अश-शूरा · 31/53
अनुवाद उच्चारण — अश-शूरा
وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ ۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ ۝٣١
Wa maaa antum bimu`jizeena fil ardi wa maa lakum min doonil laahi minw wa liyyinw wa laa naseer
📖 हिंदी अर्थ
और तुम लोग ज़मीन में (रह कर) तो ख़ुदा को किसी तरह हरा नहीं सकते और ख़ुदा के सिवा तुम्हारा न कोई दोस्त है और न मददगार

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • بِمُعْجِزِينَ: अल्लाह को विवश करने वाले, उसकी पकड़ से बच निकलने वाले, या उसे थका देने वाले।
  • وَلِيٍّ: मित्र, सहायक, संरक्षक जो आपके कामों को संभाले।
  • نَصِيرٍ: मददगार जो आपको हानि से बचाए या विपत्ति को टाले।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ लोगों! तुम अल्लाह को विवश करने वाले नहीं हो, न ही तुम उसकी पकड़ से भाग सकते हो। चाहे तुम धरती के किसी भी कोने में चले जाओ, अल्लाह की क़ुदरत और उसके इल्म से बाहर नहीं जा सकते। यदि वह तुम्हें सज़ा देना चाहे, तो तुम्हारे लिए कहीं कोई पनाहगाह नहीं, और न ही तुम उसकी पकड़ से बच सकते हो। इसके अलावा, अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई वली (संरक्षक) नहीं है जो तुम्हारे मामलों को संभाले और तुम्हें लाभ पहुँचाए, और न ही कोई नसीर (मददगार) है जो तुम्हें अल्लाह की ओर से आने वाली मुसीबतों और अज़ाब से बचा सके। इसलिए, जब सारा मामला अल्लाह के हाथ में है, तो उसी की ओर रुजू करो, उसी की इबादत करो और उसी से मदद माँगो। याद रखो, अल्लाह ही तुम्हारा सच्चा मित्र और सहायक है, और उसकी रहमत और मदद ही तुम्हारे लिए सबसे बड़ी नेमत है। उसकी ओर लौटो, उसके दीन को अपनाओ, और उसके रसूल (ﷺ) की सुन्नत पर चलो, ताकि दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी हासिल कर सको। अल्लाह तआला अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है, और वह चाहता है कि तुम उसकी रहमत की तरफ लौटो, ताकि वह तुम्हें अपनी जन्नत और अपनी रज़ा से नवाज़े।



📜 आयत 29-33 — अश-शूरा

29وَمِنْ آيَاتِهِ خَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَابَّةٍ ۚ وَهُوَ عَلَىٰ جَمْعِهِمْ إِذَا يَشَاءُ قَدِيرٌ
और उसी की (क़ुदरत की) निशानियों में से सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करना और उन जानदारों का भी जो उसने आसमान व ज़मीन में फैला रखे हैं और जब चाहे उनके जमा कर लेने पर (भी) क़ादिर है
30وَمَا أَصَابَكُم مِّن مُّصِيبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ أَيْدِيكُمْ وَيَعْفُو عَن كَثِيرٍ
और जो मुसीबत तुम पर पड़ती है वह तुम्हारे अपने ही हाथों की करतूत से और (उस पर भी) वह बहुत कुछ माफ कर देता है
31وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ ۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ
और तुम लोग ज़मीन में (रह कर) तो ख़ुदा को किसी तरह हरा नहीं सकते और ख़ुदा के सिवा तुम्हारा न कोई दोस्त है और न मददगार
32وَمِنْ آيَاتِهِ الْجَوَارِ فِي الْبَحْرِ كَالْأَعْلَامِ
और उसी की (क़ुदरत) की निशानियों में से समन्दर में (चलने वाले) (बादबानी जहाज़) है जो गोया पहाड़ हैं
33إِن يَشَأْ يُسْكِنِ الرِّيحَ فَيَظْلَلْنَ رَوَاكِدَ عَلَىٰ ظَهْرِهِ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ
अगर ख़ुदा चाहे तो हवा को ठहरा दे तो जहाज़ भी समन्दर की सतह पर (खड़े के खड़े) रह जाएँ बेशक तमाम सब्र और शुक्र करने वालों के वास्ते इन बातों में (ख़ुदा की क़ुदरत की) बहुत सी निशानियाँ हैं
अश-शूराकुरान सूची
53आयत
मक्कीRevelation
31आयत

अनुवाद — अश-शूरा 31

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Tuesday, August 18, 2026

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