अज़-ज़ुखरुफ · 67/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
الْأَخِلَّاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا الْمُتَّقِينَ ۝٦٧
Al akhillaaa`u Yawma`izim ba`duhum liba`din `aduwwun illal muttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
(दिली) दोस्त इस दिन (बाहम) एक दूसरे के दुशमन होगें मगर परहेज़गार कि वह दोस्त ही रहेगें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अल-अखिल्ला (الأَخِلاَّء): घनिष्ठ मित्र, वे लोग जो आपस में गहरी दोस्ती रखते हैं।
  • यौमइज़िन (يَوْمَئِذٍ): उस दिन, अर्थात् क़ियामत के दिन।
  • अदुव्वुन (عَدُوٌّ): शत्रु, दुश्मन।
  • अल-मुत्तक़ीन (الْمُتَّقِينَ): परहेज़गार, वे लोग जो अल्लाह के आदेशों का पालन करें और उसकी मनाही से बचें।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत क़ियामत के दिन की एक बहुत ही गंभीर और विचारणीय स्थिति का वर्णन करती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो लोग दुनिया में आपस में गहरी दोस्ती रखते थे, लेकिन यह दोस्ती अल्लाह की नाफ़रमानी, गुनाह और बुराई पर आधारित थी—चाहे वह दोस्ती शराब पीने पर हो, चोरी-डकैती पर हो, या किसी और गुनाह पर—ऐसे सभी दोस्त क़ियामत के दिन एक-दूसरे के दुश्मन बन जाएँगे। वे एक-दूसरे से बराअत (बेज़ारी) जताएँगे, एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराएँगे और एक-दूसरे से अलग हो जाएँगे। जिस दोस्ती ने उन्हें दुनिया में गुनाह की तरफ़ धकेला, वही दोस्ती आख़िरत में उनके लिए अफ़सोस और पछतावे का सबब बनेगी।

लेकिन इस आयत में एक बहुत बड़ी ख़ुशख़बरी भी है। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "मगर परहेज़गारों (मुत्तक़ीन) के अलावा।" यानी जिन लोगों की दोस्ती अल्लाह की रज़ा के लिए थी, जो लोग अल्लाह की इबादत, उसकी ताअत और नेक कामों पर एक-दूसरे से जुड़े थे, उनकी दोस्ती क़ियामत के दिन भी क़ायम रहेगी और उनके लिए नेमत और रहमत का सबब बनेगी। उनकी मुहब्बत सिर्फ़ दुनिया तक महदूद नहीं रहेगी, बल्कि आख़िरत की ज़िन्दगी में भी उनका आपसी प्यार और भाईचारा जारी रहेगा, और वे जन्नत में एक साथ रहेंगे।

यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपनी दोस्तियाँ किस आधार पर बनाते हैं। अगर हमारी दोस्तियाँ सिर्फ़ दुनिया के मतलब, गुनाह और बुराई पर हैं, तो यह दोस्ती आख़िरत में हमारे लिए नुक़सान का सबब बनेगी। लेकिन अगर हमारी दोस्ती अल्लाह की रज़ा के लिए है, तो यही दोस्ती हमारे लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में बेहतरी का ज़रिया बनेगी। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने दोस्तों का चुनाव सोच-समझकर करें और ऐसे लोगों को अपना दोस्त बनाएँ जो हमें अल्लाह की याद दिलाएँ, नेकी की तरफ़ बुलाएँ और बुराई से रोकें। यही वह दोस्ती है जो क़ियामत के दिन हमारे काम आएगी और हमें जन्नत की तरफ़ ले जाएगी।

🎧 सुनें

📜 आयत 65-69 — अज़-ज़ुखरुफ

65فَاخْتَلَفَ الْأَحْزَابُ مِن بَيْنِهِمْ ۖ فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْ عَذَابِ يَوْمٍ أَلِيمٍ
तो इनमें से कई फिरक़े उनसे एख्तेलाफ करने लगे तो जिन लोगों ने ज़ुल्म किया उन पर दर्दनांक दिन के अज़ब से अफ़सोस है
66هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا السَّاعَةَ أَن تَأْتِيَهُم بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
क्या ये लोग बस क़यामत के ही मुन्ज़िर बैठे हैं कि अचानक ही उन पर आ जाए और उन को ख़बर तक न हो
67الْأَخِلَّاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا الْمُتَّقِينَ
(दिली) दोस्त इस दिन (बाहम) एक दूसरे के दुशमन होगें मगर परहेज़गार कि वह दोस्त ही रहेगें
68يَا عِبَادِ لَا خَوْفٌ عَلَيْكُمُ الْيَوْمَ وَلَا أَنتُمْ تَحْزَنُونَ
और ख़ुदा उनसे कहेगा ऐ मेरे बन्दों आज न तो तुमको कोई ख़ौफ है और न तुम ग़मग़ीन होगे
69الَّذِينَ آمَنُوا بِآيَاتِنَا وَكَانُوا مُسْلِمِينَ
(यह) वह लोग हैं जो हमारी आयतों पर ईमान लाए और (हमारे) फ़रमाबरदार थे
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीRevelation
67आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 67

सूरा अज़-ज़ुखरुफ आयत 67 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (दिली) दोस्त इस दिन (बाहम) एक दूसरे के दुशमन होगें…

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Tuesday, August 18, 2026

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