फिर ज़ालिम लोगों की जड़ काट दी गयी और सारे जहाँन के मालिक ख़ुदा का शुक्र है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
فَقُطِعَ دَابِرُ الْقَوْمِ: उन लोगों की जड़ काट दी गई, यानी उनका सफाया कर दिया गया और कोई बचा न रहा।
الظَّلَمُوا: जिन्होंने अत्याचार किया, यानी कुफ्र और अल्लाह के रसूलों को झुठलाने का अत्याचार।
وَالْحَمْدُ لِلَّهِ: सारी प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए है।
तफसीर (व्याख्या):
जब उन ज़ालिम क़ौमों ने हक़ को झुठलाया और अल्लाह के रसूलों की दावत को नकारा, और अपनी सरकशी और ज़ुल्म पर अड़े रहे, तो अल्लाह ने उन्हें जड़ से उखाड़ फेंका। उनका कोई निशान बाकी न रहा — न कोई बचा, न कोई उनका उत्तराधिकारी। यह अल्लाह की सुन्नत (रीति) है कि वह अपने दुश्मनों को हलाक करता है और अपने नबियों और औलिया की मदद करता है। इसलिए जब अल्लाह ने अपने रसूलों की मदद की और ज़ालिमों को हलाक किया, तो सारी प्रशंसा और शुक्र अल्लाह ही के लिए है, जो सारे जहानों का रब है — वही पैदा करने वाला, मालिक और प्रबंधक है। यहाँ "अल-हम्दु लिल्लाह" का ज़िक्र इसलिए किया गया कि अल्लाह की नेमत और उसके इंसाफ़ पर शुक्र अदा किया जाए, क्योंकि उसने सच्चाई को बुलंद किया और बातिल को मिटा दिया।
फ़ायदे (सबक):
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह का कानून अटल है — ज़ुल्म और सरकशी का अंजाम तबाही है, चाहे ज़ालिम कितना भी ताकतवर क्यों न हो।
अल्लाह अपने नेक बंदों और अपने दीन की हमेशा मदद करता है, भले ही वह देर से हो, लेकिन फतह (विजय) उसी की होती है।
हर हाल में अल्लाह की हम्द (प्रशंसा) करनी चाहिए — खुशी में भी और गम में भी, क्योंकि उसका हर फैसला हिकमत (बुद्धिमत्ता) पर आधारित होता है।
यह आयत मुसलमानों को हौसला देती है कि वे हक़ पर डटे रहें, क्योंकि अंजाम उन्हीं के हक़ में अच्छा होता है, और बातिल (झूठ) का अंत मिटना ही है।
"अल-हम्दु लिल्लाह" का यहाँ आना हमें सिखाता है कि नेमत मिलने पर और दुश्मनों पर फतह पाने पर अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए, और यही मोमिन की पहचान है।
और तकलीफ़ में गिरफ्तार किया ताकि वह लोग (हमारी बारगाह में) गिड़गिड़ाए तो जब उन (के सर) पर हमारा अज़ाब आ खड़ा हुआ तो वह लोग क्यों नहीं गिड़गिड़ाए (कि हम अज़ाब दफा कर देते) मगर उनके दिल तो सख्त हो गए थे ओर उनकी कारस्तानियों को शैतान ने आरास्ता कर दिखाया था (फिर क्योंकर गिड़गिड़ाते)
फिर जिसकी उन्हें नसीहत की गयी थी जब उसको भूल गए तो हमने उन पर (ढील देने के लिए) हर तरह की (दुनियावी) नेअमतों के दरवाज़े खोल दिए यहाँ तक कि जो नेअमतें उनको दी गयी थी जब उनको पाकर ख़ुश हुए तो हमने उन्हें नागाहाँ (एक दम) ले डाला तो उस वक्त वह नाउम्मीद होकर रह गए
(कि क़िस्सा पाक हुआ) (ऐ रसूल) उनसे पूछो तो कि क्या तुम ये समझते हो कि अगर ख़ुदा तुम्हारे कान और तुम्हारी ऑंखे लें ले और तुम्हारे दिलों पर मोहर कर दे तो ख़ुदा के सिवा और कौन मौजूद है जो (फिर) तुम्हें ये नेअमतें (वापस) दे (ऐ रसूल) देखो तो हम किस किस तरह अपनी दलीले बयान करते हैं इस पर भी वह लोग मुँह मोडे ज़ाते हैं
(ऐ रसूल) उनसे पूछो कि क्या तुम ये समझते हो कि अगर तुम्हारे सर पर ख़ुदा का अज़ाब बेख़बरी में या जानकारी में आ जाए तो क्या गुनाहगारों के सिवा और लोग भी हलाक़ किए जाएंगें (हरगिज़ नहीं)
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