अल-हिज्र · 3/99
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हिज्र
ذَرْهُمْ يَأْكُلُوا وَيَتَمَتَّعُوا وَيُلْهِهِمُ الْأَمَلُ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ ۝٣
Zarhum yaakuloo wa tatamatta`oo wa yulhihimul amalu fasawfa ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
काश (हम भी) मुसलमान होते (ऐ रसूल) उन्हें उनकी हालत पर रहने दो कि खा पी लें और (दुनिया के चन्द रोज़) चैन कर लें और उनकी तमन्नाएँ उन्हें खेल तमाशे में लगाए रहीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ذَرْهُمْ: उन्हें छोड़ दो, उनसे किनारा कर लो।
  • يَأْكُلُوا وَيَتَمَتَّعُوا: वे खाएँ और सांसारिक सुख-भोग उठाएँ।
  • يُلْهِهِمُ الْأَمَلُ: लंबी आशाएँ (लालसाएँ) उन्हें गाफिल रखें।
  • فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ: तो वे शीघ्र ही (अपना अंजाम) जान लेंगे।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! इन झुठलाने वालों को छोड़ दो कि वे जानवरों की तरह खाएँ-पीएँ और दुनिया के फ़ानी (नाशवान) सुखों में मग्न रहें। उनकी लंबी आशाएँ और दुनिया में बने रहने की तमन्नाएँ उन्हें ईमान और नेक कामों से ग़ाफिल रखें, और उन्हें आख़िरत की फ़िक्र से बेख़बर कर दें। उन्हें अपनी उम्र लंबी होने की उम्मीद है, और यही उम्मीद उन्हें अल्लाह की इबादत और अच्छे आमाल से रोकती है। लेकिन जब वे क़यामत के दिन अल्लाह के सामने हाज़िर होंगे और अपने किए का बदला देखेंगे, तो उन्हें अपनी सख़्त घाटे का यक़ीन हो जाएगा। उस वक़्त उन्हें मालूम होगा कि उन्होंने कितनी बड़ी भूल की थी, और यह जानना उनके किसी काम न आएगा।

फ़ायदे (सबक़):

  1. इस आयत से मालूम होता है कि दुनिया की मोहब्बत और लंबी आरज़ूएँ इंसान को आख़िरत से ग़ाफिल कर देती हैं। जो लोग सिर्फ़ खाने-पीने और सुख-भोग में लगे रहते हैं, वे असल कामयाबी से महरूम रहते हैं।
  2. अल्लाह तआला अपने नबी को तसल्ली देता है कि हिदायत का काम तुम्हारा है, ज़बरदस्ती किसी को ईमान नहीं ला सकते। जो लोग हक़ को ठुकरा दें, उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि मौत और आख़िरत की याद दिल में रखनी चाहिए। दुनिया की चमक-दमक और लंबी उम्र की उम्मीदें हमें नेक कामों से दूर न करें।
  4. अल्लाह की पकड़ धीमी ज़रूर है, लेकिन बहुत सख़्त है। जो लोग मौज-मस्ती में मग्न हैं, वे एक दिन अपने किए की सज़ा ज़रूर भुगतेंगे। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इबादत और नेकियों में गुज़ारे।


📜 आयत 1-5 — सूरा अल-हिज्र

1الر ۚ تِلْكَ آيَاتُ الْكِتَابِ وَقُرْآنٍ مُّبِينٍ
अलिफ़ लाम रा ये किताब (ख़ुदा) और वाजेए व रौशन क़ुरान की (चन्द) आयते हैं
2رُّبَمَا يَوَدُّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْ كَانُوا مُسْلِمِينَ
(एक दिन वह भी आने वाला है कि) जो लोग काफ़िर हो बैठे हैं अक्सर दिल से चाहेंगें
3ذَرْهُمْ يَأْكُلُوا وَيَتَمَتَّعُوا وَيُلْهِهِمُ الْأَمَلُ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
काश (हम भी) मुसलमान होते (ऐ रसूल) उन्हें उनकी हालत पर रहने दो कि खा पी लें और (दुनिया के चन्द रोज़) चैन कर लें और उनकी तमन्नाएँ उन्हें खेल तमाशे में लगाए रहीं
4وَمَا أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا وَلَهَا كِتَابٌ مَّعْلُومٌ
अनक़रीब ही (इसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा और हमने कभी कोई बस्ती तबाह नहीं की मगर ये कि उसकी तबाही के लिए (पहले ही से) समझी बूझी मियाद मुक़र्रर लिखी हुई थी
5مَّا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَأْخِرُونَ
कोई उम्मत अपने वक्त से न आगे बढ़ सकती है न पीछे हट सकती है
अल-हिज्रकुरान सूची
99आयत
मक्कीअवतरण स्थान
3आयत

अनुवाद — अल-हिज्र 3

सूरा अल-हिज्र आयत 3 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : काश (हम भी) मुसलमान होते (ऐ रसूल) उन्हें उनकी हालत…

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Thursday, October 1, 2026

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