अल-अनआम · 109/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِن جَاءَتْهُمْ آيَةٌ لَّيُؤْمِنُنَّ بِهَا ۚ قُلْ إِنَّمَا الْآيَاتُ عِندَ اللَّهِ ۖ وَمَا يُشْعِرُكُمْ أَنَّهَا إِذَا جَاءَتْ لَا يُؤْمِنُونَ ۝١٠٩
Wa aqsamoo billaahi jahda aimaanihim la`in jaaa`at hum Aayatul la yu`minunna bihaa; qul innamal Aayaatu `indal laahi wa maa yush`irukum annahaaa izaa jaaa`at laa yu`minoon
📖 हिंदी अर्थ
और उन लोगों ने ख़ुदा की सख्त सख्त क़समें खायीं कि अगर उनके पास कोई मौजिजा आए तो वह ज़रूर उस पर ईमान लाएँगे (ऐ रसूल) तुम कहो कि मौजिज़े तो बस ख़ुदा ही के पास हैं और तुम्हें क्या मालूम ये यक़ीनी बात है कि जब मौजिज़ा भी आएगा तो भी ये ईमान न लाएँगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ: अपनी क़समों में पूरी कोशिश और सख्ती करना, यानी हद से बढ़कर क़समें खाना।
  • آيَةٌ: कोई निशानी या चमत्कार जो उनके सुझाए अनुसार हो।
  • مَا يُشْعِرُكُمْ: तुम्हें क्या पता? या तुम्हें क्या बताएगा?

तफ़सीर (व्याख्या):

मक्का के मुशरिकीन (बहुदेववादी) अल्लाह की क़समें खाकर कहते थे कि अगर उनके पास कोई निशानी (चमत्कार) आ जाए — जैसे उन्होंने माँगा था कि फ़रिश्ते नाज़िल हों, मुरदे ज़िंदा हों, या पहाड़ सोने के हो जाएँ — तो वे ज़रूर ईमान लाएँगे। अल्लाह ने अपने नबी ﷺ को हुक्म दिया कि आप उन्हें जवाब दें: "ये निशानियाँ मेरे पास नहीं हैं कि मैं जब चाहूँ ला दूँ, बल्कि ये सब अल्लाह ही के इख्तियार में हैं। वही जब चाहे उन्हें भेज सकता है।" फिर अल्लाह फ़रमाता है: "और ऐ ईमानवालों! तुम्हें क्या खबर है कि जब वह निशानी आ जाएगी तो भी वे ईमान नहीं लाएँगे?" यानी उनकी क़समें और वादे झूठे हैं; अल्लाह को उनके हाल का पूरा इल्म है कि वे अपनी सख्ती और हठधर्मी की वजह से ईमान नहीं लाएँगे, चाहे कोई भी निशानी दिखा दी जाए। उनका मक़सद हक़ को मानना नहीं, बल्कि बहाने बनाना है।

फ़ायदे (सबक़):

  1. अल्लाह की क़समें खाकर झूठे वादे करना बहुत बड़ी ग़लती है; सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबानी क़समों से नहीं, बल्कि दिल की पाकी और अच्छे अमल से होता है।
  2. चमत्कारों का आना अल्लाह के हाथ में है, किसी नबी या इंसान के हाथ में नहीं। हमें अपनी अक़्ल और दिल से अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर करना चाहिए, न कि बहाने ढूँढ़ने चाहिए।
  3. जो लोग सच्चाई को नहीं मानना चाहते, उनके लिए कोई भी निशानी काफ़ी नहीं होती। इसलिए हमें अपने दिल को साफ़ रखना चाहिए और अल्लाह की हर निशानी से सबक़ लेना चाहिए।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि हम अपने अमल और नीयत को सुधारें, क्योंकि अल्लाह हमारे अंदर की बात जानता है — वह सिर्फ़ ज़ाहिरी बातों को नहीं देखता।
  5. मुसलमानों को चाहिए कि वे दूसरों के ईमान की चिंता में अपने फ़र्ज़ न भूलें; हमारा काम सच्चाई पहुँचाना है, हिदायत देना अल्लाह का काम है।


