अल-क़मर · 34/55
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़मर
إِنَّا أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ حَاصِبًا إِلَّا آلَ لُوطٍ ۖ نَّجَّيْنَاهُم بِسَحَرٍ ۝٣٤
Innaa arsalnaa `alaihim haasiban illaaa aala Loot najjainaahum bisahar
📖 हिंदी अर्थ
तो हमने उन पर कंकर भरी हवा चलाई मगर लूत के लड़के बाले को हमने उनको अपने फज़ल व करम से पिछले ही को बचा लिया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • हासिबन (حَاصِبًا): वह तेज़ हवा जो पत्थर और कंकड़ बरसाती है।
  • आल-ए-लूत (آلَ لُوطٍ): हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) के घराने के लोग, यानी उनकी पत्नी के अलावा उनके अनुयायी और बेटियाँ।
  • बिसहर (بِسَحَرٍ): रात के आखिरी हिस्से में, सुबह से पहले का समय।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने क़ौम-ए-लूत पर अपना अज़ाब भेजा, जो एक भयानक आपदा थी — उन पर पत्थर बरसाने वाली हवा भेजी गई, जिसने उन्हें तबाह कर दिया। यह अज़ाब उनके कुकर्मों और नाफ़रमानी का नतीजा था। लेकिन अल्लाह की रहमत ने हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) और उनके घराने को इस अज़ाब से महफ़ूज़ रखा। अल्लाह ने उन्हें रात के आखिरी हिस्से (सहर के वक़्त) में वहाँ से निकाल लिया, ताकि वे इस तबाही से बच जाएँ।

यह अल्लाह की उस नेमत और करम का ज़रिया था, जो उसने अपने नबी और उनके साथियों पर किया। अल्लाह ने उन्हें इसलिए बचाया क्योंकि वे ईमानवाले थे और अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुकाने वाले थे। यह उन लोगों के लिए एक इनाम है जो अल्लाह पर ईमान लाते हैं, उसके शुक्रगुज़ार होते हैं और अपने नबी की पैरवी करते हैं।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह की रहमत उसके अज़ाब से बड़ी है। जो लोग अल्लाह की तरफ़ रुजू करते हैं और उसके रसूलों पर ईमान लाते हैं, अल्लाह उन्हें हर मुसीबत से निकाल लेता है। यहाँ तक कि जब पूरी क़ौम पर अज़ाब आता है, तो अल्लाह अपने नेक बंदों को उससे अलग कर लेता है। यह अल्लाह की सुन्नत (क़ानून) है जो हमेशा से रही है — वह अपने वली (दोस्त) बंदों को हर हाल में महफ़ूज़ रखता है।

इसलिए हमें चाहिए कि हम अल्लाह की इबादत में मज़बूती से जुड़े रहें, उसके हुक्मों की पैरवी करें और उसकी रहमत के तलबगार रहें। अल्लाह अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है और जो उसकी तरफ़ एक क़दम बढ़ाता है, अल्लाह उसकी तरफ़ दौड़कर आता है। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आख़िरत की हर मुसीबत से बचाता है और अल्लाह की जन्नत तक पहुँचाता है।



📜 आयत 32-36 — सूरा अल-क़मर

32وَلَقَدْ يَسَّرْنَا الْقُرْآنَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ
और हमने क़ुरान को नसीहत हासिल करने के वास्ते आसान कर दिया है तो कोई है जो नसीहत हासिल करे
33كَذَّبَتْ قَوْمُ لُوطٍ بِالنُّذُرِ
लूत की क़ौम ने भी डराने वाले (पैग़म्बरों) को झुठलाया
34إِنَّا أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ حَاصِبًا إِلَّا آلَ لُوطٍ ۖ نَّجَّيْنَاهُم بِسَحَرٍ
तो हमने उन पर कंकर भरी हवा चलाई मगर लूत के लड़के बाले को हमने उनको अपने फज़ल व करम से पिछले ही को बचा लिया
35نِّعْمَةً مِّنْ عِندِنَا ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِي مَن شَكَرَ
हम शुक्र करने वालों को ऐसा ही बदला दिया करते हैं
36وَلَقَدْ أَنذَرَهُم بَطْشَتَنَا فَتَمَارَوْا بِالنُّذُرِ
और लूत ने उनको हमारी पकड़ से भी डराया था मगर उन लोगों ने डराते ही में शक़ किया
अल-क़मरकुरान सूची
55आयत
मक्कीअवतरण स्थान
34आयत

अनुवाद — अल-क़मर 34

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Friday, October 2, 2026

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