अत-तौबा · 56/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ إِنَّهُمْ لَمِنكُمْ وَمَا هُم مِّنكُمْ وَلَٰكِنَّهُمْ قَوْمٌ يَفْرَقُونَ ۝٥٦
Wa yahlifoona billaahi innnahum laminkum wa maa hum minkum wa laakinnahum qawmuny yafraqoon
📖 हिंदी अर्थ
और (मुसलमानों) ये लोग ख़ुदा की क़सम खाएंगे फिर वह तुममें ही के हैं हालॉकि वह लोग तुममें के नहीं हैं मगर हैं ये लोग बुज़दिल हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ: वे अल्लाह की क़समें खाते हैं।
  • لَمِنكُمْ: वे तुम्हीं में से हैं (तुम्हारे साथ हैं)।
  • يَفْرَقُونَ: वे डरते हैं (भयभीत होते हैं)।

तफ़सीर (व्याख्या):

ये मुनाफ़िक़ (दिखावटी मुसलमान) झूठी क़समें खाकर तुम ईमानवालों से कहते हैं कि "हम तुम्हीं में से हैं और तुम्हारे धर्म पर हैं।" लेकिन वास्तव में वे तुममें से नहीं हैं, क्योंकि उनके दिल कुफ़्र (अविश्वास) से भरे हुए हैं और उन्होंने केवल ज़ुबान से इस्लाम क़बूल किया है। उनका यह दावा झूठ है, और वे केवल इसलिए ऐसा कहते हैं क्योंकि वे डरते हैं—डरते हैं कि कहीं तुम उन्हें मुशरिकों (बहुदेववादियों) की तरह सज़ा न दे दो, या उन्हें क़त्ल और क़ैद का सामना न करना पड़े। इसी डर की वजह से वे अपने असली चेहरे को छिपाकर तुम्हारे सामने इस्लाम का दिखावा करते हैं और तुम्हें खुश करने के लिए झूठी क़समें खाते हैं।

फ़ायदे (सीख):

  1. मुनाफ़िक़ों की पहचान यह है कि वे झूठी क़समें खाकर अपनी बात को सच साबित करने की कोशिश करते हैं, जबकि उनके दिल सच्चाई से खाली होते हैं।
  2. डर और भय इंसान को झूठ बोलने और दिखावा करने पर मजबूर कर देता है, इसलिए मोमिन को चाहिए कि वह सिर्फ अल्लाह से डरे और सच्चाई पर क़ायम रहे।
  3. यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि वे लोगों के बाहरी हालात से धोखा न खाएं, बल्कि उनकी नीयत और अमल को परखें।
  4. अल्लाह का डर इंसान को सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलाता है, जबकि मख़लूक़ (लोगों) का डर इंसान को मुनाफ़िक़ी और झूठ की तरफ ले जाता है।
  5. यह आयत मुसलमानों को यह भी सिखाती है कि वे अपने भाईचारे को मज़बूत करें और मुनाफ़िक़ों के नुक़्सान से बचने के लिए हमेशा चौकन्ने रहें।


📜 आयत 54-58 — अत-तौबा

54وَمَا مَنَعَهُمْ أَن تُقْبَلَ مِنْهُمْ نَفَقَاتُهُمْ إِلَّا أَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَبِرَسُولِهِ وَلَا يَأْتُونَ الصَّلَاةَ إِلَّا وَهُمْ كُسَالَىٰ وَلَا يُنفِقُونَ إِلَّا وَهُمْ كَارِهُونَ
और उनकी ख़ैरात के क़ुबूल किए जाने में और कोई वजह मायने नहीं मगर यही कि उन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल की नाफ़रमानी की और नमाज़ को आते भी हैं तो अलकसाए हुए और ख़ुदा की राह में खर्च करते भी हैं तो बे दिली से
55فَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُمْ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُم بِهَا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ
(ऐ रसूल) तुम को न तो उनके माल हैरत में डाले और न उनकी औलाद (क्योंकि) ख़ुदा तो ये चाहता है कि उनको आल व माल की वजह से दुनिया की (चन्द रोज़) ज़िन्दगी (ही) में मुबितलाए अज़ाब करे और जब उनकी जानें निकलें तब भी वह काफिर (के काफिर ही) रहें
56وَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ إِنَّهُمْ لَمِنكُمْ وَمَا هُم مِّنكُمْ وَلَٰكِنَّهُمْ قَوْمٌ يَفْرَقُونَ
और (मुसलमानों) ये लोग ख़ुदा की क़सम खाएंगे फिर वह तुममें ही के हैं हालॉकि वह लोग तुममें के नहीं हैं मगर हैं ये लोग बुज़दिल हैं
57لَوْ يَجِدُونَ مَلْجَأً أَوْ مَغَارَاتٍ أَوْ مُدَّخَلًا لَّوَلَّوْا إِلَيْهِ وَهُمْ يَجْمَحُونَ
कि गर कहीं ये लोग पनाह की जगह (क़िले) या (छिपने के लिए) ग़ार या घुस बैठने की कोई (और) जगह पा जाए तो उसी तरफ रस्सियाँ तोड़ाते हुए भाग जाएँ
58وَمِنْهُم مَّن يَلْمِزُكَ فِي الصَّدَقَاتِ فَإِنْ أُعْطُوا مِنْهَا رَضُوا وَإِن لَّمْ يُعْطَوْا مِنْهَا إِذَا هُمْ يَسْخَطُونَ
(ऐ रसूल) उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जो तुम्हें ख़ैरात (की तक़सीम) में (ख्वाह मा ख्वाह) इल्ज़ाम देते हैं फिर अगर उनमे से कुछ (माक़ूल मिक़दार(हिस्सा)) दे दिया गया तो खुश हो गए और अगर उनकी मर्ज़ी के मुवाफिक़ उसमें से उन्हें कुछ नहीं दिया गया तो बस फौरन ही बिगड़ बैठे
अत-तौबाकुरान सूची
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अनुवाद — अत-तौबा 56

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Tuesday, August 18, 2026

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