अल-इसरा · 66/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
رَّبُّكُمُ الَّذِي يُزْجِي لَكُمُ الْفُلْكَ فِي الْبَحْرِ لِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا ۝٦٦
Rabbukumul lazee yuzjee lakumul fulka fil bahri litabtaghoo min fadlih; innahoo kaana bikum Raheemaa
📖 हिंदी अर्थ
लोगों) तुम्हारा परवरदिगार वह (क़ादिरे मुत्तलिक़) है जो तुम्हारे लिए समन्दर में जहाज़ों को चलाता है ताकि तुम उसके फज़ल व करम (रोज़ी) की तलाश करो इसमें शक़ नहीं कि वह तुम पर बड़ा मेहरबान है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُزْجِي (युज़्जी): चलाना, संचालित करना, धीरे-धीरे ले जाना।
  • الْفُلْكَ (अल-फुल्क): जहाज़, नौका।
  • تَبْتَغُوا (तब्तग़ू): तलाश करना, खोजना।
  • مِن فَضْلِهِ (मिन फ़ज़्लिही): उसकी कृपा से (रोज़ी, आजीविका)।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ लोगों! तुम्हारा रब वही है जो समुद्र में तुम्हारे लिए जहाज़ों को चलाता है। वह इन विशाल और भारी जहाज़ों को पानी की सतह पर इस तरह ले जाता है कि वे तुम्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक सुरक्षित पहुँचा देते हैं। यह सब इसलिए होता है ताकि तुम उसकी कृपा से अपनी रोज़ी कमा सको—व्यापार, यात्रा और विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से। अल्लाह ने यह सुविधा केवल इसलिए प्रदान की है क्योंकि वह तुम पर अत्यंत दयालु और कृपाशील है।

ज़रा सोचो—जब तुम समुद्र के विशाल और गहरे पानी में सफर करते हो, तो क्या तुम्हारे पास कोई और सहारा होता है? नहीं! केवल अल्लाह की दया और उसकी ताक़त ही है जो उन जहाज़ों को पानी पर तैराए रखती है और तुम्हें मंज़िल तक पहुँचाती है। यह अल्लाह की रहमत का जीता-जागता सबूत है। वह चाहता तो समुद्र को उग्र बना देता और जहाज़ तुम्हारे लिए बेकार हो जाते, लेकिन उसने अपनी दया से समुद्र को वश में कर रखा है और जहाज़ों को चलाने के साधन सिखाए हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत हर जगह हमारे साथ है। वह हमारी ज़रूरतों को जानता है और उन्हें पूरा करने के साधन उपलब्ध कराता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम उसका शुक्र अदा करें, उस पर भरोसा रखें और अपने कामों में उसकी मदद माँगते रहें। जब अल्लाह इतना दयालु है कि समुद्र में जहाज़ चलाने जैसी बड़ी सुविधा हमें देता है, तो क्या वह हमारी छोटी-छोटी ज़रूरतों का ख्याल नहीं रखेगा? ज़रूर रखेगा! बस हमें उस पर भरोसा करना चाहिए और उसकी दी हुई नेमतों का सही इस्तेमाल करना चाहिए।

यह आयत हमें यह भी बताती है कि इस्लाम रोज़ी कमाने और हलाल कमाई करने की तरग़ीब देता है। अल्लाह ने समुद्र को इंसान के लिए वश में किया है ताकि वह उसमें सफर करे और अपनी ज़रूरतें पूरी करे। यह एक बड़ी नेमत है, और नेमत का सही तरीक़ा यह है कि हम उसका शुक्र अदा करें और उसे अल्लाह की राह में इस्तेमाल करें।



📜 आयत 64-68 — अल-इसरा

64وَاسْتَفْزِزْ مَنِ اسْتَطَعْتَ مِنْهُم بِصَوْتِكَ وَأَجْلِبْ عَلَيْهِم بِخَيْلِكَ وَرَجِلِكَ وَشَارِكْهُمْ فِي الْأَمْوَالِ وَالْأَوْلَادِ وَعِدْهُمْ ۚ وَمَا يَعِدُهُمُ الشَّيْطَانُ إِلَّا غُرُورًا
और इसमें से जिस पर अपनी (चिकनी चुपड़ी) बात से क़ाबू पा सके वहॉ और अपने (चेलों के लश्कर) सवार और पैदल (सब) से चढ़ाई कर और माल और औलाद में उनके साथ साझा करे और उनसे (खूब झूठे) वायदे कर और शैतान तो उनसे जो वायदे करता है धोखे के सिवा कुछ नहीं होता
65إِنَّ عِبَادِي لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَانٌ ۚ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ وَكِيلًا
बेशक जो मेरे (ख़ास) बन्दें हैं उन पर तेरा ज़ोर नहीं चल (सकता) और कारसाज़ी में तेरा परवरदिगार काफी है
66رَّبُّكُمُ الَّذِي يُزْجِي لَكُمُ الْفُلْكَ فِي الْبَحْرِ لِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا
लोगों) तुम्हारा परवरदिगार वह (क़ादिरे मुत्तलिक़) है जो तुम्हारे लिए समन्दर में जहाज़ों को चलाता है ताकि तुम उसके फज़ल व करम (रोज़ी) की तलाश करो इसमें शक़ नहीं कि वह तुम पर बड़ा मेहरबान है
67وَإِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فِي الْبَحْرِ ضَلَّ مَن تَدْعُونَ إِلَّا إِيَّاهُ ۖ فَلَمَّا نَجَّاكُمْ إِلَى الْبَرِّ أَعْرَضْتُمْ ۚ وَكَانَ الْإِنسَانُ كَفُورًا
और जब समन्दर में कभी तुम को कोई तकलीफ पहुँचे तो जिनकी तुम इबादत किया करते थे ग़ायब हो गए मगर बस वही (एक ख़ुदा याद रहता है) उस पर भी जब ख़ुदा ने तुम को छुटकारा देकर खुशकी तक पहुँचा दिया तो फिर तुम इससे मुँह मोड़ बैठें और इन्सान बड़ा ही नाशुक्रा है
68أَفَأَمِنتُمْ أَن يَخْسِفَ بِكُمْ جَانِبَ الْبَرِّ أَوْ يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًا ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ وَكِيلًا
तो क्या तुम उसको इस का भी इत्मिनान हो गया कि वह तुम्हें खुश्की की तरफ (ले जाकर) (क़ारुन की तरह) ज़मीन में धंसा दे या तुम पर (क़ौम) लूत की तरह पत्थरों का मेंह बरसा दे फिर (उस वक्त) तुम किसी को अपना कारसाज़ न पाओगे
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अनुवाद — अल-इसरा 66

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Tuesday, August 18, 2026

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