अल-क़मर · 24/55
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़मर
فَقَالُوا أَبَشَرًا مِّنَّا وَاحِدًا نَّتَّبِعُهُ إِنَّا إِذًا لَّفِي ضَلَالٍ وَسُعُرٍ ۝٢٤
Faqaalooo a-basharam minnaa waahidan nattabi`uhooo innaa izal lafee dalaalinw wa su`ur
📖 हिंदी अर्थ
तो कहने लगे कि भला एक आदमी की जो हम ही में से हो उसकी पैरवीं करें ऐसा करें तो गुमराही और दीवानगी में पड़ गए

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَبَشَرًا – क्या एक इंसान (बशर)
  • مِنَّا – हममें से
  • وَاحِدًا – अकेला
  • نَتَّبِعُهُ – हम उसका अनुसरण करें
  • ضَلَالٍ – गुमराही, सत्य से भटकाव
  • سُعُرٍ – पागलपन, जुनून (यहाँ इसका अर्थ है: बुरा अंजाम या दीवानगी)

तफसीर:

जब नबी सालिह अलैहिस्सलाम ने समुद की क़ौम को तौहीद का पैग़ाम दिया और उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराया, तो उन्होंने अहंकार और हैरानी के साथ कहा: "क्या हम तुम्हारी बात मान लें? क्या हम अपने ही बीच से एक अकेले इंसान का अनुसरण करें?" उन्हें यह बात नागवार गुज़री कि एक साधारण इंसान, जो उन्हीं की तरह खाता-पीता है और उन्हीं के बीच रहता है, वह उन्हें राह दिखाने आया है। उन्होंने इसे अपनी बड़ाई के खिलाफ समझा और कहा: "अगर हमने ऐसा किया, तो हम सचमुच गुमराही और पागलपन में पड़ जाएँगे।"

यह उनकी नादानी और घमंड की पराकाष्ठा थी कि उन्होंने सच्चाई को नापने का पैमाना यह बना लिया कि पैग़म्बर उन्हीं में से एक इंसान क्यों है? वे यह भूल गए कि अल्लाह ने हमेशा इंसानों की हिदायत के लिए इंसान ही पैग़म्बर बनाए हैं, क्योंकि इंसान ही इंसान की भाषा और उसकी फ़ितरत को समझ सकता है। अल्लाह का यही क़ानून रहा है।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी सीख है कि हक़ को क़बूल करने में यह नहीं देखा जाता कि कहने वाला कौन है, बल्कि यह देखा जाता है कि कही गई बात कितनी सच्ची है। अगर कोई सच्चाई की तरफ बुलाता है, चाहे वह हमारे बीच का ही एक साधारण इंसान क्यों न हो, तो उसे क़बूल करना चाहिए। घमंड और बड़ाई का भाव इंसान को हक़ से दूर कर देता है और अंजाम बुरा होता है।

समुद की क़ौम ने इसी अहंकार की वजह से हक़ को ठुकराया और अल्लाह का अज़ाब उन पर आया। हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को इनकार और घमंड से पाक रखें और जब भी सच्चाई सामने आए, उसे खुशी से क़बूल करें। याद रखें, जो लोग हक़ को क़बूल करते हैं, अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत में इज़्ज़त देता है, और जो घमंड की वजह से हक़ को ठुकराते हैं, उनका अंजाम समुद की क़ौम जैसा होता है।



📜 आयत 22-26 — सूरा अल-क़मर

22وَلَقَدْ يَسَّرْنَا الْقُرْآنَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ
और हमने तो क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया, तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
23كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِالنُّذُرِ
(क़ौम) समूद ने डराने वाले (पैग़म्बरों) को झुठलाया
24فَقَالُوا أَبَشَرًا مِّنَّا وَاحِدًا نَّتَّبِعُهُ إِنَّا إِذًا لَّفِي ضَلَالٍ وَسُعُرٍ
तो कहने लगे कि भला एक आदमी की जो हम ही में से हो उसकी पैरवीं करें ऐसा करें तो गुमराही और दीवानगी में पड़ गए
25أَأُلْقِيَ الذِّكْرُ عَلَيْهِ مِن بَيْنِنَا بَلْ هُوَ كَذَّابٌ أَشِرٌ
क्या हम सबमें बस उसी पर वही नाज़िल हुई है (नहीं) बल्कि ये तो बड़ा झूठा तअल्ली करने वाला है
26سَيَعْلَمُونَ غَدًا مَّنِ الْكَذَّابُ الْأَشِرُ
उनको अनक़रीब कल ही मालूम हो जाएगा कि कौन बड़ा झूठा तकब्बुर करने वाला है
अल-क़मरकुरान सूची
55आयत
मक्कीअवतरण स्थान
24आयत

अनुवाद — अल-क़मर 24

सूरा अल-क़मर आयत 24 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : तो कहने लगे कि भला एक आदमी की जो हम…

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Friday, October 2, 2026

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