अल-हिज्र · 4/99
अनुवाद उच्चारण — अल-हिज्र
وَمَا أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا وَلَهَا كِتَابٌ مَّعْلُومٌ ۝٤
Wa maaa ahlaknaa min qaryatin illaa wa lahaa kitaabum ma`loom
📖 हिंदी अर्थ
अनक़रीब ही (इसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा और हमने कभी कोई बस्ती तबाह नहीं की मगर ये कि उसकी तबाही के लिए (पहले ही से) समझी बूझी मियाद मुक़र्रर लिखी हुई थी
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَهْلَكْنَا: हमने विनष्ट किया, हलाक किया।
  • قَرْيَةٍ: बस्ती, बसावट, यहाँ अर्थ है उस बस्ती के निवासी।
  • كِتَابٌ مَّعْلُومٌ: लिखित नियति, निर्धारित और ज्ञात समय, जो अल्लाह के पास लिखा हुआ है।

व्याख्या:

यह आयत उन काफिरों के उत्तर में उतरी जो नबी ﷺ से मज़ाक़िया अंदाज़ में अज़ाब की जल्दी माँग करते थे। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हम किसी भी बस्ती को उसके निर्धारित समय से पहले विनष्ट नहीं करते। हर बस्ती के विनाश का एक निश्चित समय और लिखित नियति हमारे पास मौजूद है, जो हमारे इल्म में मुक़र्रर है। जब वह समय आ जाता है, तो हम उन्हें हलाक कर देते हैं, न उस समय में देरी होती है और न उसे आगे बढ़ाया जा सकता है। यही नियम पहले की उम्मतों के साथ भी रहा, और यह अल्लाह की सुन्नत (रीति) है। इसलिए जो लोग अज़ाब की जल्दी माँगते हैं, वे समझ लें कि अल्लाह की ओर से सब कुछ एक निर्धारित योजना के अनुसार होता है, और उनका अज़ाब भी अपने मुक़र्रर वक़्त पर ही आएगा।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. अल्लाह की रहमत और उसकी सज़ा दोनों उसकी हिक्मत (बुद्धिमत्ता) पर आधारित हैं; वह किसी पर जल्दबाज़ी में अज़ाब नहीं भेजता, बल्कि हर चीज़ का एक समय निर्धारित है।
  2. यह आयत मुसलमानों को सब्र और भरोसे की शिक्षा देती है कि अल्लाह के फ़ैसले में देरी का मतलब यह नहीं कि वह भूल गया है, बल्कि हर चीज़ का एक वक़्त है।
  3. अल्लाह का इल्म हर चीज़ को घेरे हुए है; उसके पास हर बस्ती और हर इंसान का पूरा रिकॉर्ड है, जो उसे किसी भी हालत में मालूम है।
  4. यह आयत उन लोगों के लिए चेतावनी है जो अल्लाह की नाराज़गी मोल लेते हैं कि उनका अंजाम निश्चित है, चाहे वह देर से ही क्यों न आए।
  5. इससे यह भी पता चलता है कि अल्लाह की सुन्नत (रीति) में कोई बदलाव नहीं होता; जैसा पहले की उम्मतों के साथ हुआ, वैसा ही आने वालों के साथ होगा। यह क़ुरआन की सच्चाई और उसकी शिक्षाओं की महानता को साबित करता है, जो इंसान को अल्लाह के सामने विनम्रता और आज्ञाकारिता की ओर बुलाती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 2-6 — अल-हिज्र

2رُّبَمَا يَوَدُّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْ كَانُوا مُسْلِمِينَ
(एक दिन वह भी आने वाला है कि) जो लोग काफ़िर हो बैठे हैं अक्सर दिल से चाहेंगें
3ذَرْهُمْ يَأْكُلُوا وَيَتَمَتَّعُوا وَيُلْهِهِمُ الْأَمَلُ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
काश (हम भी) मुसलमान होते (ऐ रसूल) उन्हें उनकी हालत पर रहने दो कि खा पी लें और (दुनिया के चन्द रोज़) चैन कर लें और उनकी तमन्नाएँ उन्हें खेल तमाशे में लगाए रहीं
4وَمَا أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا وَلَهَا كِتَابٌ مَّعْلُومٌ
अनक़रीब ही (इसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा और हमने कभी कोई बस्ती तबाह नहीं की मगर ये कि उसकी तबाही के लिए (पहले ही से) समझी बूझी मियाद मुक़र्रर लिखी हुई थी
5مَّا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَأْخِرُونَ
कोई उम्मत अपने वक्त से न आगे बढ़ सकती है न पीछे हट सकती है
6وَقَالُوا يَا أَيُّهَا الَّذِي نُزِّلَ عَلَيْهِ الذِّكْرُ إِنَّكَ لَمَجْنُونٌ
(ऐ रसूल कुफ्फ़ारे मक्का तुमसे) कहते हैं कि ऐ शख़्श (जिसको ये भरम है) कि उस पर 'वही' व किताब नाज़िल हुईहै तो (अच्छा ख़ासा) सिड़ी है
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अनुवाद — अल-हिज्र 4

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Tuesday, August 18, 2026

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