अज़-ज़ारियात · 26/60
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ारियात
فَرَاغَ إِلَىٰ أَهْلِهِ فَجَاءَ بِعِجْلٍ سَمِينٍ ۝٢٦
Faraagha ilaaa ahlihee fajaaa`a bi`ijlin sameen
📖 हिंदी अर्थ
फिर अपने घर जाकर जल्दी से (भुना हुआ) एक मोटा ताज़ा बछड़ा ले आए

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَرَاغَ – चुपचाप गया, छिपकर गया
  • إِلَى أَهْلِهِ – अपने घरवालों के पास
  • عِجْلٍ سَمِينٍ – मोटा-ताज़ा बछड़ा (गोश्त के लिए)

तफ़सीर:

जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने मेहमानों (फ़रिश्तों) को देखा कि वे खाना नहीं खा रहे हैं, तो वे उनके प्रति सम्मान और आदर के कारण उन्हें खाना खिलाने के लिए बहुत उत्सुक हुए। वे चुपचाप और छिपकर अपने घर की तरफ गए, ताकि मेहमानों को पता न चले और वे शर्मिंदा न हों। उन्होंने अपने घर से एक मोटा-ताज़ा बछड़ा लिया, उसे ज़िबह किया, और उसे भूनकर अपने मेहमानों के सामने पेश किया। यह उनकी मेहमाननवाज़ी का उच्च आदर्श है कि उन्होंने अपने सबसे अच्छे और उत्तम माल में से अपने मेहमानों के लिए खाना तैयार किया।

यह घटना हमें सिखाती है कि मेहमाननवाज़ी ईमान का हिस्सा है। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने यह काम इतनी खुशी और इतनी मुहब्बत से किया कि वे खुद अपने हाथों से मेहमानों की खिदमत करने में लग गए। यह भी सबक है कि मेहमान को इज़्ज़त देनी चाहिए और उसे अपनी हैसियत के अनुसार अच्छे से अच्छा खाना खिलाना चाहिए। अल्लाह तआला ऐसे लोगों से मुहब्बत करता है जो दूसरों की खिदमत करते हैं और उनकी ज़रूरतों का ख्याल रखते हैं।

यहाँ से हमें यह भी सीख मिलती है कि नेकी और भलाई के कामों को चुपचाप और बिना दिखावे के करना चाहिए, क्योंकि इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने मेहमानों की खिदमत इस तरह की कि उन्हें पता भी नहीं चला कि वे खाने का इंतज़ाम करने गए थे। यही अल्लाह के नबियों की सुन्नत है कि वे भलाई को छिपाकर करते हैं ताकि उसमें रिया (दिखावा) न हो।

इस आयत से हमें यह भी पता चलता है कि मेहमाननवाज़ी में जल्दी करनी चाहिए और जो चीज़ सबसे अच्छी हो उसे मेहमान के सामने पेश करना चाहिए। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने पास जो कुछ भी था, उसमें से सबसे उत्तम चीज़ मेहमानों के लिए चुनी। यही अख़लाक़ है जो हमें अपने जीवन में अपनाना चाहिए। अल्लाह तआला हमें भी अपने नबियों की सुन्नत पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 24-28 — सूरा अज़-ज़ारियात

24هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ ضَيْفِ إِبْرَاهِيمَ الْمُكْرَمِينَ
क्या तुम्हारे पास इबराहीम के मुअज़िज़ मेहमानो (फ़रिश्तों) की भी ख़बर पहुँची है कि जब वह लोग उनके पास आए
25إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا ۖ قَالَ سَلَامٌ قَوْمٌ مُّنكَرُونَ
तो कहने लगे (सलामुन अलैकुम) तो इबराहीम ने भी (अलैकुम) सलाम किया (देखा तो) ऐसे लोग जिनसे न जान न पहचान
26فَرَاغَ إِلَىٰ أَهْلِهِ فَجَاءَ بِعِجْلٍ سَمِينٍ
फिर अपने घर जाकर जल्दी से (भुना हुआ) एक मोटा ताज़ा बछड़ा ले आए
27فَقَرَّبَهُ إِلَيْهِمْ قَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ
और उसे उनके आगे रख दिया (फिर) कहने लगे आप लोग तनाउल क्यों नहीं करते
28فَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةً ۖ قَالُوا لَا تَخَفْ ۖ وَبَشَّرُوهُ بِغُلَامٍ عَلِيمٍ
(इस पर भी न खाया) तो इबराहीम उनसे जो ही जी में डरे वह लोग बोले आप अन्देशा न करें और उनको एक दानिशमन्द लड़के की ख़ुशख़बरी दी
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अनुवाद — अज़-ज़ारियात 26

सूरा अज़-ज़ारियात आयत 26 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : फिर अपने घर जाकर जल्दी से (भुना हुआ) एक मोटा…

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Sunday, October 4, 2026

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