यूनुस · 67/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
هُوَ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يَسْمَعُونَ ۝٦٧
Huwal lazee ja`ala lakumul laila litaskunoo feehi wannahaara mubsiraa; inna fee zaalika la Aayaatil liqawmai yasma`oon
📖 हिंदी अर्थ
वह वही (खुदाए क़ादिर तवाना) है जिसने तुम्हारे नफा के वास्ते रात को बनाया ताकि तुम इसमें चैन करो और दिन को (बनाया) कि उसकी रौशनी में देखो भालो उसमें शक़ नहीं जो लोग सुन लेते हैं उनके लिए इसमें (कुदरत की बहुतेरी निशानियाँ हैं)
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِتَسْكُنُوا فِيهِ: ताकि तुम उसमें सुकून (आराम) हासिल करो, अर्थात् दिन भर की थकान और मेहनत के बाद चैन पाओ।
  • مُبْصِرًا: रोशन और उजाला करने वाला, जिसमें चीज़ें साफ़ दिखाई दें।
  • لَآيَاتٍ: निशानियाँ और सबूत (अल्लाह की क़ुदरत और एकता पर)।
  • يَسْمَعُونَ: सुनने वाले, यानी जो कान लगाकर सुनें और उस पर ग़ौर करें।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ही वह (एकमात्र) है जिसने तुम्हारे लिए रात को बनाया ताकि तुम उसमें सुकून हासिल करो — यानी दिन भर की दौड़-धूप, काम-काज और रोज़ी की तलाश की थकान के बाद तुम रात में आराम करो, चैन पाओ और अपनी ताकत वापस पाओ। और उसी ने दिन को रोशन बनाया ताकि तुम उसमें देख सको, अपने काम-काज कर सको, रोज़ी की तलाश में निकल सको और अपनी ज़िंदगी के मामलात (व्यवहार) को अंजाम दे सको। यानी रात और दिन का यह बदलता रहना — एक अंधेरा और सुकून वाला, दूसरा रोशन और काम वाला — तुम्हारे लिए अल्लाह की क़ुदरत और उसकी रहमत की बहुत बड़ी निशानियाँ हैं। ये निशानियाँ उन लोगों के लिए सबूत हैं जो सुनते हैं — सुनकर सोचते हैं, ग़ौर करते हैं और सबक़ लेते हैं। जो सिर्फ़ कान से नहीं, बल्कि दिल से सुनते हैं और इन निशानियों से अल्लाह की वहदानियत (एकता) और उसकी इबादत के हक़दार होने का सबूत पाते हैं।

फ़ायदे (सबक़):

  1. रात और दिन का बदलना अल्लाह की सबसे बड़ी निशानियों में से है — यह उसकी क़ुदरत और हिकमत (बुद्धिमत्ता) को दिखाता है, और इससे इंसान को यह समझना चाहिए कि इस कायनात का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है।
  2. रात में सुकून और दिन में काम — यह अल्लाह की रहमत है। इंसान को चाहिए कि रात को आराम करे और दिन को काम करे, और इस तरह अपनी ज़िंदगी को अल्लाह के बताए हुए निज़ाम (व्यवस्था) के मुताबिक़ चलाए।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर करना और उनसे सबक़ लेना ईमान की निशानी है। जो लोग सोचते-समझते हैं, वही अल्लाह की क़ुदरत को पहचानते हैं और उसकी इबादत करते हैं।
  4. इस आयत से हमें यह भी सबक़ मिलता है कि ज़िंदगी में संतुलन (balance) ज़रूरी है — न तो पूरी रात जागकर दिन को बर्बाद करना चाहिए, न ही दिन को सोकर रात को जागना चाहिए। अल्लाह ने जिस तरह रात और दिन को बनाया है, उसी के मुताबिक़ चलना बेहतर है।
  5. यह आयत अल्लाह की मुहब्बत और एहसान को याद दिलाती है — कि उसने हमारी ज़रूरतों का ख़याल रखते हुए रात और दिन दोनों बनाए, ताकि हमारी ज़िंदगी आसान हो। यह हमें अल्लाह का शुक्र अदा करने और उसकी इबादत में लगे रहने की तरग़ीब (प्रेरणा) देता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 65-69 — यूनुस

65وَلَا يَحْزُنكَ قَوْلُهُمْ ۘ إِنَّ الْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا ۚ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
और (ऐ रसूल) उन (कुफ्फ़ार) की बातों का तुम रंज न किया करो इसमें तो शक़ नहीं कि सारी इज्ज़त तो सिर्फ ख़ुदा ही के लिए है वही सबकी सुनता जानता है
66أَلَا إِنَّ لِلَّهِ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَمَن فِي الْأَرْضِ ۗ وَمَا يَتَّبِعُ الَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ شُرَكَاءَ ۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَخْرُصُونَ
आगाह रहो इसमें शक़ नहीं कि जो लोग आसमानों में हैं और जो लोग ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा ही के लिए है और जो लोग ख़ुदा को छोड़कर (दूसरों को) पुकारते हैं वह तो (ख़ुदा के फर्ज़ी) शरीकों की राह पर भी नहीं चलते बल्कि वह तो सिर्फ अपनी अटकल पर चलते हैं और वह सिर्फ वहमी और ख्याली बातें किया करते हैं
67هُوَ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يَسْمَعُونَ
वह वही (खुदाए क़ादिर तवाना) है जिसने तुम्हारे नफा के वास्ते रात को बनाया ताकि तुम इसमें चैन करो और दिन को (बनाया) कि उसकी रौशनी में देखो भालो उसमें शक़ नहीं जो लोग सुन लेते हैं उनके लिए इसमें (कुदरत की बहुतेरी निशानियाँ हैं)
68قَالُوا اتَّخَذَ اللَّهُ وَلَدًا ۗ سُبْحَانَهُ ۖ هُوَ الْغَنِيُّ ۖ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ إِنْ عِندَكُم مِّن سُلْطَانٍ بِهَٰذَا ۚ أَتَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
लोगों ने तो कह दिया कि ख़ुदा ने बेटा बना लिया-ये महज़ लगों वह तमाम नकायस से पाक व पाकीज़ा वह (हर तरह) से बेपरवाह हैं व जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (सब) उसी का है (जो कुछ) तुम कहते हो( उसकी कोई दलील तो तुम्हारे पास है नहीं क्या तुम ख़ुदा पर) (यू ही) बे जाने बूझे झूठ बोला करते हो
69قُلْ إِنَّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَ
ऐ रसूल तुम कह दो कि बेशक जो लोग झूठ मूठ ख़ुदा पर बोहतान बाधते हैं वह कभी कामयाब न होगें
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अनुवाद — यूनुस 67

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Tuesday, August 18, 2026

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