अल-माइदा · 36/120
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-माइदा
إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْ أَنَّ لَهُم مَّا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا وَمِثْلَهُ مَعَهُ لِيَفْتَدُوا بِهِ مِنْ عَذَابِ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَا تُقُبِّلَ مِنْهُمْ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝٣٦
Innal lazeena kafaroo law anna lahum maa fil ardi jamee`anw wa mislahoo ma`ahoo liyaftadoo bihee min `azaabi Yawmil Qiyaamati maa tuqubbila minhum wa lahum azaabun aleem
📖 हिंदी अर्थ
इसमें शक नहीं कि जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया अगर उनके पास ज़मीन में जो कुछ (माल ख़ज़ाना) है (वह) सब बल्कि उतना और भी उसके साथ हो कि रोज़े क़यामत के अज़ाब का मुआवेज़ा दे दे (और ख़ुद बच जाए) तब भी (उसका ये मुआवेज़ा) कुबूल न किया जाएगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِيَفْتَدُوا بِهِ: इससे अपने आपको छुड़ाना चाहें, फिदया देना चाहें।
  • مَا تُقُبِّلَ مِنْهُمْ: उनसे यह फिदया (मुआवज़ा) क़बूल नहीं किया जाएगा।
  • عَذَابٌ أَلِيمٌ: दर्दनाक और बहुत तकलीफ़ देने वाला अज़ाब।

तफ़सीर:

जिन लोगों ने अल्लाह की वहदानियत (एकता) और उसके दीन को नकार दिया और कुफ़्र पर ही मर गए, अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर उनके पास धरती की तमाम चीज़ें हों और उतनी ही और भी हों — यानी दुनिया का सारा खज़ाना और उसके बराबर और भी माल — और वे उसे क़ियामत के दिन के अज़ाब से छुटकारा पाने के लिए फिदया (मुआवज़ा) के तौर पर दे दें, तो भी उनसे यह हरगिज़ क़बूल नहीं किया जाएगा। क्योंकि कुफ़्र पर मौत पाने वालों के लिए कोई मुआवज़ा या छुटकारा नहीं है। अल्लाह का फ़ैसला पहले ही सुना दिया गया है कि ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है, जो उन्हें हर तरफ़ से घेर लेगा और जिससे वे कभी निकल नहीं पाएँगे।

फ़ायदे:

  1. यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की रहमत और माफ़ी का दरवाज़ा इसी दुनिया में खुला है। जो कोई भी जीते-जी तौबा कर ले और ईमान ले आए, उसके लिए माफ़ी है, लेकिन मौत के बाद या क़ियामत के दिन कोई फिदया या मुआवज़ा क़बूल नहीं होगा।
  2. यह आयत हमें दुनिया की चीज़ों पर भरोसा न करने की तालीम देती है। चाहे इंसान के पास दुनिया भर का माल हो, वह उसे अल्लाह के अज़ाब से नहीं बचा सकता। नजात (मुक्ति) का रास्ता सिर्फ़ ईमान और नेक अमल है।
  3. यह आयत हमें अल्लाह के दीन की अहमियत समझाती है कि कुफ़्र और नाफ़रमानी की ज़िंदगी गुज़ारने के बाद पछताने का कोई फ़ायदा नहीं। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी के हर लम्हे को अल्लाह की इताअत (आज्ञाकारिता) में गुज़ारें और उसके दीन को अपनी सबसे बड़ी दौलत समझें।
  4. यह आयत हमें क़ियामत के दिन के अज़ाब की हक़ीक़त से आगाह करती है ताकि हम उससे डरें और अपने आपको उससे बचाने की कोशिश करें। डर और उम्मीद के बीच ज़िंदगी गुज़ारना ही मोमिन की पहचान है।


📜 आयत 34-38 — सूरा अल-माइदा

34إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِن قَبْلِ أَن تَقْدِرُوا عَلَيْهِمْ ۖ فَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
मगर (हॉ) जिन लोगों ने इससे पहले कि तुम इनपर क़ाबू पाओ तौबा कर लो तो उनका गुनाह बख्श दिया जाएगा क्योंकि समझ लो कि ख़ुदा बेशक बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
35يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَابْتَغُوا إِلَيْهِ الْوَسِيلَةَ وَجَاهِدُوا فِي سَبِيلِهِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा से डरते रहो और उसके (तक़र्रब (क़रीब होने) के) ज़रिये की जुस्तजू में रहो और उसकी राह में जेहाद करो ताकि तुम कामयाब हो जाओ
36إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْ أَنَّ لَهُم مَّا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا وَمِثْلَهُ مَعَهُ لِيَفْتَدُوا بِهِ مِنْ عَذَابِ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَا تُقُبِّلَ مِنْهُمْ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
इसमें शक नहीं कि जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया अगर उनके पास ज़मीन में जो कुछ (माल ख़ज़ाना) है (वह) सब बल्कि उतना और भी उसके साथ हो कि रोज़े क़यामत के अज़ाब का मुआवेज़ा दे दे (और ख़ुद बच जाए) तब भी (उसका ये मुआवेज़ा) कुबूल न किया जाएगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
37يُرِيدُونَ أَن يَخْرُجُوا مِنَ النَّارِ وَمَا هُم بِخَارِجِينَ مِنْهَا ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ مُّقِيمٌ
वह लोग तो चाहेंगे कि किसी तरह जहन्नुम की आग से निकल भागे मगर वहॉ से तो वह निकल ही नहीं सकते और उनके लिए तो दाएमी अज़ाब है
38وَالسَّارِقُ وَالسَّارِقَةُ فَاقْطَعُوا أَيْدِيَهُمَا جَزَاءً بِمَا كَسَبَا نَكَالًا مِّنَ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
और चोर ख्वाह मर्द हो या औरत तुम उनके करतूत की सज़ा में उनका (दाहिना) हाथ काट डालो ये (उनकी सज़ा) ख़ुदा की तरफ़ से है और ख़ुदा (तो) बड़ा ज़बरदस्त हिकमत वाला है
अल-माइदाकुरान सूची
120आयत
मदनीअवतरण स्थान
36आयत

अनुवाद — अल-माइदा 36

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Monday, September 28, 2026

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