अश-शूरा · 49/53
अनुवाद उच्चारण — अश-शूरा
لِّلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۚ يَهَبُ لِمَن يَشَاءُ إِنَاثًا وَيَهَبُ لِمَن يَشَاءُ الذُّكُورَ ۝٤٩
Lillaahi mulkus samaawaati wal ard; yakhluqu maa yashaaa`; yahabu limai yashaaa`u inaasanw wa yahabu limai yashaaa`uz zukoor
📖 हिंदी अर्थ
सारे आसमान व ज़मीन की हुकूमत ख़ास ख़ुदा ही की है जो चाहता है पैदा करता है (और) जिसे चाहता है (फ़क़त) बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है (महज़) बेटा अता करता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مُلْكُ – स्वामित्व, राज्य
  • يَخْلُقُ – पैदा करता है, सृजन करता है
  • يَهَبُ – प्रदान करता है, दान करता है
  • إِنَاثًا – बेटियाँ (लड़कियाँ)
  • الذُّكُورَ – बेटे (लड़के)

तफ़सीर (व्याख्या):

आसमानों और ज़मीन का पूरा राज्य, उनकी सारी चीज़ें, उनके सारे राज़ और उनके सारे ख़ज़ाने—सब कुछ सिर्फ़ अल्लाह ही के हैं। वही इस सारी कायनात का मालिक है, और उसकी मलकियत में किसी का कोई हिस्सा नहीं। वह जो चाहता है, पैदा करता है, और जिस तरह चाहता है, बनाता है। उसकी रचना पर किसी को कोई एतराज़ नहीं हो सकता, क्योंकि वही सबसे बुद्धिमान, सबसे जानने वाला और सबसे दयालु है।

अल्लाह तआला अपनी असीम शक्ति और हिकमत से इंसानों को संतान देता है। वह जिसे चाहता है, सिर्फ़ बेटियाँ देता है, और जिसे चाहता है, सिर्फ़ बेटे देता है। यह उसका फ़ैसला है, और उसके फ़ैसले में कोई कमी नहीं होती। कुछ लोगों को वह बेटे और बेटियाँ दोनों देता है, तो कुछ को वह बिल्कुल संतान से वंचित रखता है और उन्हें निस्संतान कर देता है। यह सब उसकी मर्ज़ी और उसकी हिकमत के मुताबिक़ होता है।

इस आयत में अल्लाह तआला हमें यह सिखा रहा है कि संतान देना या न देना, बेटा देना या बेटी देना—यह सब अल्लाह के हाथ में है, इंसान के हाथ में नहीं। अरब के जाहिलिया दौर में लोग बेटियों को बुरा मानते थे और उन्हें ज़िंदा दफ़न कर देते थे। अल्लाह ने इस आयत में उस बुरी सोच का खंडन किया और बताया कि बेटी देना भी अल्लाह की तरफ़ से एक नेमत है, और बेटा देना भी एक नेमत है। दोनों में कोई कमी नहीं। अल्लाह जो देता है, उसमें भलाई होती है, चाहे वह बेटा हो या बेटी।

यह आयत हमें अल्लाह पर पूरा भरोसा रखने की तालीम देती है। हमें अपनी पसंद और नापसंद को अल्लाह की मर्ज़ी के आगे झुकाना चाहिए। अल्लाह जो फ़ैसला करता है, वही बेहतरीन होता है, भले ही हमें उसकी हिकमत समझ न आए। जिसे बेटियाँ मिलती हैं, उसे चाहिए कि वह अल्लाह का शुक्र अदा करे और उनकी अच्छी परवरिश करे। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि जिसने दो बेटियों की परवरिश अच्छे तरीक़े से की, वह मेरे साथ जन्नत में इस तरह होगा जैसे दो उंगलियाँ एक साथ हों।

अल्लाह तआला हर चीज़ से बाख़बर है। वह जानता है कि किसे क्या देना है, कब देना है, और कितना देना है। उसका इल्म हर चीज़ को घेरे हुए है, और उसकी क़ुदरत हर चीज़ पर हावी है। उसके लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है। इसलिए हमें अपने रब की रज़ा पर राज़ी रहना चाहिए और उसके हर फ़ैसले को खुशी से क़ुबूल करना चाहिए। यही सच्चे मुसलमान की पहचान है कि वह अल्लाह के फ़ैसले पर संतुष्ट रहे और उसकी रहमत से कभी निराश न हो।



📜 आयत 47-51 — अश-शूरा

47اسْتَجِيبُوا لِرَبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا مَرَدَّ لَهُ مِنَ اللَّهِ ۚ مَا لَكُم مِّن مَّلْجَإٍ يَوْمَئِذٍ وَمَا لَكُم مِّن نَّكِيرٍ
(लोगों) उस दिन के पहले जो ख़ुदा की तरफ से आयेगा और किसी तरह (टाले न टलेगा) अपने परवरदिगार का हुक्म मान लो (क्यों कि) उस दिन न तो तुमको कहीं पनाह की जगह मिलेगी और न तुमसे (गुनाह का) इन्कार ही बन पड़ेगा
48فَإِنْ أَعْرَضُوا فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ إِنْ عَلَيْكَ إِلَّا الْبَلَاغُ ۗ وَإِنَّا إِذَا أَذَقْنَا الْإِنسَانَ مِنَّا رَحْمَةً فَرِحَ بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَإِنَّ الْإِنسَانَ كَفُورٌ
फिर अगर मुँह फेर लें तो (ऐ रसूल) हमने तुमको उनका निगेहबान बनाकर नहीं भेजा तुम्हारा काम तो सिर्फ (एहकाम का) पहुँचा देना है और जब हम इन्सान को अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह उससे ख़ुश हो जाता है और अगर उनको उन्हीं के हाथों की पहली करतूतों की बदौलत कोई तकलीफ पहुँचती (सब एहसान भूल गए) बेशक इन्सान बड़ा नाशुक्रा है
49لِّلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۚ يَهَبُ لِمَن يَشَاءُ إِنَاثًا وَيَهَبُ لِمَن يَشَاءُ الذُّكُورَ
सारे आसमान व ज़मीन की हुकूमत ख़ास ख़ुदा ही की है जो चाहता है पैदा करता है (और) जिसे चाहता है (फ़क़त) बेटियाँ देता है और जिसे चाहता है (महज़) बेटा अता करता है
50أَوْ يُزَوِّجُهُمْ ذُكْرَانًا وَإِنَاثًا ۖ وَيَجْعَلُ مَن يَشَاءُ عَقِيمًا ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ قَدِيرٌ
या उनको बेटे बेटियाँ (औलाद की) दोनों किस्में इनायत करता है और जिसको चाहता है बांझ बना देता है बेशक वह बड़ा वाकिफ़कार क़ादिर है
51۞ وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ اللَّهُ إِلَّا وَحْيًا أَوْ مِن وَرَاءِ حِجَابٍ أَوْ يُرْسِلَ رَسُولًا فَيُوحِيَ بِإِذْنِهِ مَا يَشَاءُ ۚ إِنَّهُ عَلِيٌّ حَكِيمٌ
और किसी आदमी के लिए ये मुमकिन नहीं कि ख़ुदा उससे बात करे मगर वही के ज़रिए से (जैसे) (दाऊद) परदे के पीछे से जैसे (मूसा) या कोई फ़रिश्ता भेज दे (जैसे मोहम्मद) ग़रज़ वह अपने एख्तेयार से जो चाहता है पैग़ाम भेज देता है बेशक वह आलीशान हिकमत वाला है
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अनुवाद — अश-शूरा 49

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Tuesday, August 18, 2026

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