अल-आराफ · 5/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
فَمَا كَانَ دَعْوَاهُمْ إِذْ جَاءَهُم بَأْسُنَا إِلَّا أَن قَالُوا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ ۝٥
Famaa kaana da`waahum iz jaaa`ahum baasunaa illaaa an qaalooo innaa kunnaa zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
कि वह लोग या तो रात की नींद सो रहे थे या दिन को क़लीला (खाने के बाद का लेटना) कर रहे थे तब हमारा अज़ाब उन पर आ पड़ा तो उनसे सिवाए इसके और कुछ न कहते बन पड़ा कि हम बेशक ज़ालिम थे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • دَعْوَاهُمْ: उनकी पुकार, उनका कहना, या उनकी दुहाई।
  • بَأْسُنَا: हमारी यातना, हमारा कठोर दंड, हमारा प्रकोप।
  • إِلَّا أَن قَالُوا: इसके अलावा कुछ नहीं कि उन्होंने कहा।
  • ظَالِمِينَ: अत्याचारी, ज़ालिम, अपने ऊपर ज़ुल्म करने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब इन ज़ालिम क़ौमों पर हमारा अज़ाब आया, यानी जब अल्लाह की यातना उन्हें घेरने लगी और वे मौत के मंज़र देखने लगे, तो उस वक़्त उनकी जुबान से कोई दुआ, कोई तौबा या कोई पुकार न निकली। उनकी आख़िरी आवाज़ सिर्फ़ यही थी कि उन्होंने अपने ज़ुल्म का इक़रार किया और कहा: "बेशक हम ज़ालिम थे।" यानी उन्होंने अपने कु़फ़्र, अपनी सरकशी और अपने गुनाहों को ख़ुद स्वीकार कर लिया। मगर यह इक़रार उस वक़्त किया गया जब इक़रार का कोई फ़ायदा नहीं था, क्योंकि अज़ाब आ चुका था और तौबा का दरवाज़ा बंद हो चुका था। यह स्वीकारोक्ति उनके लिए न तो नजात का ज़रिया बनी और न ही अज़ाब को टाल सकी। यह उनके हाल का इज़हार था, जो उनकी हार और बर्बादी की गवाही बन गया।


फ़ायदे (लाभ और सबक़):

  1. तौबा का वक़्त मुहिम है: इंसान को चाहिए कि वह अज़ाब आने से पहले, ज़िंदगी के हर लम्हे में गुनाहों से तौबा करे। जब अज़ाब आ जाए, तो तौबा का कोई फ़ायदा नहीं रहता। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा खुला है, लेकिन हमें जल्दी करनी चाहिए।
  2. ज़ुल्म का अंजाम बुरा होता है: जो लोग अल्लाह की आयतों को झुठलाते हैं और अपनी सरकशी पर अड़े रहते हैं, उनका अंजाम यही होता है कि वे अपने ज़ुल्म का इक़रार करें, लेकिन तब किसी काम का नहीं रहता। यह हमें ज़ुल्म और सरकशी से बचने की तरग़ीब देता है।
  3. अल्लाह की पकड़ कठोर है: यह आयत हमें याद दिलाती है कि अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है। जब वह किसी क़ौम को पकड़ता है, तो कोई ताक़त उसे नहीं बचा सकती। इसलिए हमें अल्लाह के अज़ाब से डरना चाहिए और उसकी नाफ़रमानी से बचना चाहिए।
  4. इक़रार का फ़ायदा दुनिया में नहीं, आख़िरत में है: अगर इंसान दुनिया में अपने गुनाहों का इक़रार करके तौबा कर ले, तो अल्लाह उसे माफ़ कर देता है। लेकिन अज़ाब आने के बाद का इक़रार बेकार है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपनी ग़लतियों को मानने और सुधारने में देर नहीं करनी चाहिए।
  5. क़ुरआन की नसीहत: यह आयत हमें बताती है कि क़ुरआन सिर्फ़ कहानियाँ नहीं सुनाता, बल्कि हर क़िस्से से हमें सबक़ लेना है। हमें पिछली क़ौमों के हालात से इबरत हासिल करनी चाहिए ताकि हम उनकी तरह अज़ाब का शिकार न हों।
🎧 सुनें

📜 आयत 3-7 — अल-आराफ

3اتَّبِعُوا مَا أُنزِلَ إِلَيْكُم مِّن رَّبِّكُمْ وَلَا تَتَّبِعُوا مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ ۗ قَلِيلًا مَّا تَذَكَّرُونَ
तुम्हारे दिल में उसकी वजह से कोई न तंगी पैदा हो (लोगों) जो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल किया गया है उसकी पैरवी करो और उसके सिवा दूसरे (फर्ज़ी) बुतों (माबुदों) की पैरवी न करो
4وَكَم مِّن قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا فَجَاءَهَا بَأْسُنَا بَيَاتًا أَوْ هُمْ قَائِلُونَ
तुम लोग बहुत ही कम नसीहत क़ुबूल करते हो और क्या (तुम्हें) ख़बर नहीं कि ऐसी बहुत सी बस्तियाँ हैं जिन्हें हमने हलाक कर डाला तो हमारा अज़ाब (ऐसे वक्त) आ पहुचा
5فَمَا كَانَ دَعْوَاهُمْ إِذْ جَاءَهُم بَأْسُنَا إِلَّا أَن قَالُوا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ
कि वह लोग या तो रात की नींद सो रहे थे या दिन को क़लीला (खाने के बाद का लेटना) कर रहे थे तब हमारा अज़ाब उन पर आ पड़ा तो उनसे सिवाए इसके और कुछ न कहते बन पड़ा कि हम बेशक ज़ालिम थे
6فَلَنَسْأَلَنَّ الَّذِينَ أُرْسِلَ إِلَيْهِمْ وَلَنَسْأَلَنَّ الْمُرْسَلِينَ
फिर हमने तो ज़रूर उन लोगों से जिनकी तरफ पैग़म्बर भेजे गये थे (हर चीज़ का) सवाल करेगें और ख़ुद पैग़म्बरों से भी ज़रूर पूछेगें
7فَلَنَقُصَّنَّ عَلَيْهِم بِعِلْمٍ ۖ وَمَا كُنَّا غَائِبِينَ
फिर हम उनसे हक़ीक़त हाल ख़ूब समझ बूझ के (ज़रा ज़रा) दोहराएगें
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अनुवाद — अल-आराफ 5

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Tuesday, August 18, 2026

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