अल-इसरा · 27/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ ۖ وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِرَبِّهِ كَفُورًا ۝٢٧
Innal mubazzireena kaanoo ikhwaanash shayaateeni wa kaanash shaytaanu li Rabbihee kafooraa
📖 हिंदी अर्थ
क्योंकि फुज़ूलख़र्ची करने वाले यक़ीनन शैतानों के भाई है और शैतान अपने परवरदिगार का बड़ा नाशुक्री करने वाला है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • المُبَذِّرِينَ (मुबज़्ज़िरीन): उन लोगों को कहते हैं जो अपने धन को बर्बाद करते हैं, अर्थात् इसे अवैध कामों में या हद से ज़्यादा फिज़ूलखर्ची में खर्च करते हैं।
  • إِخْوَانَ (इख़्वान): भाई, यहाँ अर्थ है समान और साथी।
  • الشَّيَاطِينِ (शैतानीन): शैतान (बहुवचन), अर्थात् इब्लीस और उसकी संतान/सहायक।
  • كَفُورًا (कफ़ूरा): अत्यधिक कृतघ्न और इनकार करने वाला, जो अल्लाह की नेमतों का बड़ी मात्रा में अहसान-फ़रामोश हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला ने उन लोगों के बारे में बताया है जो अपने धन को बर्बाद करते हैं और उसे अल्लाह की नाफ़रमानी (अवज्ञा) के कामों में खर्च करते हैं। ऐसे लोगों को अल्लाह ने शैतानों का भाई कहा है। इसका मतलब यह है कि जिस तरह शैतान अल्लाह की अवज्ञा करता है और उसके आदेशों का उल्लंघन करता है, उसी तरह ये फिज़ूलखर्च लोग भी अल्लाह की नेमतों का दुरुपयोग करके उसकी अवज्ञा करते हैं। वे शैतान के कहने पर चलते हैं, क्योंकि शैतान उन्हें धन बर्बाद करने और अत्यधिक खर्च करने के लिए उकसाता है। इस प्रकार वे शैतान के अनुयायी और उसके साथी बन जाते हैं।

फिर अल्लाह ने शैतान की विशेषता बताई कि वह अपने रब का अत्यधिक कृतघ्न और इनकार करने वाला है। शैतान अल्लाह की नेमतों का अहसान नहीं मानता, बल्कि उसकी नेमतों के बावजूद वह उसकी अवज्ञा करता है और उसके खिलाफ विद्रोह करता है। यहाँ शैतान का ज़िक्र इसलिए किया गया ताकि यह स्पष्ट हो कि जो लोग शैतान का अनुसरण करते हैं, वे भी उसी की तरह कृतघ्न और अहसान-फ़रामोश होते हैं, क्योंकि वे अल्लाह की दी हुई नेमतों (धन) का उपयोग उसकी नाफ़रमानी में करते हैं।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. धन अल्लाह की अमानत है: यह आयत हमें सिखाती है कि धन अल्लाह की दी हुई नेमत और अमानत है। इसे उसी के बताए हुए रास्ते पर खर्च करना चाहिए, न कि बर्बादी और अवज्ञा में।
  2. फिज़ूलखर्ची शैतानी काम है: जो व्यक्ति अपने धन को बेकार या हराम कामों में खर्च करता है, वह शैतान का साथी बन जाता है। यह एक गंभीर चेतावनी है कि हम अपने खर्च में संयम बरतें।
  3. शैतान से दूरी बनाए रखें: शैतान अल्लाह का कृतघ्न है, और जो उसकी پیروی करते हैं, वे भी कृतघ्न होते हैं। हमें शैतान के रास्ते से बचना चाहिए और अल्लाह के शुक्रगुज़ार बंदे बनना चाहिए।
  4. इस्लाम में संतुलन की शिक्षा: इस्लाम धन खर्च करने में संतुलन और मध्यमार्ग सिखाता है — न तो पूरी तरह कंजूसी और न ही फिज़ूलखर्ची। यह आयत हमें इसी संतुलन की ओर बुलाती है।
  5. अल्लाह की नेमतों का सही उपयोग: हर नेमत का सही उपयोग करना अल्लाह की इबादत का हिस्सा है। जो व्यक्ति नेमतों का सही उपयोग करता है, वह अल्लाह का शुक्रगुज़ार बंदा कहलाता है, और जो दुरुपयोग करता है, वह शैतान के क़ाफ़िले में शामिल हो जाता है।


📜 आयत 25-29 — अल-इसरा

25رَّبُّكُمْ أَعْلَمُ بِمَا فِي نُفُوسِكُمْ ۚ إِن تَكُونُوا صَالِحِينَ فَإِنَّهُ كَانَ لِلْأَوَّابِينَ غَفُورًا
इसी तरह तू भी इन पर रहम फरमा तुम्हारे दिल की बात तुम्हारा परवरदिगार ख़ूब जानता है अगर तुम (वाक़ई) नेक होगे और भूले से उनकी ख़ता की है तो वह तुमको बख्श देगा क्योंकि वह तो तौबा करने वालों का बड़ा बख़शने वाला है
26وَآتِ ذَا الْقُرْبَىٰ حَقَّهُ وَالْمِسْكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَلَا تُبَذِّرْ تَبْذِيرًا
और क़राबतदारों और मोहताज और परदेसी को उनका हक़ दे दो और ख़बरदार फुज़ूल ख़र्ची मत किया करो
27إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ ۖ وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِرَبِّهِ كَفُورًا
क्योंकि फुज़ूलख़र्ची करने वाले यक़ीनन शैतानों के भाई है और शैतान अपने परवरदिगार का बड़ा नाशुक्री करने वाला है
28وَإِمَّا تُعْرِضَنَّ عَنْهُمُ ابْتِغَاءَ رَحْمَةٍ مِّن رَّبِّكَ تَرْجُوهَا فَقُل لَّهُمْ قَوْلًا مَّيْسُورًا
और तुमको अपने परवरदिगार के फज़ल व करम के इन्तज़ार में जिसकी तुम को उम्मीद हो (मजबूरन) उन (ग़रीबों) से मुँह मोड़ना पड़े तो नरमी से उनको समझा दो
29وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً إِلَىٰ عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ الْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًا مَّحْسُورًا
और अपने हाथ को न तो गर्दन से बँधा हुआ (बहुत तंग) कर लो (कि किसी को कुछ दो ही नहीं) और न बिल्कुल खोल दो कि सब कुछ दे डालो और आख़िर तुम को मलामत ज़दा हसरत से बैठना पड़े
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अनुवाद — अल-इसरा 27

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Tuesday, August 18, 2026

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