अर-राद · 39/43
अनुवाद उच्चारण — सूरा अर-राद
يَمْحُو اللَّهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ ۖ وَعِندَهُ أُمُّ الْكِتَابِ ۝٣٩
Yamhul laahu maa yashaaa`u wa yusbitu wa `indahooo ummul Kitaab
📖 हिंदी अर्थ
फिर इसमें से ख़ुदा जिसको चाहता है मिटा देता है और (जिसको चाहता है बाक़ी रखता है और उसके पास असल किताब (लौहे महफूज़) मौजूद है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَمْحُو: मिटा देता है, समाप्त कर देता है।
  • يُثْبِتُ: स्थिर रखता है, बनाए रखता है।
  • أُمُّ الْكِتَابِ: मूल पुस्तक, यानी लौह-ए-महफूज़ (सुरक्षित पट्टिका)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपनी असीम हिकमत (बुद्धिमत्ता) के अनुसार जो चाहता है मिटा देता है और जो चाहता है स्थिर रखता है। यह मिटाना और स्थिर रखना उसके फ़ैसलों, शरई अहकाम (धार्मिक आदेशों) और तक़दीर के मामलों में होता है। कभी वह किसी हुक्म को मंसूख़ (रद्द) कर देता है, तो कभी उसे बरक़रार रखता है। इसी तरह, वह किसी बंदे की नेकियों, बुराइयों, रिज़्क़ (आजीविका), उम्र, सुख-दुख और भलाई-बुराई में जो चाहता है तब्दीली करता है। लेकिन यह सब कुछ उसके इल्म और हिकमत के मुताबिक़ होता है, और उसके पास "उम्मुल किताब" है, जो लौह-ए-महफूज़ है। यह मूल पुस्तक अल्लाह के पास सुरक्षित है, जिसमें कोई परिवर्तन या तब्दीली नहीं होती। जो कुछ भी मिटाया या स्थिर किया जाता है, वह उसी मूल पुस्तक में लिखे हुए के अनुरूप होता है। यानी, अल्लाह का फ़ैसला हमेशा उसके ज्ञान और पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार ही होता है, और उसका हर काम हिकमत पर आधारित है।

फ़ायदे (लाभ):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह तआला का अधिकार सबसे बड़ा है। वह जो चाहे फ़ैसला करे, और उसके फ़ैसले पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। यह हमें अल्लाह के सामने पूर्ण समर्पण और आत्मसमर्पण की शिक्षा देता है।
  2. अल्लाह के पास "उम्मुल किताब" (लौह-ए-महफूज़) का होना हमें यक़ीन दिलाता है कि इस कायनात (ब्रह्मांड) का हर ज़र्रा अल्लाह के इल्म और नियंत्रण में है। कोई चीज़ उसके इल्म से बाहर नहीं है, और न ही कोई चीज़ उसकी मर्ज़ी के बिना होती है।
  3. यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की हिकमत (बुद्धिमत्ता) हर चीज़ पर छाई हुई है। जब हम देखते हैं कि अल्लाह किसी चीज़ को बदलता या मिटाता है, तो हमें यक़ीन होता है कि उसमें कोई भलाई छिपी है, भले ही हमें वह समझ न आए। यह हमारे ईमान को मज़बूत करता है।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि क़ुरआन और पिछली शरीअतों के अहकाम में से जो अल्लाह ने मंसूख़ किए, वह उसकी हिकमत से था, और जो बरक़रार रखे, वह भी उसकी हिकमत से है। इससे हमें यह समझ मिलती है कि इस्लाम एक पूर्ण और अंतिम धर्म है, जो हर ज़माने के लिए मुनासिब है।
  5. यह आयत हमें अल्लाह के भरोसे और उसकी रहमत की ओर ले जाती है। जब हमें पता चलता है कि अल्लाह अपनी मर्ज़ी से बंदों की हालत बदल सकता है, तो हम उससे उम्मीद रखते हैं कि वह हमारी मुश्किलों को भी आसान कर देगा, हमारे गुनाहों को माफ़ कर देगा और हमारी दुआओं को क़बूल करेगा। यह हमें अल्लाह से जुड़ने और उसकी इबादत में मशगूल रहने की तरग़ीब देता है।


📜 आयत 37-41 — सूरा अर-राद

37وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَاهُ حُكْمًا عَرَبِيًّا ۚ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم بَعْدَمَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا وَاقٍ
और यूँ हमने उस क़ुरान को अरबी (ज़बान) का फरमान नाज़िल फरमाया और (ऐ रसूल) अगर कहीं तुमने इसके बाद को तुम्हारे पास इल्म (क़ुरान) आ चुका उन की नफसियानी ख्वाहिशों की पैरवी कर ली तो (याद रखो कि) फिर ख़ुदा की तरफ से न कोई तुम्हारा सरपरस्त होगा न कोई बचाने वाला
38وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًا مِّن قَبْلِكَ وَجَعَلْنَا لَهُمْ أَزْوَاجًا وَذُرِّيَّةً ۚ وَمَا كَانَ لِرَسُولٍ أَن يَأْتِيَ بِآيَةٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۗ لِكُلِّ أَجَلٍ كِتَابٌ
और हमने तुमसे पहले और (भी) बहुतेरे पैग़म्बर भेजे और हमने उनको बीवियाँ भी दी और औलाद (भी अता की) और किसी पैग़म्बर की ये मजाल न थी कि कोई मौजिज़ा ख़ुदा की इजाज़त के बगैर ला दिखाए हर एक वक्त (मौऊद) के लिए (हमारे यहाँ) एक (क़िस्म की) तहरीर (होती) है
39يَمْحُو اللَّهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ ۖ وَعِندَهُ أُمُّ الْكِتَابِ
फिर इसमें से ख़ुदा जिसको चाहता है मिटा देता है और (जिसको चाहता है बाक़ी रखता है और उसके पास असल किताब (लौहे महफूज़) मौजूद है
40وَإِن مَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ الَّذِي نَعِدُهُمْ أَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُ وَعَلَيْنَا الْحِسَابُ
और (ए रसूल) जो जो वायदे (अज़ाब वगैरह के) हम उन कुफ्फारों से करते हैं चाहे, उनमें से बाज़ तुम्हारे सामने पूरे कर दिखाएँ या तुम्हें उससे पहले उठा लें बहर हाल तुम पर तो सिर्फ एहकाम का पहुचा देना फर्ज है
41أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا نَأْتِي الْأَرْضَ نَنقُصُهَا مِنْ أَطْرَافِهَا ۚ وَاللَّهُ يَحْكُمُ لَا مُعَقِّبَ لِحُكْمِهِ ۚ وَهُوَ سَرِيعُ الْحِسَابِ
और उनसे हिसाब लेना हमारा काम है क्या उन लोगों ने ये बात न देखी कि हम ज़मीन को (फ़ुतुहाते इस्लाम से) उसके तमाम एतराफ (चारो ओर) से (सवाह कुफ्र में) घटाते चले आते हैं और ख़ुदा जो चाहता है हुक्म देता है उसके हुक्म का कोई टालने वाला नहीं और बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है
अर-रादकुरान सूची
43आयत
मदनीअवतरण स्थान
39आयत

अनुवाद — अर-राद 39

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Friday, October 2, 2026

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