यूसुफ · 55/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा यूसुफ
قَالَ اجْعَلْنِي عَلَىٰ خَزَائِنِ الْأَرْضِ ۖ إِنِّي حَفِيظٌ عَلِيمٌ ۝٥٥
Qaalaj `alnee `alaa khazaaa`inil ardi innee hafeezun `aleem
📖 हिंदी अर्थ
यूसुफ ने कहा (जब अपने मेरी क़दर की है तो) मुझे मुल्की ख़ज़ानों पर मुक़र्रर कीजिए क्योंकि मैं (उसका) अमानतदार ख़ज़ान्ची (और) उसके हिसाब व किताब से भी वाक़िफ हूँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • خَزَائِنَ: भण्डार, कोष, ख़ज़ाने
  • الْأَرْضِ: यहाँ अर्थ है मिस्र की धरती या राज्य की भूमि
  • حَفِيظٌ: अत्यंत रक्षक, अमानतदार, जो चीज़ों की पूरी हिफ़ाज़त करे
  • عَلِيمٌ: बड़ा ज्ञानी, जानकार, जो प्रबंधन के तरीक़ों से भली-भाँति वाक़िफ़ हो

तफ़सीर (व्याख्या):

जब यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने राजा के सपने की सही व्याख्या की और उसे बताया कि सात वर्षों तक भरपूर फ़सल होगी, उसके बाद सात वर्षों का अकाल पड़ेगा, तो उन्होंने यह भी सलाह दी कि अच्छे वर्षों में अनाज इकट्ठा करके संग्रह किया जाए। इसके बाद उन्होंने राजा से कहा: "मुझे इस धरती (मिस्र) के ख़ज़ानों (अनाज के भण्डारों) का प्रभारी बना दीजिए।" उन्होंने यह अनुरोध इसलिए किया ताकि वे आने वाले कठिन समय के लिए अनाज का सही प्रबंधन कर सकें और लोगों के बीच न्याय व समानता के साथ वितरण कर सकें। उन्होंने अपनी योग्यता बताते हुए कहा: "मैं अत्यंत रक्षक हूँ (यानी भण्डारों की पूरी हिफ़ाज़त करूँगा और किसी भी प्रकार की बर्बादी या चोरी नहीं होने दूँगा), और बड़ा ज्ञानी हूँ (यानी मुझे प्रबंधन, संग्रह और वितरण के सभी तरीक़े मालूम हैं)।"

यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने यह पद अपने स्वार्थ या दुनियावी लालच के लिए नहीं माँगा था, बल्कि उनका उद्देश्य केवल लोगों की भलाई था। वे चाहते थे कि जो योजना उन्होंने राजा को बताई है, उसे वे स्वयं अमल में लाएँ ताकि अकाल के समय कोई भूखा न रहे और न्यायपूर्ण तरीक़े से हर ज़रूरतमंद तक अनाज पहुँचे। यह उनकी ईमानदारी और नेकनीयती का प्रमाण है कि उन्होंने यह ज़िम्मेदारी अपनी योग्यता और अमानतदारी के दम पर ली, न कि किसी सिफ़ारिश या रिश्तेदारी के आधार पर।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. ज़िम्मेदारी लेने में संकोच नहीं करना चाहिए: यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य में योग्य और अमानतदार है, तो उसे आगे आकर ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, बशर्ते उसका उद्देश्य लोगों की भलाई हो।
  2. अमानतदारी और ज्ञान का महत्व: इस आयत से सीख मिलती है कि किसी भी पद या ज़िम्मेदारी के लिए सबसे महत्वपूर्ण गुण अमानतदारी (ईमानदारी) और ज्ञान (योग्यता) हैं। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने इन्हीं दो गुणों को अपनी पहचान बताया।
  3. नेकनीयत और इख़लास: यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने यह पद अपने फ़ायदे के लिए नहीं, बल्कि लोगों की सेवा और न्याय स्थापित करने के लिए माँगा। यह हमें सिखाता है कि अगर हम किसी पद पर हैं तो उसका उद्देश्य दूसरों की भलाई होना चाहिए, न कि अपना स्वार्थ।
  4. योजना और प्रबंधन की अहमियत: आने वाले कठिन समय के लिए तैयारी करना और संसाधनों का सही प्रबंधन करना एक बुद्धिमानी का काम है। यह आयत हमें सिखाती है कि भविष्य की आपदाओं से निपटने के लिए पहले से योजना बनानी चाहिए।
  5. अल्लाह की मदद: जब इंसान की नीयत साफ़ हो और वह अल्लाह की राह में लोगों की भलाई के लिए काम करे, तो अल्लाह उसके कामों में बरकत देता है और उसे कामयाबी प्रदान करता है, जैसा कि यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) को मिली।


