مِنْ حَقٍّ – यहाँ "حق" का अर्थ "आवश्यकता" या "इच्छा" है, अर्थात हमें इनमें कोई आवश्यकता या रुचि नहीं है।
مَا نُرِيدُ – हम जो चाहते हैं, अर्थात पुरुषों से संबंध बनाना, जो उनका विकृत कार्य था।
तफ़सीर:
जब हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को अल्लाह की तरफ़ बुलाया और उन्हें इस घिनौने काम (समलैंगिकता) से रोका, और उन्हें अपनी बेटियों (अर्थात क़ौम की औरतों) से विवाह करने की पेशकश की, तो उनकी क़ौम ने जवाब में कहा: "ऐ लूत! तुम्हें तो पहले से ही मालूम है कि हमें औरतों से कोई रुचि या आवश्यकता नहीं है। हम उनसे निकाह नहीं करना चाहते। और तुम यह भी जानते हो कि हम क्या चाहते हैं – हम तो केवल पुरुषों से संबंध बनाना चाहते हैं।" यानी उन्होंने खुले शब्दों में अपनी विकृत इच्छा का इज़हार किया और हज़रत लूत की नसीहत को ठुकरा दिया। उनका यह कहना था कि हमें औरतों की तरफ़ कोई रग़बत नहीं, और हमारी ख्वाहिश तो तुम्हें मालूम है, हम तो सिर्फ़ मर्दों से ही अपनी हवस पूरी करेंगे। यह उनकी सरकशी और हद से गुज़रने की सबसे बड़ी निशानी थी कि उन्होंने अपनी बुराई को छिपाया नहीं, बल्कि खुल्लम-खुल्ला बयान किया।
फ़ायदे:
इस आयत से पता चलता है कि अल्लाह की नाफ़रमानी और उसकी हदों से आगे बढ़ना इंसान को इस हद तक गिरा सकता है कि वह अपनी बुराई को बेझिझक और बेहया होकर ज़ाहिर करने लगे। मुसलमान को चाहिए कि वह हमेशा शर्म और हया को अपनाए और बुराई से दूर रहे।
नबी और अल्लाह के पैग़म्बर जब अपनी क़ौम को भलाई की तरफ़ बुलाते हैं, तो उन्हें मुक़ाबले और तकलीफ़ का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे अपने मिशन पर डटे रहते हैं। यह हमारे लिए सबक़ है कि सच्चाई पर क़ायम रहें, चाहे लोग कितना भी मज़ाक़ उड़ाएँ या विरोध करें।
यह आयत उन लोगों के लिए चेतावनी है जो अपनी बुरी इच्छाओं को जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं। अल्लाह की बनाई हुई फ़ितरत (प्राकृतिक व्यवस्था) को बदलना और उसके ख़िलाफ़ जाना कभी भी भलाई नहीं ला सकता, बल्कि यह अल्लाह के अज़ाब का कारण बनता है।
इस क़िस्से से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपनी ज़िंदगी में पाकीज़गी और साफ़-सुथरी ज़िंदगी अपनानी चाहिए, और अल्लाह के हुक्मों को अपनी इच्छाओं पर तरजीह देनी चाहिए। जो लोग अल्लाह की नाफ़रमानी में डटे रहते हैं, उनका अंजाम बहुत बुरा होता है, जैसा कि क़ौमे-लूत के साथ हुआ।
जो किसी तरह टल नहीं सकता और जब हमारे भेजे हुए फरिश्ते (लड़को की सूरत में) लूत के पास आए तो उनके ख्याल से रजीदा हुए और उनके आने से तंग दिल हो गए और कहने लगे कि ये (आज का दिन) सख्त मुसीबत का दिन है
और उनकी क़ौम (लड़को की आवाज़ सुनकर बुरे इरादे से) उनके पास दौड़ती हुई आई और ये लोग उसके क़ब्ल भी बुरे काम किया करते थे लूत ने (जब उनको) आते देखा तो कहा ऐ मेरी क़ौम ये मारी क़ौम की बेटियाँ (मौजूद हैं) उनसे निकाह कर लो ये तुम्हारीे वास्ते जायज़ और ज्यादा साफ सुथरी हैं तो खुदा से डरो और मुझे मेरे मेहमान के बारे में रुसवा न करो क्या तुम में से कोई भी समझदार आदमी नहीं है
वह फरिश्ते बोले ऐ लूत हम तुम्हारे परवरदिगार के भेजे हुए (फरिश्ते हैं तुम घबराओ नहीं) ये लोग तुम तक हरगिज़ (नहीं पहुँच सकते तो तुम कुछ रात रहे अपने लड़कों बालों समैत निकल भागो और तुममें से कोई इधर मुड़ कर भी न देखे मगर तुम्हारी बीबी कि उस पर भी यक़ीनन वह अज़ाब नाज़िल होने वाला है जो उन लोगों पर नाज़िल होगा और उन (के अज़ाब का) वायदा बस सुबह है क्या सुबह क़रीब नहीं
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