पूरी दुनिया में फैलाना।
  • دَابَّةٍ: चलने-फिरने वाला प्राणी, जिसमें इंसान, जानवर, पक्षी और सभी जीवित प्राणी शामिल हैं।
  • جَمْعِهِمْ: उन सबको इकट्ठा करना, यानी क़यामत के दिन सभी प्राणियों का हश्र के लिए इकट्ठा होना।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला की महानता, उसकी क़ुदरत (शक्ति) और उसके अकेले होने की दलीलें उसकी पैदा की हुई मख़लूक़ात (सृष्टि) में बिखरी पड़ी हैं। इन्हीं निशानियों में से एक बहुत बड़ी निशानी यह है कि उसने आसमानों और ज़मीन को बिना किसी पहले नमूने के पैदा किया। ये इतनी बड़ी और हैरतअंगेज़ मख़लूक़ात हैं कि इन्हें देखकर इंसान का दिमाग़ दंग रह जाता है। फिर उसी अल्लाह ने इन दोनों (आसमान और ज़मीन) में तरह-तरह के जीव-जंतु, चलने-फिरने वाले प्राणी, पक्षी, कीड़े-मकोड़े और असंख्य मख़लूक़ात फैलाई हैं। हर प्राणी अपनी बनावट, अपने रंग-रूप, अपनी खुराक और अपने रहने के तरीक़े में अल्लाह की क़ुदरत का एक अजीबो-ग़रीब नमूना है।

यही अल्लाह, जो इन सबको पैदा करने पर क़ादिर है, उन सबको दोबारा इकट्ठा करने पर भी पूरी तरह क़ादिर है। जब वह चाहेगा, क़यामत के दिन सभी प्राणियों को क़ब्रों से उठाकर हश्र के मैदान में इकट्ठा कर देगा। जिस तरह उसे पहली बार पैदा करना मुश्किल नहीं था, उसी तरह उन्हें दोबारा ज़िंदा करना और इकट्ठा करना भी उसके लिए बिल्कुल आसान है। उसकी क़ुदरत के आगे कोई चीज़ मुश्किल नहीं, न कोई चीज़ उससे छिपी है।

दावत और नसीहत:

इस आयत में अल्लाह तआला हमें अपनी क़ुदरत के दर्शन करा रहा है ताकि हम उसकी अज़मत (महानता) को पहचानें और उसके आगे सर झुकाएँ। जब हम आसमान की बुलंदियों, ज़मीन की वुसअत (चौड़ाई) और उसमें फैली हर चीज़ को देखते हैं, तो हमारा दिल इस हक़ीक़त पर ईमान लाता है कि यह सब किसी ख़ालिक़ (रचयिता) के बिना नहीं हो सकता। यही ख़ालिक़ हमें मौत के बाद दोबारा ज़िंदा करके हमारे आमाल (कर्मों) का हिसाब लेगा। यह ईमान हमें ज़िंदगी में सीधे रास्ते पर चलने की ताक़त देता है और हमें याद दिलाता है कि हमारी मंज़िल सिर्फ़ यही दुनिया नहीं, बल्कि आख़िरत की हमेशा वाली ज़िंदगी भी है। अल्लाह की क़ुदरत पर ग़ौर करके हम अपने रब की मोहब्बत और उसकी इबादत में मज़बूती हासिल करें, क्योंकि वही सब कुछ कर सकता है और उसके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं।



📜 आयत 27-31 — अश-शूरा

27۞ وَلَوْ بَسَطَ اللَّهُ الرِّزْقَ لِعِبَادِهِ لَبَغَوْا فِي الْأَرْضِ وَلَٰكِن يُنَزِّلُ بِقَدَرٍ مَّا يَشَاءُ ۚ إِنَّهُ بِعِبَادِهِ خَبِيرٌ بَصِيرٌ
और अगर ख़ुदा ने अपने बन्दों की रोज़ी में फराख़ी कर दे तो वह लोग ज़रूर (रूए) ज़मीन से सरकशी करने लगें मगर वह तो बाक़दरे मुनासिब जिसकी रोज़ी (जितनी) चाहता है नाज़िल करता है वह बेशक अपने बन्दों से ख़बरदार (और उनको) देखता है
28وَهُوَ الَّذِي يُنَزِّلُ الْغَيْثَ مِن بَعْدِ مَا قَنَطُوا وَيَنشُرُ رَحْمَتَهُ ۚ وَهُوَ الْوَلِيُّ الْحَمِيدُ
और वही तो है जो लोगों के नाउम्मीद हो जाने के बाद मेंह बरसाता है और अपनी रहमत (बारिश की बरकतों) को फैला देता है और वही कारसाज़ (और) हम्द व सना के लायक़ है
29وَمِنْ آيَاتِهِ خَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَابَّةٍ ۚ وَهُوَ عَلَىٰ جَمْعِهِمْ إِذَا يَشَاءُ قَدِيرٌ
और उसी की (क़ुदरत की) निशानियों में से सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करना और उन जानदारों का भी जो उसने आसमान व ज़मीन में फैला रखे हैं और जब चाहे उनके जमा कर लेने पर (भी) क़ादिर है
30وَمَا أَصَابَكُم مِّن مُّصِيبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ أَيْدِيكُمْ وَيَعْفُو عَن كَثِيرٍ
और जो मुसीबत तुम पर पड़ती है वह तुम्हारे अपने ही हाथों की करतूत से और (उस पर भी) वह बहुत कुछ माफ कर देता है
31وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ ۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ
और तुम लोग ज़मीन में (रह कर) तो ख़ुदा को किसी तरह हरा नहीं सकते और ख़ुदा के सिवा तुम्हारा न कोई दोस्त है और न मददगार
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अनुवाद — अश-शूरा 29

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Tuesday, August 18, 2026

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