अल-मुद्दस्सिर · 15/56
अनुवाद उच्चारण — अल-मुद्दस्सिर
ثُمَّ يَطْمَعُ أَنْ أَزِيدَ ۝١٥
Summa yat ma`u an azeed
📖 हिंदी अर्थ
फिर उस पर भी वह तमाअ रखता है कि मैं और बढ़ाऊँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَطْمَعُ: लालच करता है, आशा रखता है।
  • أَزِيدَ: मैं (अल्लाह) और अधिक दूँ।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस व्यक्ति के बारे में है जिसे अल्लाह ने बहुत कुछ दिया था—धन, संतान, और सुख-सुविधाएँ—लेकिन उसने कृतज्ञता नहीं दिखाई, बल्कि सत्य का विरोध किया। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि उसने उसे अकेला पैदा किया, फिर उसे फैला हुआ धन दिया, उसके पास हमेशा मौजूद रहने वाले बेटे दिए, और उसके लिए जीवन के साधन आसान कर दिए। इस सबके बावजूद, वह और अधिक की लालच रखता है कि अल्लाह उसे और दे। वह यह नहीं सोचता कि यह सब अल्लाह की ओर से एक परीक्षा है, बल्कि वह अहंकार में आकर कहता है कि मुझे और चाहिए।

यह आयत उस व्यक्ति (वलीद बिन मुग़ीरा) के बारे में है जो कुरआन और सच्चाई का दुश्मन था। उसे जो कुछ मिला, उसने उसे अल्लाह की राह में नहीं लगाया, बल्कि सत्य का मुक़ाबला किया। अल्लाह फ़रमाता है: "नहीं! ऐसा नहीं है जैसा वह चाहता है। मैं उसे और नहीं दूँगा, बल्कि उसे कठोर यातना का सामना करना पड़ेगा।"

इस आयत से हमें सीख मिलती है कि अल्लाह की नेमतें (उपहार) हमारी परीक्षा हैं, न कि हमारी योग्यता का प्रमाण। जो व्यक्ति अल्लाह के दिए हुए पर शुक्र नहीं करता और और अधिक की लालच में पड़कर सत्य का इनकार करता है, उसका अंजाम बहुत बुरा होता है। अल्लाह उसे उसकी सरकशी (अवज्ञा) की सज़ा देगा।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अल्लाह की दी हुई हर नेमत पर संतोष करना चाहिए और शुक्र अदा करना चाहिए। लालच और अहंकार इंसान को अल्लाह से दूर कर देते हैं। हमें चाहिए कि जो कुछ अल्लाह ने दिया है, उसे उसी की राह में खर्च करें और उसकी इबादत में लगे रहें। याद रखें, अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो शुक्रगुज़ार हैं, और वह उन्हें और देता है। लेकिन जो कुफ़्रान (नाशुक्री) करता है, उसके लिए अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है। हमें इस दुनिया की चीज़ों के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि अल्लाह की रज़ा (प्रसन्नता) को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए।



📜 आयत 13-17 — अल-मुद्दस्सिर

13وَبَنِينَ شُهُودًا
और नज़र के सामने रहने वाले बेटे (दिए)
14وَمَهَّدتُّ لَهُ تَمْهِيدًا
और उसे हर तरह के सामान से वुसअत दी
15ثُمَّ يَطْمَعُ أَنْ أَزِيدَ
फिर उस पर भी वह तमाअ रखता है कि मैं और बढ़ाऊँ
16كَلَّا ۖ إِنَّهُ كَانَ لِآيَاتِنَا عَنِيدًا
ये हरगिज़ न होगा ये तो मेरी आयतों का दुश्मन था
17سَأُرْهِقُهُ صَعُودًا
तो मैं अनक़रीब उस सख्त अज़ाब में मुब्तिला करूँगा
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अनुवाद — अल-मुद्दस्सिर 15

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Tuesday, August 18, 2026

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