अल-फज्र · 17/30
अनुवाद उच्चारण — अल-फज्र
كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ الْيَتِيمَ ۝١٧
Kalla bal laa tukrimooo nal yateem
📖 हिंदी अर्थ
हरगिज़ नहीं बल्कि तुम लोग न यतीम की ख़ातिरदारी करते हो
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • कल्ला (كَلَّا): हरगिज़ नहीं, ऐसा नहीं है।
  • बल (بَلْ): बल्कि, इसके विपरीत।
  • तुकरिमून (تُكْرِمُونَ): तुम सम्मान करते हो, आदर-सत्कार करते हो।
  • अल-यतीम (الْيَتِيمَ): अनाथ बच्चा जिसका पिता मर चुका हो और वह अभी बालिग़ न हुआ हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में इंसान की उस ग़लत फ़हमी का खंडन कर रहे हैं जो वह दौलत और ग़रीबी के बारे में रखता है। इंसान अक्सर यह समझता है कि जिसे अल्लाह ने माल-दौलत दी, वह उसका पसंदीदा बंदा है, और जो ग़रीब या मुसीबत में है, वह अल्लाह की नज़र में बेइज़्ज़त है। अल्लाह फ़रमाता है: "हरगिज़ नहीं!" — यह बिल्कुल ग़लत सोच है। असली इज़्ज़त और रुसवाई का पैमाना माल-दौलत नहीं, बल्कि अल्लाह की इताअत और नाफ़रमानी है।

फिर अल्लाह तआला उनके अमल की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाता है: "बल्कि तुम लोग अनाथ की इज़्ज़त नहीं करते!" — यानी तुम्हारा अमल तुम्हारे क़ौल से भी बदतर है। तुम अनाथ बच्चों के साथ अच्छा सुलूक नहीं करते, उन्हें अपने माल में से हिस्सा नहीं देते, उनकी परवरिश और देखभाल का हक़ अदा नहीं करते। जबकि अनाथ वह मासूम होता है जिसका सहारा — उसका पिता — चला गया हो, और वह तुम्हारी रहमत और मदद का सबसे ज़्यादा मुहताज होता है।

इस आयत में अल्लाह तआला हमें सिखाता है कि असली नेकी और इज़्ज़त उस बंदे के लिए है जो अल्लाह के बंदों, ख़ासकर कमज़ोर और बेसहारा लोगों — जैसे अनाथ, मिस्कीन और मुहताज — के साथ अच्छा बर्ताव करे। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "मैं और अनाथ की कफ़ालत (परवरिश) करने वाला जन्नत में इस तरह साथ होंगे" — और आपने दो उंगलियों (शहादत और बीच वाली) का इशारा किया।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें ग़ौर करने की दावत देती है कि हम अपने आस-पास के अनाथ बच्चों की देखभाल करें, उन्हें प्यार दें, उनकी ज़रूरतें पूरी करें और उनके साथ इंसाफ़ करें। यही अल्लाह की नज़र में सबसे बड़ी इज़्ज़त है। अगर हम यह करेंगे तो अल्लाह हमें दुनिया और आख़िरत में इज़्ज़त देगा। याद रखें, जो बंदा अल्लाह के बंदों पर रहम करता है, अल्लाह उस पर रहम फ़रमाता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 15-19 — अल-फज्र

15فَأَمَّا الْإِنسَانُ إِذَا مَا ابْتَلَاهُ رَبُّهُ فَأَكْرَمَهُ وَنَعَّمَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَكْرَمَنِ
लेकिन इन्सान जब उसको उसका परवरदिगार (इस तरह) आज़माता है कि उसको इज्ज़त व नेअमत देता है, तो कहता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे इज्ज़त दी है
16وَأَمَّا إِذَا مَا ابْتَلَاهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُ فَيَقُولُ رَبِّي أَهَانَنِ
मगर जब उसको (इस तरह) आज़माता है कि उस पर रोज़ी को तंग कर देता है बोल उठता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे ज़लील किया
17كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ الْيَتِيمَ
हरगिज़ नहीं बल्कि तुम लोग न यतीम की ख़ातिरदारी करते हो
18وَلَا تَحَاضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ
और न मोहताज को खाना खिलाने की तरग़ीब देते हो
19وَتَأْكُلُونَ التُّرَاثَ أَكْلًا لَّمًّا
और मीरारा के माल (हलाल व हराम) को समेट कर चख जाते हो
अल-फज्रकुरान सूची
30आयत
मक्कीRevelation
17आयत

अनुवाद — अल-फज्र 17

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Tuesday, August 18, 2026

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