Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- خَزَائِنَ: भण्डार, कोष, ख़ज़ाने
- الْأَرْضِ: यहाँ अर्थ है मिस्र की धरती या राज्य की भूमि
- حَفِيظٌ: अत्यंत रक्षक, अमानतदार, जो चीज़ों की पूरी हिफ़ाज़त करे
- عَلِيمٌ: बड़ा ज्ञानी, जानकार, जो प्रबंधन के तरीक़ों से भली-भाँति वाक़िफ़ हो
तफ़सीर (व्याख्या):
जब यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने राजा के सपने की सही व्याख्या की और उसे बताया कि सात वर्षों तक भरपूर फ़सल होगी, उसके बाद सात वर्षों का अकाल पड़ेगा, तो उन्होंने यह भी सलाह दी कि अच्छे वर्षों में अनाज इकट्ठा करके संग्रह किया जाए। इसके बाद उन्होंने राजा से कहा: "मुझे इस धरती (मिस्र) के ख़ज़ानों (अनाज के भण्डारों) का प्रभारी बना दीजिए।" उन्होंने यह अनुरोध इसलिए किया ताकि वे आने वाले कठिन समय के लिए अनाज का सही प्रबंधन कर सकें और लोगों के बीच न्याय व समानता के साथ वितरण कर सकें। उन्होंने अपनी योग्यता बताते हुए कहा: "मैं अत्यंत रक्षक हूँ (यानी भण्डारों की पूरी हिफ़ाज़त करूँगा और किसी भी प्रकार की बर्बादी या चोरी नहीं होने दूँगा), और बड़ा ज्ञानी हूँ (यानी मुझे प्रबंधन, संग्रह और वितरण के सभी तरीक़े मालूम हैं)।"
यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने यह पद अपने स्वार्थ या दुनियावी लालच के लिए नहीं माँगा था, बल्कि उनका उद्देश्य केवल लोगों की भलाई था। वे चाहते थे कि जो योजना उन्होंने राजा को बताई है, उसे वे स्वयं अमल में लाएँ ताकि अकाल के समय कोई भूखा न रहे और न्यायपूर्ण तरीक़े से हर ज़रूरतमंद तक अनाज पहुँचे। यह उनकी ईमानदारी और नेकनीयती का प्रमाण है कि उन्होंने यह ज़िम्मेदारी अपनी योग्यता और अमानतदारी के दम पर ली, न कि किसी सिफ़ारिश या रिश्तेदारी के आधार पर।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- ज़िम्मेदारी लेने में संकोच नहीं करना चाहिए: यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य में योग्य और अमानतदार है, तो उसे आगे आकर ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, बशर्ते उसका उद्देश्य लोगों की भलाई हो।
- अमानतदारी और ज्ञान का महत्व: इस आयत से सीख मिलती है कि किसी भी पद या ज़िम्मेदारी के लिए सबसे महत्वपूर्ण गुण अमानतदारी (ईमानदारी) और ज्ञान (योग्यता) हैं। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने इन्हीं दो गुणों को अपनी पहचान बताया।
- नेकनीयत और इख़लास: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने यह पद अपने फ़ायदे के लिए नहीं, बल्कि लोगों की सेवा और न्याय स्थापित करने के लिए माँगा। यह हमें सिखाता है कि अगर हम किसी पद पर हैं तो उसका उद्देश्य दूसरों की भलाई होना चाहिए, न कि अपना स्वार्थ।
- योजना और प्रबंधन की अहमियत: आने वाले कठिन समय के लिए तैयारी करना और संसाधनों का सही प्रबंधन करना एक बुद्धिमानी का काम है। यह आयत हमें सिखाती है कि भविष्य की आपदाओं से निपटने के लिए पहले से योजना बनानी चाहिए।
- अल्लाह की मदद: जब इंसान की नीयत साफ़ हो और वह अल्लाह की राह में लोगों की भलाई के लिए काम करे, तो अल्लाह उसके कामों में बरकत देता है और उसे कामयाबी प्रदान करता है, जैसा कि यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) को मिली।
📜 आयत 53-57 — सूरा यूसुफ
अनुवाद — यूसुफ 55
सूरा यूसुफ आयत 55 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : यूसुफ ने कहा (जब अपने मेरी क़दर की है तो)…सूरा आयत 55/111 — सूरा यूसुफ يوسف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा यूसुफ सुनें, सूरा यूसुफ अनुवाद, सूरा यूसुफ mp3, सूरा यूसुफ pdf. आयत 53–57. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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