अन-नहल · 85/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَإِذَا رَأَى الَّذِينَ ظَلَمُوا الْعَذَابَ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ ۝٨٥
Wa izaa ra al lazeena zalamul `azaaba falaa yukhaf fafu `anhum wa laa hum yunzaroon
📖 हिंदी अर्थ
और जिन लोगों ने (दुनिया में) शरारतें की थी जब वह अज़ाब को देख लेगें तो उनके अज़ाब ही में तख़फ़ीफ़ की जाएगी और न उनको मोहलत ही दी जाएगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • رَأَى: देखना, सामना करना
  • الَّذِينَ ظَلَمُوا: जिन्होंने अत्याचार किया, अर्थात काफिर और मुशरिक
  • الْعَذَابَ: यातना, अज़ाब
  • يُخَفَّفُ: हल्का किया जाना
  • يُنظَرُونَ: मोहलत देना, देर करना, ढील देना

तफ़सीर (व्याख्या):

जब अत्याचारी लोग — जिन्होंने कुफ्र और शिर्क करके अपने ऊपर अत्याचार किया — क़ियामत के दिन आँखों से उस यातना को देख लेंगे जो उनके लिए तैयार की गई है, तो उस समय उनकी स्थिति अत्यंत भयावह होगी। वे जब जहन्नम की आग और उसकी भयानकता को प्रत्यक्ष रूप से देखेंगे, तो उन्हें अपने किये पर पछतावा होगा, लेकिन वह पछतावा उनके किसी काम न आएगा।

उस दिन न तो उनकी यातना में कोई कमी की जाएगी, न ही उसे हल्का किया जाएगा — चाहे वे कितनी ही मिन्नतें करें, कितनी ही फरियाद करें। और न ही उन्हें कोई मोहलत दी जाएगी, न उनके लिए कोई अवसर होगा कि वे किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति कर सकें या कोई बहाना पेश कर सकें। उन्हें बिना किसी देरी के उस यातना में डाल दिया जाएगा, जहाँ वे हमेशा-हमेशा के लिए रहेंगे।

यह उन लोगों का अंतिम हश्र होगा जिन्होंने दुनिया में अल्लाह की आयतों को झुठलाया, उसके रसूलों की नाफ़रमानी की और अपने अत्याचार से न केवल अपनी आत्माओं पर ज़ुल्म किया बल्कि दूसरों को भी सीधे मार्ग से भटकाया। उस दिन उनके लिए कोई सहायक न होगा, कोई अनुशंसा करने वाला न होगा, और न ही कोई उन्हें उस यातना से बचा सकेगा।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह का न्याय परिपूर्ण है — यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि लोग स्वयं अपने कर्मों से अपने ऊपर अत्याचार करते हैं। अल्लाह का न्याय बिल्कुल सटीक और परिपूर्ण है।
  2. दुनिया ही मौका है — यह आयत हमें याद दिलाती है कि तौबा और सुधार का अवसर केवल इसी दुनिया में है। जब आख़िरत की यातना सामने आ जाएगी, तब कोई मौका नहीं मिलेगा। इसलिए हमें हर पल का सदुपयोग करना चाहिए।
  3. अत्याचार से बचना — इस आयत से हमें सीख मिलती है कि हमें किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं करना चाहिए — चाहे वह अल्लाह के साथ शिर्क करके हो, या लोगों के साथ ज़ुल्म करके। अत्याचार का अंजाम बहुत भयानक है।
  4. अल्लाह की रहमत का महत्व — यह आयत हमें अल्लाह की रहमत की क़द्र करना सिखाती है। जब तक हमें मौका है, हमें अल्लाह की रहमत की ओर लौटना चाहिए, क्योंकि आख़िरत में केवल इंसाफ़ होगा, रहमत का दरवाज़ा बंद हो जाएगा।
  5. क़ुरआन पर अमल की तरग़ीब — यह आयत हमें क़ुरआन की आयतों पर ग़ौर करने और उन पर अमल करने की प्रेरणा देती है, ताकि हम उन लोगों में से न हों जो अत्याचारी कहलाएँ और उस भयानक अंजाम का सामना करें।


📜 आयत 83-87 — अन-नहल

83يَعْرِفُونَ نِعْمَتَ اللَّهِ ثُمَّ يُنكِرُونَهَا وَأَكْثَرُهُمُ الْكَافِرُونَ
(बस) ये लोग ख़ुदा की नेअमतों को पहचानते हैं फिर (जानबुझ कर) उनसे मुकर जाते हैं और इन्हीं में से बहुतेरे नाशुक्रे हैं
84وَيَوْمَ نَبْعَثُ مِن كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا ثُمَّ لَا يُؤْذَنُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ
और जिस दिन हम एक उम्मत में से (उसके पैग़म्बरों को) गवाह बनाकर क़ब्रों से उठा खड़ा करेगे फिर तो काफिरों को न (बात करने की) इजाज़त दी जाएगी और न उनका उज्र (जवाब) ही सुना जाएगा
85وَإِذَا رَأَى الَّذِينَ ظَلَمُوا الْعَذَابَ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
और जिन लोगों ने (दुनिया में) शरारतें की थी जब वह अज़ाब को देख लेगें तो उनके अज़ाब ही में तख़फ़ीफ़ की जाएगी और न उनको मोहलत ही दी जाएगी
86وَإِذَا رَأَى الَّذِينَ أَشْرَكُوا شُرَكَاءَهُمْ قَالُوا رَبَّنَا هَٰؤُلَاءِ شُرَكَاؤُنَا الَّذِينَ كُنَّا نَدْعُو مِن دُونِكَ ۖ فَأَلْقَوْا إِلَيْهِمُ الْقَوْلَ إِنَّكُمْ لَكَاذِبُونَ
और जिन लोगों ने दुनिया में ख़ुदा का शरीक (दूसरे को) ठहराया था जब अपने (उन) शरीकों को (क़यामत में) देखेंगे तो बोल उठेगें कि ऐ हमारे परवरदिगार यही तो हमारे शरीक हैं जिन्हें हम (मुसीबत) के वक्त तुझे छोड़ कर पुकारा करते थे तो वह शरीक उन्हीं की तरफ बात को फेंक मारेगें कि तुम निरे झूठे हो
87وَأَلْقَوْا إِلَى اللَّهِ يَوْمَئِذٍ السَّلَمَ ۖ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ
और उस दिन ख़ुदा के सामने सर झुका देंगे और जो इफ़तेरा परदाज़ियाँ दुनिया में किया करते थे उनसे गायब हो जाएँगें
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अनुवाद — अन-नहल 85

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Tuesday, August 18, 2026

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