📜 आयत 53-57 — सूरा यूसुफ

53۞ وَمَا أُبَرِّئُ نَفْسِي ۚ إِنَّ النَّفْسَ لَأَمَّارَةٌ بِالسُّوءِ إِلَّا مَا رَحِمَ رَبِّي ۚ إِنَّ رَبِّي غَفُورٌ رَّحِيمٌ
और (यूं तो) मै भी अपने नफ्स को गुनाहो से बे लौस नहीं कहता हूँ क्योंकि (मैं भी बशर हूँ और नफ्स बराबर बुराई की तरफ उभारता ही है मगर जिस पर मेरा परवरदिगार रहम फरमाए (और गुनाह से बचाए)
54وَقَالَ الْمَلِكُ ائْتُونِي بِهِ أَسْتَخْلِصْهُ لِنَفْسِي ۖ فَلَمَّا كَلَّمَهُ قَالَ إِنَّكَ الْيَوْمَ لَدَيْنَا مَكِينٌ أَمِينٌ
इसमें शक़ नहीं कि मेरा परवरदिगार बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है और बादशाह ने हुक्म दिया कि यूसुफ को मेरे पास ले आओ तो मैं उनको अपने ज़ाती काम के लिए ख़ास कर लूंगा फिर उसने यूसुफ से बातें की तो यूसुफ की आला क़ाबलियत साबित हुई (और) उसने हुक्म दिया कि तुम आज (से) हमारे सरकार में यक़ीन बावक़ार (और) मुअतबर हो
55قَالَ اجْعَلْنِي عَلَىٰ خَزَائِنِ الْأَرْضِ ۖ إِنِّي حَفِيظٌ عَلِيمٌ
यूसुफ ने कहा (जब अपने मेरी क़दर की है तो) मुझे मुल्की ख़ज़ानों पर मुक़र्रर कीजिए क्योंकि मैं (उसका) अमानतदार ख़ज़ान्ची (और) उसके हिसाब व किताब से भी वाक़िफ हूँ
56وَكَذَٰلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِي الْأَرْضِ يَتَبَوَّأُ مِنْهَا حَيْثُ يَشَاءُ ۚ نُصِيبُ بِرَحْمَتِنَا مَن نَّشَاءُ ۖ وَلَا نُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ
(ग़रज़ यूसुफ शाही ख़ज़ानो के अफसर मुक़र्रर हुए) और हमने यूसुफ को युं मुल्क (मिस्र) पर क़ाबिज़ बना दिया कि उसमें जहाँ चाहें रहें हम जिस पर चाहते हैं अपना फज़ल करते हैं और हमने नेको कारो के अज्र को अकारत नहीं करते
57وَلَأَجْرُ الْآخِرَةِ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ
और जो लोग ईमान लाए और परहेज़गारी करते रहे उनके लिए आख़िरत का अज्र उसी से कही बेहतर है
यूसुफकुरान सूची
111आयत
मक्कीअवतरण स्थान
55आयत

अनुवाद — यूसुफ 55

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सूरा आयत 55/111 — सूरा यूसुफ يوسف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा यूसुफ सुनें, सूरा यूसुफ अनुवाद, सूरा यूसुफ mp3, सूरा यूसुफ pdf. आयत 53–57. हिंदी अर्थ: اردو.





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Friday, October 2, 2026

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