अज़-ज़ुखरुफ · 15/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
وَجَعَلُوا لَهُ مِنْ عِبَادِهِ جُزْءًا ۚ إِنَّ الْإِنسَانَ لَكَفُورٌ مُّبِينٌ ۝١٥
Wa ja`aloo lahoo min `ibaadihee juz`aa; innal insaana lakafoorum mubeen
📖 हिंदी अर्थ
और उन लोगों ने उसके बन्दों में से उसके लिए औलाद क़रार दी है इसमें शक़ नहीं कि इन्सान खुल्लम खुल्ला बड़ा ही नाशक्रा है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • جُزْءًا (जुज़'अन): हिस्सा, भाग, या नसीब।
  • كَفُورٌ (कफ़ूर): अत्यधिक कृतघ्न, नेमतों का इनकार करने वाला।
  • مُبِينٌ (मुबीन): स्पष्ट, खुला हुआ, ज़ाहिर।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला ने मुशरिकीन (बहुदेववादियों) के उस बड़े कुफ़्र और गुमराही का ज़िक्र किया है, जिसमें उन्होंने अल्लाह के बंदों में से कुछ को उसका हिस्सा ठहरा दिया। उनका कहना था कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं — नाउज़ुबिल्लाह! यानी उन्होंने अल्लाह के लिए संतान होने का झूठा दावा किया, जबकि संतान माता-पिता का हिस्सा होती है और अल्लाह तो हर कमी और हर साथी से पाक और मुकद्दस है। यह उनकी सबसे बड़ी जहालत और अक़्ल का इंकार था कि उन्होंने मख़लूक़ (प्राणियों) को ख़ालिक़ (सृष्टिकर्ता) का हिस्सा बना दिया।

इसके बाद अल्लाह फ़रमाता है: "बेशक इंसान स्पष्ट कृतघ्न है।" यानी इंसान अपने रब की नेमतों का बहुत बड़ा इनकारी है। वह मुसीबतों को याद रखता है और नेमतों को भूल जाता है। जब उस पर कोई मुसीबत आती है तो वह चिल्लाता है, लेकिन जब अल्लाह उसे नेमत देता है तो वह उसका शुक्र अदा नहीं करता। यहाँ तक कि वह अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहता है जो उसकी शान के लिए हरगिज़ मुनासिब नहीं।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की ज़ात, उसके नाम और उसकी सिफ़ात में कोई शरीक नहीं है। हमें चाहिए कि हम अपने रब की नेमतों को पहचानें और उसका शुक्र अदा करें। जो इंसान अल्लाह की नेमतों को भूलकर उसके बारे में बुरे ख़यालात रखता है या उसकी शान में कमी लाता है, वह अपने नुक़्सान में है। अल्लाह तआला हमें शुक्रगुज़ार बंदे बनाए और हमें उसकी ज़ात और सिफ़ात के बारे में सही अक़ीदा अता फ़रमाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 13-17 — अज़-ज़ुखरुफ

13لِتَسْتَوُوا عَلَىٰ ظُهُورِهِ ثُمَّ تَذْكُرُوا نِعْمَةَ رَبِّكُمْ إِذَا اسْتَوَيْتُمْ عَلَيْهِ وَتَقُولُوا سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ
ताकि तुम उसकी पीठ पर चढ़ो और जब उस पर (अच्छी तरह) सीधे हो बैठो तो अपने परवरदिगार का एहसान माना करो और कहो कि वह (ख़ुदा हर ऐब से) पाक है जिसने इसको हमारा ताबेदार बनाया हालॉकि हम तो ऐसे (ताक़तवर) न थे कि उस पर क़ाबू पाते
14وَإِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ
और हमको तो यक़ीनन अपने परवरदिगार की तरफ लौट कर जाना है
15وَجَعَلُوا لَهُ مِنْ عِبَادِهِ جُزْءًا ۚ إِنَّ الْإِنسَانَ لَكَفُورٌ مُّبِينٌ
और उन लोगों ने उसके बन्दों में से उसके लिए औलाद क़रार दी है इसमें शक़ नहीं कि इन्सान खुल्लम खुल्ला बड़ा ही नाशक्रा है
16أَمِ اتَّخَذَ مِمَّا يَخْلُقُ بَنَاتٍ وَأَصْفَاكُم بِالْبَنِينَ
क्या उसने अपनी मख़लूक़ात में से ख़ुद तो बेटियाँ ली हैं और तुमको चुनकर बेटे दिए हैं
17وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِمَا ضَرَبَ لِلرَّحْمَٰنِ مَثَلًا ظَلَّ وَجْهُهُ مُسْوَدًّا وَهُوَ كَظِيمٌ
हालॉकि जब उनमें किसी शख़्श को उस चीज़ (बेटी) की ख़ुशख़बरी दी जाती है जिसकी मिसल उसने ख़ुदा के लिए बयान की है तो वह (ग़ुस्से के मारे) सियाह हो जाता है और ताव पेंच खाने लगता है
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अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 15

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Tuesday, August 18, 2026

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