अन-नज्म · 26/62
अनुवाद उच्चारण — अन-नज्म
۞ وَكَم مِّن مَّلَكٍ فِي السَّمَاوَاتِ لَا تُغْنِي شَفَاعَتُهُمْ شَيْئًا إِلَّا مِن بَعْدِ أَن يَأْذَنَ اللَّهُ لِمَن يَشَاءُ وَيَرْضَىٰ ۝٢٦
Wa kam mim malakin fissamaawaati laa tughnee shafaa`atuhum shai`an illaa mim ba`di anyyaazanal laahu limany yashaaa`u wa yardaa
📖 हिंदी अर्थ
और आसमानों में बहुत से फरिश्ते हैं जिनकी सिफ़ारिश कुछ भी काम न आती, मगर ख़ुदा जिसके लिए चाहे इजाज़त दे दे और पसन्द करे उसके बाद (सिफ़ारिश कर सकते हैं)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَلَكٍ (मलक): फ़रिश्ता
  • لَا تُغْنِي (ला तुग़नी): कुछ भी लाभ नहीं पहुँचाती, काम नहीं आती
  • شَفَاعَة (शफ़ाअत): सिफ़ारिश
  • يَأْذَنَ (यअज़न): अनुमति देता है
  • يَشَاءُ (यशाउ): चाहता है
  • يَرْضَى (यरज़ा): प्रसन्न होता है, राज़ी होता है

विस्तृत व्याख्या:

यह आयत उन लोगों के भ्रम को दूर करने के लिए है जो यह समझते हैं कि फ़रिश्ते या अन्य पवित्र हस्तियाँ उनके लिए सिफ़ारिश कर सकती हैं, और वे उन्हें पूजते हैं या उनसे मदद माँगते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि आसमानों में कितने ही फ़रिश्ते मौजूद हैं, जो बहुत ऊँचे दर्जे और महान स्थान रखते हैं। लेकिन उनकी सिफ़ारिश भी किसी के किसी काम नहीं आ सकती, और न ही वे किसी को कोई लाभ पहुँचा सकते हैं — जब तक कि अल्लाह तआला स्वयं उन्हें सिफ़ारिश की अनुमति न दे।

यह सिफ़ारिश का मामला पूरी तरह से अल्लाह के इख़्तियार में है। वह जिसे चाहे सिफ़ारिश की इजाज़त देता है, और जिसके लिए चाहे उसकी सिफ़ारिश को क़बूल करता है। अल्लाह उसी व्यक्ति के लिए सिफ़ारिश को मंज़ूर करता है जिससे वह राज़ी होता है। और अल्लाह उस व्यक्ति से राज़ी नहीं होता जो उसके साथ किसी को शरीक ठहराता है, और न ही उस व्यक्ति के लिए सिफ़ारिश की अनुमति देता है जो उसके अलावा किसी और की पूजा करता है।

इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सारा अधिकार और सारा इख़्तियार केवल अल्लाह के हाथ में है। फ़रिश्ते, नबी और औलिया — सब अल्लाह के मुख़्तार (अधीन) हैं। वे अपनी मर्ज़ी से किसी की सिफ़ारिश नहीं कर सकते। इसलिए हमें अपनी सारी उम्मीदें और भरोसा केवल अल्लाह पर रखना चाहिए, और उसी से मदद माँगनी चाहिए। यही तौहीद (एकेश्वरवाद) की असली शिक्षा है — कि हम किसी को अल्लाह का भागीदार न ठहराएँ, और यह समझें कि हर भलाई और हर कामयाबी अल्लाह ही के हाथ में है।

यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह की रहमत और कृपा का दरवाज़ा हमेशा खुला है। जो व्यक्ति सच्चे दिल से अल्लाह की ओर रुजू करता है, उसकी इबादत करता है और उसके दीन पर चलता है, उसके लिए अल्लाह की रहमत और माफ़ी के दरवाज़े खुले हैं। अल्लाह अपने नेक बंदों से राज़ी होता है और उन्हें अपनी विशेष रहमत से नवाज़ता है।



📜 आयत 24-28 — अन-नज्म

24أَمْ لِلْإِنسَانِ مَا تَمَنَّىٰ
क्या जिस चीज़ की इन्सान तमन्ना करे वह उसे ज़रूर मिलती है
25فَلِلَّهِ الْآخِرَةُ وَالْأُولَىٰ
आख़ेरत और दुनिया तो ख़ास ख़ुदा ही के एख्तेयार में हैं
26۞ وَكَم مِّن مَّلَكٍ فِي السَّمَاوَاتِ لَا تُغْنِي شَفَاعَتُهُمْ شَيْئًا إِلَّا مِن بَعْدِ أَن يَأْذَنَ اللَّهُ لِمَن يَشَاءُ وَيَرْضَىٰ
और आसमानों में बहुत से फरिश्ते हैं जिनकी सिफ़ारिश कुछ भी काम न आती, मगर ख़ुदा जिसके लिए चाहे इजाज़त दे दे और पसन्द करे उसके बाद (सिफ़ारिश कर सकते हैं)
27إِنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ لَيُسَمُّونَ الْمَلَائِكَةَ تَسْمِيَةَ الْأُنثَىٰ
जो लोग आख़ेरत पर ईमान नहीं रखते वह फ़रिश्तों के नाम रखते हैं औरतों के से नाम हालॉकि उन्हें इसकी कुछ ख़बर नहीं
28وَمَا لَهُم بِهِ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ ۖ وَإِنَّ الظَّنَّ لَا يُغْنِي مِنَ الْحَقِّ شَيْئًا
वह लोग तो बस गुमान (ख्याल) के पीछे चल रहे हैं, हालॉकि गुमान यक़ीन के बदले में कुछ भी काम नहीं आया करता,
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Tuesday, August 18, 2026

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