अल-इसरा · 20/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
كُلًّا نُّمِدُّ هَٰؤُلَاءِ وَهَٰؤُلَاءِ مِنْ عَطَاءِ رَبِّكَ ۚ وَمَا كَانَ عَطَاءُ رَبِّكَ مَحْظُورًا ۝٢٠
Kullan numiddu haaa `ulaaa`i wa haaa`ulaaa`i min `ataaa`i rabbik; wa maa kaana `ataaa`u rabbika mahzooraa
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) उनको (ग़रज़ सबको) हम ही तुम्हारे परवरदिगार की (अपनी) बख़्शिस से मदद देते हैं और तुम्हारे परवरदिगार की बख़्शिस तो (आम है) किसी पर बन्द नहीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نُّمِدُّ: हम बढ़ाते हैं, लगातार देते हैं।
  • مِنْ عَطَاءِ رَبِّكَ: अपने रब की ओर से दी गई देन (रोज़ी)।
  • مَحْظُورًا: रोका हुआ, वर्जित, बंद किया हुआ।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत अल्लाह तआला की उस व्यापक कृपा और दया को बयान करती है जो वह अपने सभी बंदों पर करता है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हम दोनों प्रकार के लोगों को—चाहे वे दुनिया के लिए काम करने वाले हों या आख़िरत के लिए—अपनी ओर से लगातार रोज़ी और सहारा देते रहते हैं। यह देन और रोज़ी अल्लाह की ओर से है, जो वह अपने रसूल ﷺ के रब की ओर से सभी को प्रदान करता है। यह देन किसी के लिए रोकी नहीं गई है, न किसी ईमान वाले के लिए और न किसी काफ़िर के लिए। अल्लाह तआला अपनी दया और उदारता से सभी को दुनिया में रोज़ी देता है, चाहे वह नेक हो या बदकार। यह अल्लाह की ओर से एक एहसान है जो वह सभी इंसानों पर करता है, बिना किसी भेदभाव के। दुनिया में अल्लाह की रोज़ी और उसकी देन सभी के लिए खुली है, लेकिन आख़िरत की सफलता और अल्लाह की विशेष रहमत केवल उन्हीं के लिए है जो ईमान लाए और नेक कर्म करें।

फ़ायदे (लाभ):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह तआला अत्यंत दयालु और उदार है। वह अपने बंदों को रोज़ी देने में कोई कंजूसी नहीं करता, चाहे वे उसके आज्ञाकारी हों या नाफ़रमान।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की रोज़ी और साधनों का मिलना अल्लाह की निकटता या उसकी ख़ुशी का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की सामान्य दया है जो सभी को मिलती है। असली कामयाबी आख़िरत की सफलता है।
  3. इस आयत से मुसलमानों को यह सबक मिलता है कि उन्हें अपने रब की देन पर संतोष करना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि अल्लाह ने किसी को ज़्यादा दिया और किसी को कम। अल्लाह की देन में हिकमत है, और वह हर चीज़ से बाख़बर है।
  4. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने दिलों से ईर्ष्या और जलन को निकालना चाहिए, क्योंकि अल्लाह की रोज़ी उसकी ओर से है और वह जिसे चाहता है उसे देता है। हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, न कि दूसरों के पास मौजूद चीज़ों पर।
  5. इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह तआला की रहमत और दया इतनी विशाल है कि वह अपने दुश्मनों को भी दुनिया में रोज़ी देता है। यह हमें सिखाता है कि हमें भी अपने दुश्मनों के साथ नेकी और भलाई का व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि अल्लाह तो सभी के साथ भलाई करता है।


📜 आयत 18-22 — सूरा अल-इसरा

18مَّن كَانَ يُرِيدُ الْعَاجِلَةَ عَجَّلْنَا لَهُ فِيهَا مَا نَشَاءُ لِمَن نُّرِيدُ ثُمَّ جَعَلْنَا لَهُ جَهَنَّمَ يَصْلَاهَا مَذْمُومًا مَّدْحُورًا
(और गवाह याहिद की ज़रुरत नहीं) और जो शख़्श दुनिया का ख्वाहाँ हो तो हम जिसे चाहते और जो चाहते हैं उसी दुनिया में सिरदस्त (फ़ौरन) उसे अता करते हैं (मगर) फिर हमने उसके लिए तो जहन्नुम ठहरा ही रखा है कि वह उसमें बुरी हालत से रौंदा हुआ दाख़िल होगा
19وَمَنْ أَرَادَ الْآخِرَةَ وَسَعَىٰ لَهَا سَعْيَهَا وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُولَٰئِكَ كَانَ سَعْيُهُم مَّشْكُورًا
और जो शख़्श आख़िर का मुतमइनी हो और उसके लिए खूब जैसी चाहिए कोशिश भी की और वह ईमानदार भी है तो यही वह लोग हैं जिनकी कोशिश मक़बूल होगी
20كُلًّا نُّمِدُّ هَٰؤُلَاءِ وَهَٰؤُلَاءِ مِنْ عَطَاءِ رَبِّكَ ۚ وَمَا كَانَ عَطَاءُ رَبِّكَ مَحْظُورًا
(ऐ रसूल) उनको (ग़रज़ सबको) हम ही तुम्हारे परवरदिगार की (अपनी) बख़्शिस से मदद देते हैं और तुम्हारे परवरदिगार की बख़्शिस तो (आम है) किसी पर बन्द नहीं
21انظُرْ كَيْفَ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ ۚ وَلَلْآخِرَةُ أَكْبَرُ دَرَجَاتٍ وَأَكْبَرُ تَفْضِيلًا
(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो कि हमने बाज़ लोगों को बाज़ पर कैसी फज़ीलत दी है और आख़िरत के दर्जे तो यक़ीनन (यहाँ से) कहीं बढ़के है और वहाँ की फज़ीलत भी तो कैसी बढ़ कर है
22لَّا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتَقْعُدَ مَذْمُومًا مَّخْذُولًا
और देखो कहीं ख़ुदा के साथ दूसरे को (उसका) शरीक न बनाना वरना तुम बुरे हाल में ज़लील रुसवा बैठै के बैठें रह जाओगे
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20आयत

अनुवाद — अल-इसरा 20

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Saturday, October 3, 2026

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