अल-अनआम · 129/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَكَذَٰلِكَ نُوَلِّي بَعْضَ الظَّالِمِينَ بَعْضًا بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ ۝١٢٩
Wa kazaalika nuwallee ba`daz zaalimeena ba`dam bimaa kaanoo yaksiboon
📖 हिंदी अर्थ
और इसी तरह हम बाज़ ज़ालिमों को बाज़ का उनके करतूतों की बदौलत सरपरस्त बनाएँगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • नुवल्ली: हम अधिकार देंगे, हम प्रभुत्व देंगे, या हम संगत बनाएँगे।
  • बअज़ुल ज़ालिमीन: अत्याचारियों में से कुछ को।
  • बअज़न: कुछ दूसरों पर।
  • बिमा कानू यक्सिबून: उनके उन कर्मों के कारण जो वे कमाते थे (अर्थात् उनके पाप और अवज्ञा)।

तफ़सीर (व्याख्या):

जिस प्रकार हमने शैतानों को अविश्वासियों पर अधिकार दिया और उन्हें उनका साथी बना दिया, उसी प्रकार हम अत्याचारियों में से कुछ को दूसरे अत्याचारियों पर अधिकार देते हैं और उन्हें उनका साथी बना देते हैं। यह इस दुनिया में उनके उन कर्मों का परिणाम है जो वे कमाते हैं—अर्थात् उनके कुफ्र, पाप और अवज्ञा के कारण। जब लोग सत्य से मुँह मोड़ते हैं और अत्याचार पर डट जाते हैं, तो अल्लाह उन्हें उनके हाल पर छोड़ देता है और उनमें से कुछ को दूसरों पर हावी कर देता है, ताकि वे एक-दूसरे को बुराई की ओर उकसाएँ, भलाई से दूर करें और एक-दूसरे के अत्याचार का साधन बनें। यह उनकी कमाई का स्वाभाविक और न्यायपूर्ण परिणाम है।


फ़ायदे (लाभ और सबक):

  1. कर्मों का परिणाम: यह आयत स्पष्ट करती है कि अत्याचार और पाप का परिणाम केवल आख़िरत में ही नहीं, बल्कि दुनिया में भी भुगतना पड़ता है। जो लोग अल्लाह की अवज्ञा करते हैं, उन्हें अल्लाह उनके जैसे लोगों के हवाले कर देता है।
  2. सच्ची स्वतंत्रता: यह आयत हमें सिखाती है कि सच्ची स्वतंत्रता अल्लाह की आज्ञा का पालन करने में है। जो लोग अल्लाह से दूर हो जाते हैं, वे दूसरे अत्याचारियों के गुलाम बन जाते हैं।
  3. संगति का महत्व: यह आयत हमें अच्छी संगति चुनने की तालीम देती है। बुरे लोगों की संगति हमें बुराई की ओर ले जाती है, जबकि अच्छे लोगों की संगति हमें भलाई की ओर।
  4. अल्लाह की रहमत का द्वार: यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह न्यायपूर्ण है, लेकिन वह रहमत वाला भी है। जब तक हम पाप और अत्याचार से बाज़ आते हैं और उसकी ओर लौटते हैं, वह हमें क्षमा करने और हमारी स्थिति सुधारने के लिए तैयार है।
  5. ज़िम्मेदारी का एहसास: यह आयत हमें याद दिलाती है कि हमारे कर्मों का असर हमारे समाज पर पड़ता है। यदि हम अच्छाई फैलाएँगे, तो समाज में भलाई होगी, और यदि बुराई फैलाएँगे, तो अत्याचार और बुराई बढ़ेगी।


📜 आयत 127-131 — अल-अनआम

127۞ لَهُمْ دَارُ السَّلَامِ عِندَ رَبِّهِمْ ۖ وَهُوَ وَلِيُّهُم بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
उनके वास्ते उनके परवरदिगार के यहाँ अमन व चैन का घर (बेहश्त) है और दुनिया में जो कारगुज़ारियाँ उन्होने की थीं उसके ऐवज़ ख़ुदा उन का सरपरस्त होगा
128وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَمِيعًا يَا مَعْشَرَ الْجِنِّ قَدِ اسْتَكْثَرْتُم مِّنَ الْإِنسِ ۖ وَقَالَ أَوْلِيَاؤُهُم مِّنَ الْإِنسِ رَبَّنَا اسْتَمْتَعَ بَعْضُنَا بِبَعْضٍ وَبَلَغْنَا أَجَلَنَا الَّذِي أَجَّلْتَ لَنَا ۚ قَالَ النَّارُ مَثْوَاكُمْ خَالِدِينَ فِيهَا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ ۗ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ
और (ऐ रसूल वह दिन याद दिलाओ) जिस दिन ख़ुदा सब लोगों को जमा करेगा और शयातीन से फरमाएगा, ऐ गिरोह जिन्नात तुमने तो बहुतेरे आदमियों को (बहका बहका कर) अपनी जमाअत बड़ी कर ली (और) आदमियों से जो लोग (उन शयातीन के दुनिया में) दोस्त थे कहेंगे ऐ हमारे पालने वाले (दुनिया में) हमने एक दूसरे से फायदा हासिल किया और अपने किए की सज़ा पाने को, जो वक्त तू ने हमारे लिए मुअय्युन किया था अब हम अपने उस वक्त (क़यामत) में पहुँच गए ख़ुदा उसके जवाब में, फरमाएगा तुम सब का ठिकाना जहन्नुम है और उसमें हमेशा रहोगे मगर जिसे ख़ुदा चाहे (नजात दे) बेशक तेरा परवरदिगार हिकमत वाला वाक़िफकार है
129وَكَذَٰلِكَ نُوَلِّي بَعْضَ الظَّالِمِينَ بَعْضًا بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
और इसी तरह हम बाज़ ज़ालिमों को बाज़ का उनके करतूतों की बदौलत सरपरस्त बनाएँगे
130يَا مَعْشَرَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ أَلَمْ يَأْتِكُمْ رُسُلٌ مِّنكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ آيَاتِي وَيُنذِرُونَكُمْ لِقَاءَ يَوْمِكُمْ هَٰذَا ۚ قَالُوا شَهِدْنَا عَلَىٰ أَنفُسِنَا ۖ وَغَرَّتْهُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَشَهِدُوا عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا كَافِرِينَ
(फिर हम पूछेंगे कि क्यों) ऐ गिरोह जिन व इन्स क्या तुम्हारे पास तुम ही में के पैग़म्बर नहीं आए जो तुम तुमसे हमारी आयतें बयान करें और तुम्हें तुम्हारे उस रोज़ (क़यामत) के पेश आने से डराएँ वह सब अर्ज करेंगे (बेशक आए थे) हम ख़ुद अपने ऊपर आप अपने (ख़िलाफ) गवाही देते हैं (वाकई) उनको दुनिया की (चन्द रोज़) ज़िन्दगी ने उन्हें अंधेरे में डाल रखा और उन लोगों ने अपने ख़िलाफ आप गवाही दीं
131ذَٰلِكَ أَن لَّمْ يَكُن رَّبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرَىٰ بِظُلْمٍ وَأَهْلُهَا غَافِلُونَ
बेशक ये सब के सब काफिर थे और ये (पैग़म्बरों का भेजना सिर्फ) उस वजह से है कि तुम्हारा परवरदिगार कभी बस्तियों को ज़ुल्म ज़बरदस्ती से वहाँ के बाशिन्दों के ग़फलत की हालत में हलाक नहीं किया करता
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अनुवाद — अल-अनआम 129

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Tuesday, August 18, 2026

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