الرِّجْزَ: अज़ाब (यातना), जो उन पर बीमारी और मुसीबत के रूप में आई थी।
إِلَىٰ أَجَلٍ هُم بَالِغُوهُ: एक निश्चित समय तक, जिसे वे अवश्य पा लेंगे (यानी उनके डूबने का समय)।
يَنكُثُونَ: वचन तोड़ना, अहद ख़िलाफ़ी करना।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब हमने उन (फ़िरऔन की क़ौम) से वह यातना हटा दी, जो हमने उन पर उनकी सरकशी की वजह से भेजी थी — जैसे पानी की कमी, फ़सलों की बर्बादी, टिड्डियाँ, जूँ, मेंढक और ख़ून — तो हमने उन्हें एक निश्चित अवधि तक के लिए मोहलत दी, जो उनके अंजाम (डूबने) का समय था। उन्होंने मूसा (अलैहिस्सलाम) से वादा किया था कि अगर अज़ाब हट जाए तो वे ईमान लाएँगे और बनी इसराईल को उनके साथ जाने देंगे। लेकिन जैसे ही अज़ाब हटा और उन्हें कुछ राहत मिली, उन्होंने तुरंत अपना वचन तोड़ दिया। वे अपने कुफ़्र और गुमराही पर क़ायम रहे, और बनी इसराईल को आज़ाद करने से इनकार कर दिया। यह उनकी आदत थी कि हर मुसीबत में वे झुक जाते थे, लेकिन राहत मिलते ही अपने वादों से मुकर जाते थे।
फ़ायदे (सीख):
वचन तोड़ना बड़ी बुराई है: अल्लाह ने फ़िरऔनियों का यह हाल बयान किया कि उन्होंने बार-बार वादा किया और हर बार तोड़ा। यह हमारे लिए सबक़ है कि अल्लाह और इंसानों से किया गया वादा निभाना ईमान का हिस्सा है। वादा तोड़ने वाला अल्लाह की नज़र में बेईमान है।
अज़ाब सिर्फ़ आख़िरत के लिए नहीं: अल्लाह दुनिया में भी लोगों को उनकी ग़लतियों की सज़ा देता है, लेकिन वह मोहलत भी देता है। यह उसकी रहमत है कि वह फ़ौरन पकड़ नहीं लेता, बल्कि तौबा का मौक़ा देता है। हमें इस मोहलत को ग़नीमत समझकर अल्लाह की तरफ़ लौटना चाहिए।
मुसीबत में नम्र होना और राहत में सरकशी — मुनाफ़िक़ों की आदत: जब इंसान मुसीबत में होता है तो अल्लाह को याद करता है, लेकिन जब राहत मिलती है तो भूल जाता है। यह कमज़ोर ईमान की निशानी है। सच्चा मोमिन वह है जो हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करे और अपने अहद पर क़ायम रहे।
अल्लाह की सुन्नत (क़ानून): अल्लाह जब किसी ज़ालिम क़ौम को सज़ा देने का फ़ैसला कर लेता है, तो कोई मोहलत उसे नहीं बचा सकती। फ़िरऔनियों को कई बार मौक़ा मिला, लेकिन उन्होंने हर बार उसे ठुकरा दिया, आख़िरकार वे डूब गए। यह हमें बताता है कि अल्लाह की पकड़ से बचना नामुमकिन है, इसलिए हमें उसकी नाफ़रमानी से बचना चाहिए।
तब हमने उन पर (पानी को) तूफान और टिड़डियाँ और जुएं और मेंढ़कों और खून (का अज़ाब भेजा कि सब जुदा जुदा (हमारी कुदरत की) निशानियाँ थी उस पर भी वह लोग तकब्बुर ही करते रहें और वह लोग गुनेहगार तो थे ही
(और जब उन पर अज़ाब आ पड़ता तो कहने लगते कि ऐ मूसा तुम से जो ख़ुदा ने (क़बूल दुआ का) अहद किया है उसी की उम्मीद पर अपने ख़ुदा से दुआ माँगों और अगर तुमने हम से अज़ाब को टाल दिया तो हम ज़रूर भेज देगें
और जिन बेचारों को ये लोग कमज़ोर समझते थे उन्हीं को (मुल्क शाम की) ज़मीन का जिसमें हमने (ज़रखेज़ होने की) बरकत दी थी उसके पूरब पश्चिम (सब) का वारिस (मालिक) बना दिया और चूंकि बनी इसराईल नें (फिरऔन के ज़ालिमों) पर सब्र किया था इसलिए तुम्हारे परवरदिगार का नेक वायदा (जो उसने बनी इसराइल से किया था) पूरा हो गया और जो कुछ फिरऔन और उसकी क़ौम के लोग करते थे और जो ऊँची ऊँची इमारते बनाते थे सब हमने बरबाद कर दी
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