अज़-ज़ारियात · 54/60
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ारियात
فَتَوَلَّ عَنْهُمْ فَمَا أَنتَ بِمَلُومٍ ۝٥٤
Fatawalla `anhum famaaa anta bimaloom
📖 हिंदी अर्थ
तो (ऐ रसूल) तुम इनसे मुँह फेर लो तुम पर तो कुछ इल्ज़ाम नहीं है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَتَوَلَّ عَنْهُمْ – उनसे मुँह फेर लो, उनकी ओर ध्यान देना बंद कर दो।
  • بِمَلُومٍ – मलामत किया गया, दोषी ठहराया गया, निन्दित।

व्याख्या:

हे नबी! जब ये मुशरिकीन आपकी दावत को ठुकरा चुके हैं और अपनी सरकशी पर अड़े हुए हैं, तो आप उनसे किनारा कर लें और उनके इनकार पर अपने दिल को परेशान न करें। आप पर कोई मलामत या इल्ज़ाम नहीं है, क्योंकि आपने अपना फर्ज़ पूरा कर दिया—उन्हें सच्चा पैग़ाम पहुँचा दिया, उन्हें सीधा रास्ता दिखा दिया और उन्हें अज़ाब से डरा दिया। अब जो हिदायत नहीं पाता, उसका वबाल उसी पर है। आपने जो ज़िम्मेदारी उठाई थी, वह आपने पूरी अदा कर दी। यही आपकी सबसे बड़ी सफलता है कि आपने पैग़ाम-ए-हक़ पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

दावती पहलू:

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी को एक बहुत बड़ी तसल्ली दे रहा है—कि जब आपने हक़ पहुँचा दिया, तो आप पर कोई इल्ज़ाम नहीं। यह हमारे लिए भी एक सबक़ है कि हमारा काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचाना है, लोगों को हिदायत देना हमारे बस में नहीं। अगर हमने दीन की बात साफ़-साफ़, ख़ुलूस के साथ पहुँचा दी, तो हमें अपने अंजाम की फ़िक्र नहीं करनी चाहिए। अल्लाह के दीन की नुसरत करने वालों को अल्लाह कभी नाकाम नहीं करता। यह आयत हर दाई-ए-इस्लाम के लिए हौसला है कि वह अपनी ज़िम्मेदारी निभाए, और बाक़ी अल्लाह पर छोड़ दे। जो लोग हक़ को ठुकराते हैं, उनका मामला अल्लाह के हवाले है—और अल्लाह बेहतरीन फ़ैसला करने वाला है।



📜 आयत 52-56 — अज़-ज़ारियात

52كَذَٰلِكَ مَا أَتَى الَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا قَالُوا سَاحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌ
इसी तरह उनसे पहले लोगों के पास जो पैग़म्बर आता तो वह उसको जादूगर कहते या सिड़ी दीवाना (बताते)
53أَتَوَاصَوْا بِهِ ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌ طَاغُونَ
ये लोग एक दूसरे को ऐसी बात की वसीयत करते आते हैं (नहीं) बल्कि ये लोग हैं ही सरकश
54فَتَوَلَّ عَنْهُمْ فَمَا أَنتَ بِمَلُومٍ
तो (ऐ रसूल) तुम इनसे मुँह फेर लो तुम पर तो कुछ इल्ज़ाम नहीं है
55وَذَكِّرْ فَإِنَّ الذِّكْرَىٰ تَنفَعُ الْمُؤْمِنِينَ
और नसीहत किए जाओ क्योंकि नसीहत मोमिनीन को फायदा देती है
56وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ
और मैने जिनों और आदमियों को इसी ग़रज़ से पैदा किया कि वह मेरी इबादत करें
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अनुवाद — अज़-ज़ारियात 54

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Tuesday, August 18, 2026

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