अल-आराफ · 197/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
وَالَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ ۝١٩٧
Wallazeena tad`oona min doonihee laa yastatee`oona nasrakum wa laaa anfusahum yansuroon
📖 हिंदी अर्थ
और वह लोग (बुत) जिन्हें तुम ख़ुदा के सिवा (अपनी मदद को) पुकारते हो न तो वह तुम्हारी मदद की कुदरत रखते हैं और न ही अपनी मदद कर सकते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَدْعُونَ – तुम पुकारते हो / उसे पुकारते हो
  • مِن دُونِهِ – उसे (अल्लाह) छोड़कर
  • لَا يَسْتَطِيعُونَ – वे सामर्थ्य नहीं रखते
  • نَصْرَكُمْ – तुम्हारी सहायता करना
  • وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ – और न ही वे अपनी ही सहायता कर सकते हैं

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मुशरिकीन को सम्बोधित करते हुए फ़रमा रहे हैं कि जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो—चाहे वे मूर्तियाँ हों, देवता हों, या कोई और माबूद—वे न तो तुम्हारी कोई सहायता कर सकते हैं और न ही अपनी ही रक्षा करने की शक्ति रखते हैं। वे पूर्ण रूप से असमर्थ और लाचार हैं। यदि उन पर कोई संकट आ जाए, कोई हानि पहुँचाना चाहे, या उन्हें कोई क्षति पहुँचे, तो वे स्वयं को भी नहीं बचा सकते। फिर ऐसे बेबस और विवश प्राणियों को अल्लाह के साथ साझीदार कैसे बनाया जा सकता है? उनसे सहायता की आशा कैसे की जा सकती है? यह बात पहले भी कही जा चुकी है, और यहाँ दोहराई गई है ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि ये माबूद न तो कोई लाभ पहुँचा सकते हैं और न ही कोई हानि। वे न तो किसी की मदद कर सकते हैं, न किसी को नुक़सान पहुँचा सकते हैं, और न ही अपनी ही रक्षा कर सकते हैं। ऐसी हालत में उन्हें पुकारना, उनसे मदद माँगना, और उनकी पूजा करना पूर्ण मूर्खता और भ्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि सच्ची सहायता और मदद केवल अल्लाह ही से माँगनी चाहिए, क्योंकि वही सब कुछ करने पर सक्षम है।
  2. हमें यह समझाती है कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी और से मदद माँगना—चाहे वह कोई भी हो—बेकार और निरर्थक है, क्योंकि वे स्वयं असमर्थ हैं।
  3. यह आयत तौहीद (एकेश्वरवाद) की सच्चाई को स्थापित करती है और शिर्क की बेबुनियादी को उजागर करती है।
  4. हमें यह शिक्षा देती है कि अपनी आशाओं और भरोसे को केवल अल्लाह पर ही केन्द्रित करना चाहिए, क्योंकि वही सुनने वाला, देखने वाला और हर चीज़ पर क़ादिर है।
  5. यह आयत हमें अल्लाह की महानता और उसकी शक्ति का एहसास कराती है, जिससे हमारे दिलों में उसके प्रति प्रेम, सम्मान और भरोसा बढ़ता है, और हम उसकी इबादत में सच्चे और मुख़लिस बनते हैं।


📜 आयत 195-199 — सूरा अल-आराफ

195أَلَهُمْ أَرْجُلٌ يَمْشُونَ بِهَا ۖ أَمْ لَهُمْ أَيْدٍ يَبْطِشُونَ بِهَا ۖ أَمْ لَهُمْ أَعْيُنٌ يُبْصِرُونَ بِهَا ۖ أَمْ لَهُمْ آذَانٌ يَسْمَعُونَ بِهَا ۗ قُلِ ادْعُوا شُرَكَاءَكُمْ ثُمَّ كِيدُونِ فَلَا تُنظِرُونِ
क्या उनके ऐसे पॉव भी हैं जिनसे चल सकें या उनके ऐसे हाथ भी हैं जिनसे (किसी चीज़ को) पकड़ सके या उनकी ऐसी ऑखे भी है जिनसे देख सकें या उनके ऐसे कान हैं जिनसे सुन सकें (ऐ रसूल उन लोगों से) कह दो कि तुम अपने बनाए हुए शरीको को बुलाओ फिर सब मिलकर मुझ पर दॉव चले फिर (मुझे) मोहलत न दो
196إِنَّ وَلِيِّيَ اللَّهُ الَّذِي نَزَّلَ الْكِتَابَ ۖ وَهُوَ يَتَوَلَّى الصَّالِحِينَ
(फिर देखो मेरा क्या बना सकते हो) बेशक मेरा मालिक व मुमताज़ तो बस ख़ुदा है जिस ने किताब क़ुरान को नाज़िल फरमाया और वही (अपने) नेक बन्दों का हाली (मददगार) है
197وَالَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَا أَنفُسَهُمْ يَنصُرُونَ
और वह लोग (बुत) जिन्हें तुम ख़ुदा के सिवा (अपनी मदद को) पुकारते हो न तो वह तुम्हारी मदद की कुदरत रखते हैं और न ही अपनी मदद कर सकते हैं
198وَإِن تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَىٰ لَا يَسْمَعُوا ۖ وَتَرَاهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ
और अगर उन्हें हिदायत की तरफ बुलाएगा भी तो ये सुन ही नहीं सकते और तू तो समझता है कि वह तुझे (ऑखें खोले) देख रहे हैं हालॉकि वह देखते नहीं
199خُذِ الْعَفْوَ وَأْمُرْ بِالْعُرْفِ وَأَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِلِينَ
(ऐ रसूल) तुम दरगुज़र करना एख्तियार करो और अच्छे काम का हुक्म दो और जाहिलों की तरफ से मुह फेर लो
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
197आयत

अनुवाद — अल-आराफ 197

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Thursday, October 1, 2026

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