अल-अनआम · 29/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَقَالُوا إِنْ هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ ۝٢٩
Wa qaalooo in hiya illaa hayaatunad dunyaa wa maa nahnu bimab`ooseen
📖 हिंदी अर्थ
और कुफ्फार ये भी तो कहते हैं कि हमारी इस दुनिया ज़िन्दगी के सिवा कुछ भी नहीं और (क़यामत वग़ैरह सब ढकोसला है) हम (मरने के बाद) भी उठाए ही न जायेंगे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • إِنْ هِيَ إِلَّا – यह नहीं है, सिवाय इसके
  • حَيَاتُنَا الدُّنْيَا – हमारा सांसारिक जीवन
  • بِمَبْعُوثِينَ – दोबारा उठाए जाने वाले (जीवित किए जाने वाले)

तफसीर (व्याख्या):

ये आयत उन मुशरिकों (बहुदेववादियों) का कथन बयान कर रही है जो पुनरुत्थान (आख़िरत) को नकारते थे। वे कहते थे: "जीवन केवल यही दुनियावी ज़िंदगी है जो हम अभी जी रहे हैं। इसके बाद कोई जीवन नहीं, कोई हिसाब-किताब नहीं, और न ही हमें मरने के बाद दोबारा उठाया जाएगा।"

यह उनका अंतिम और निर्णायक रुख़ था—वे मृत्यु के बाद के जीवन को पूरी तरह अस्वीकार करते थे और केवल इसी दुनिया की भौतिक ज़िंदगी को ही सच मानते थे। उनका यह विश्वास उनके अहंकार, अज्ञानता और आख़िरत की चेतना से दूर होने का परिणाम था। वे सोचते थे कि मनुष्य केवल शरीर है, और शरीर के मिट्टी में मिल जाने के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता।

यह कथन उनके दिलों की सख़्ती और सत्य से मुँह मोड़ने की स्थिति को दर्शाता है। वे अपनी इसी दुनियावी ज़िंदगी में मस्त थे और उन्हें यक़ीन था कि मृत्यु के बाद कोई ज़िम्मेदारी या हिसाब नहीं होगा। उन्होंने अपनी इसी धारणा को अपना धर्म और मार्ग बना लिया था, और इसी के सहारे वे नबी की दावत को झुठलाते थे।

फ़ायदे (सबक़):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि आख़िरत पर ईमान (विश्वास) एक मुसलमान की पहचान है। जो लोग पुनरुत्थान को नकारते हैं, वे अपने जीवन को बेहद सीमित कर लेते हैं और केवल दुनिया की ख्वाहिशों में डूब जाते हैं।
  2. यह हमें याद दिलाती है कि यह दुनिया अंतिम जीवन नहीं है; यह तो एक परीक्षा का स्थान है। असली जीवन आख़िरत का है, जो कभी ख़त्म नहीं होगा।
  3. मृत्यु के बाद दोबारा उठाए जाने का विश्वास इंसान को ज़िम्मेदार बनाता है—वह अच्छे कर्म करता है, बुराई से बचता है, और अपने रब के सामने पेश होने की तैयारी करता है।
  4. यह आयत हमें सब्र और यक़ीन सिखाती है कि भले ही कितने ही लोग आख़िरत को नकारें, सच्चाई वही है जो अल्लाह ने बताई है। हमें अपने ईमान पर मज़बूती से क़ायम रहना चाहिए।
  5. इससे हमें यह भी सबक मिलता है कि दुनिया की चमक-दमक और भौतिक सुखों में खोकर हमें उस सच्चाई को नहीं भूलना चाहिए जो हमारे रब ने हमें बताई है। आख़िरत की तैयारी ही असली कामयाबी है।
🎧 सुनें

📜 आयत 27-31 — अल-अनआम

27وَلَوْ تَرَىٰ إِذْ وُقِفُوا عَلَى النَّارِ فَقَالُوا يَا لَيْتَنَا نُرَدُّ وَلَا نُكَذِّبَ بِآيَاتِ رَبِّنَا وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
(ऐ रसूल) अगर तुम उन लोगों को उस वक्त देखते (तो ताज्जुब करते) जब जहन्नुम (के किनारे) पर लाकर खड़े किए जाओगे तो (उसे देखकर) कहेगें ऐ काश हम (दुनिया में) फिर (दुबारा) लौटा भी दिए जाते और अपने परवरदिगार की आयतों को न झुठलाते और हम मोमिनीन से होते (मगर उनकी आरज़ू पूरी न होगी)
28بَلْ بَدَا لَهُم مَّا كَانُوا يُخْفُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَلَوْ رُدُّوا لَعَادُوا لِمَا نُهُوا عَنْهُ وَإِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ
बल्कि जो (बेईमानी) पहले से छिपाते थे आज (उसकी हक़ीक़त) उन पर खुल गयी और (हम जानते हैं कि) अगर ये लोग (दुनिया में) लौटा भी दिए जाएं तो भी जिस चीज़ की मनाही की गयी है उसे करें और ज़रुर करें और इसमें शक़ नहीं कि ये लोग ज़रुर झूठे हैं
29وَقَالُوا إِنْ هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ
और कुफ्फार ये भी तो कहते हैं कि हमारी इस दुनिया ज़िन्दगी के सिवा कुछ भी नहीं और (क़यामत वग़ैरह सब ढकोसला है) हम (मरने के बाद) भी उठाए ही न जायेंगे
30وَلَوْ تَرَىٰ إِذْ وُقِفُوا عَلَىٰ رَبِّهِمْ ۚ قَالَ أَلَيْسَ هَٰذَا بِالْحَقِّ ۚ قَالُوا بَلَىٰ وَرَبِّنَا ۚ قَالَ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
और (ऐ रसूल) अगर तुम उनको उस वक्त देखते (तो ताज्जुब करते) जब वे लोग ख़ुदा के सामने खड़े किए जाएंगें और ख़ुदा उनसे पूछेगा कि क्या ये (क़यामत का दिन) अब भी सही नहीं है वह (जवाब में) कहेगें कि (दुनिया में) इससे इन्कार करते थे
31قَدْ خَسِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِلِقَاءِ اللَّهِ ۖ حَتَّىٰ إِذَا جَاءَتْهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً قَالُوا يَا حَسْرَتَنَا عَلَىٰ مَا فَرَّطْنَا فِيهَا وَهُمْ يَحْمِلُونَ أَوْزَارَهُمْ عَلَىٰ ظُهُورِهِمْ ۚ أَلَا سَاءَ مَا يَزِرُونَ
उसकी सज़ा में अज़ाब (के मजे) चखो बेशक जिन लोगों ने क़यामत के दिन ख़ुदा की हुज़ूरी को झुठलाया वह बड़े घाटे में हैं यहाँ तक कि जब उनके सर पर क़यामत नागहा (एक दम आ) पहँचेगी तो कहने लगेगें ऐ है अफसोस हम ने तो इसमें बड़ी कोताही की (ये कहते जाएगे) और अपने गुनाहों का पुश्तारा अपनी अपनी पीठ पर लादते जाएंगे देखो तो (ये) क्या बुरा बोझ है जिसको ये लादे (लादे फिर रहे) हैं
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अनुवाद — अल-अनआम 29

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Tuesday, August 18, 2026

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