📜 आयत 107-111 — अल-अनआम

107وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ مَا أَشْرَكُوا ۗ وَمَا جَعَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ وَمَا أَنتَ عَلَيْهِم بِوَكِيلٍ
और अगर ख़ुदा चाहता तो ये लोग शिर्क ही न करते और हमने तुमको उन लोगों का निगेहबान तो बनाया नहीं है और न तुम उनके ज़िम्मेदार हो
108وَلَا تَسُبُّوا الَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ فَيَسُبُّوا اللَّهَ عَدْوًا بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ كَذَٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمْ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِم مَّرْجِعُهُمْ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और ये (मुशरेकीन) जिन की अल्लाह के सिवा (ख़ुदा समझ कर) इबादत करते हैं उन्हें तुम बुरा न कहा करो वरना ये लोग भी ख़ुदा को बिना समझें अदावत से बुरा (भला) कह बैठें (और लोग उनकी ख्वाहिश नफसानी के) इस तरह पाबन्द हुए कि गोया हमने ख़ुद हर गिरोह के आमाल उनको सॅवाकर अच्छे कर दिखाए फिर उन्हें तो (आख़िरकार) अपने परवरदिगार की तरफ लौट कर जाना है तब जो कुछ दुनिया में कर रहे थे ख़ुदा उन्हें बता देगा
109وَأَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ لَئِن جَاءَتْهُمْ آيَةٌ لَّيُؤْمِنُنَّ بِهَا ۚ قُلْ إِنَّمَا الْآيَاتُ عِندَ اللَّهِ ۖ وَمَا يُشْعِرُكُمْ أَنَّهَا إِذَا جَاءَتْ لَا يُؤْمِنُونَ
और उन लोगों ने ख़ुदा की सख्त सख्त क़समें खायीं कि अगर उनके पास कोई मौजिजा आए तो वह ज़रूर उस पर ईमान लाएँगे (ऐ रसूल) तुम कहो कि मौजिज़े तो बस ख़ुदा ही के पास हैं और तुम्हें क्या मालूम ये यक़ीनी बात है कि जब मौजिज़ा भी आएगा तो भी ये ईमान न लाएँगे
110وَنُقَلِّبُ أَفْئِدَتَهُمْ وَأَبْصَارَهُمْ كَمَا لَمْ يُؤْمِنُوا بِهِ أَوَّلَ مَرَّةٍ وَنَذَرُهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ
और हम उनके दिल और उनकी ऑंखें उलट पलट कर देंगे जिस तरह ये लोग कुरान पर पहली मरतबा ईमान न लाए और हम उन्हें उनकी सरकशी की हालत में छोड़ देंगे कि सरगिरदाँ (परेशान) रहें
111۞ وَلَوْ أَنَّنَا نَزَّلْنَا إِلَيْهِمُ الْمَلَائِكَةَ وَكَلَّمَهُمُ الْمَوْتَىٰ وَحَشَرْنَا عَلَيْهِمْ كُلَّ شَيْءٍ قُبُلًا مَّا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا إِلَّا أَن يَشَاءَ اللَّهُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ يَجْهَلُونَ
और (ऐ रसूल सच तो ये है कि) हम अगर उनके पास फरिश्ते भी नाज़िल करते और उनसे मुर्दे भी बातें करने लगते और तमाम (मख़फ़ी(छुपी)) चीज़ें (जैसे जन्नत व नार वग़ैरह) अगर वह गिरोह उनके सामने ला खड़े करते तो भी ये ईमान लाने वाले न थे मगर जब अल्लाह चाहे लेकिन उनमें के अक्सर नहीं जानते
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अनुवाद — अल-अनआम 109

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सूरा आयत 109/165 — अल-अनआम الأنعام (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अनआम सुनें, अल-अनआम अनुवाद, अल-अनआम mp3, अल-अनआम pdf. आयत 107–111. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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