अज़-ज़ारियात · 25/60
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ारियात
إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا ۖ قَالَ سَلَامٌ قَوْمٌ مُّنكَرُونَ ۝٢٥
Iz dakhaloo `alaihi faqaaloo salaaman qaala salaamun qawmum munkaroon
📖 हिंदी अर्थ
तो कहने लगे (सलामुन अलैकुम) तो इबराहीम ने भी (अलैकुम) सलाम किया (देखा तो) ऐसे लोग जिनसे न जान न पहचान

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سَلَامًا: यानी हम आपको सलाम कहते हैं, अथवा यहाँ यह अर्थ है कि हम आप पर सलामती की दुआ करते हैं।
  • قَالَ سَلَامٌ: इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने जवाब में कहा: आप पर सलाम हो।
  • قَوْمٌ مُّنكَرُونَ: अजनबी लोग, जिन्हें हम नहीं पहचानते।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के उन मेहमानों का ज़िक्र करती है जो फ़रिश्ते थे और अल्लाह की तरफ़ से भेजे गए थे। जब ये फ़रिश्ते उनके घर आए, तो उन्होंने सलाम किया और कहा: "सलाम हो आप पर।" हज़रत इब्राहीम ने जवाब में कहा: "सलाम हो आप पर।" लेकिन उन्होंने अपने दिल में महसूस किया कि ये लोग तो अजनबी हैं, इन्हें तो हम पहचानते नहीं। यह बात उनके लिए हैरानी की वजह बनी, क्योंकि वे अपनी मेहमाननवाज़ी के लिए मशहूर थे और हमेशा मेहमानों का स्वागत करते थे, लेकिन इन लोगों को देखकर उन्हें अनजानापन महसूस हुआ।

इस आयत से हमें कई सबक मिलते हैं:

  1. सलाम का महत्व: इस्लाम में सलाम करना और सलाम का जवाब देना बहुत बड़ी नेकी है। यह आपसी मोहब्बत और भाईचारे का ज़रिया है। हज़रत इब्राहीम ने फ़रिश्तों को सलाम किया और उन्होंने जवाब दिया, यह हमारे लिए सीख है कि हम हमेशा सलाम का आदान-प्रदान करें।
  2. मेहमाननवाज़ी: हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत यह थी कि वे मेहमानों का खुशी से स्वागत करते थे। यहाँ भी उन्होंने अजनबी लोगों को देखकर उनका स्वागत किया और सलाम का जवाब दिया। हमें भी अपने मेहमानों का अच्छे से स्वागत करना चाहिए, चाहे वे जान-पहचान वाले हों या अजनबी।
  3. अल्लाह पर भरोसा: हज़रत इब्राहीम को शुरू में मेहमानों के बारे में जानकारी नहीं थी, लेकिन उन्होंने अल्लाह पर भरोसा रखा और उनकी मेहमाननवाज़ी की। यह हमें सिखाता है कि हमें हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और अच्छे काम करते रहना चाहिए।

यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह के फ़रिश्ते नेक लोगों के पास आते हैं और उन्हें सलाम करते हैं। यह उन लोगों के लिए सम्मान की बात है जो अल्लाह के नेक बंदे होते हैं। हमें भी चाहिए कि हम नेक बनें, ताकि अल्लाह की रहमत और उसके फ़रिश्तों की दुआएँ हमारे साथ हों।

इस क़िस्से से हमें यह भी पता चलता है कि अल्लाह अपने नबियों की कैसे इज़्ज़त करता है और उन्हें अपने फ़रिश्तों के ज़रिए ख़बरें देता है। यह हमारे लिए इमान की तक़वियत (मज़बूती) का ज़रिया है कि हम अल्लाह के नबियों पर ईमान लाएँ और उनके नक्शे-क़दम पर चलें।



📜 आयत 23-27 — अज़-ज़ारियात

23فَوَرَبِّ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ إِنَّهُ لَحَقٌّ مِّثْلَ مَا أَنَّكُمْ تَنطِقُونَ
तो आसमान व ज़मीन के मालिक की क़सम ये (क़ुरान) बिल्कुल ठीक है जिस तरह तुम बातें करते हो
24هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ ضَيْفِ إِبْرَاهِيمَ الْمُكْرَمِينَ
क्या तुम्हारे पास इबराहीम के मुअज़िज़ मेहमानो (फ़रिश्तों) की भी ख़बर पहुँची है कि जब वह लोग उनके पास आए
25إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا ۖ قَالَ سَلَامٌ قَوْمٌ مُّنكَرُونَ
तो कहने लगे (सलामुन अलैकुम) तो इबराहीम ने भी (अलैकुम) सलाम किया (देखा तो) ऐसे लोग जिनसे न जान न पहचान
26فَرَاغَ إِلَىٰ أَهْلِهِ فَجَاءَ بِعِجْلٍ سَمِينٍ
फिर अपने घर जाकर जल्दी से (भुना हुआ) एक मोटा ताज़ा बछड़ा ले आए
27فَقَرَّبَهُ إِلَيْهِمْ قَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ
और उसे उनके आगे रख दिया (फिर) कहने लगे आप लोग तनाउल क्यों नहीं करते
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अनुवाद — अज़-ज़ारियात 25

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Tuesday, August 18, 2026

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