अल-इसरा · 91/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
أَوْ تَكُونَ لَكَ جَنَّةٌ مِّن نَّخِيلٍ وَعِنَبٍ فَتُفَجِّرَ الْأَنْهَارَ خِلَالَهَا تَفْجِيرًا ۝٩١
Aw takoona laka jannatum min nakheelinw wa `inabin fatufajjiral anhaara khilaalahaa tafjeeraa
📖 हिंदी अर्थ
या (ये नहीं तो) खजूरों और अंगूरों का तुम्हारा कोई बाग़ हो उसमें तुम बीच बीच में नहरे जारी करके दिखा दो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • जन्नत (जन्नत): बाग़, बग़ीचा
  • नख़ील (नख़ील): खजूर के पेड़
  • इनब (इनब): अंगूर
  • तुफ़ज्जिर (तुफ़ज्जिर): बहा देना, जारी कर देना
  • ख़िलालहा (ख़िलालहा): उसके बीचों-बीच, उसके भीतर
  • तफ़्जीरन (तफ़्जीरन): अच्छी तरह बहाना, चीरकर बहा देना

तफ़सीर:

यह आयत उन मुशरिकीन का जवाब है जिन्होंने नबी करीम ﷺ से अजीब-ओ-ग़रीब माँगें रखीं। उन्होंने कहा कि हम तुम पर ईमान नहीं लाएँगे जब तक कि तुम हमारे लिए ये चमत्कार न कर दो। उन्हीं माँगों में से एक यह थी कि "या तो तुम्हारे पास खजूर और अंगूर का एक ऐसा बाग़ हो जिसके बीचों-बीच नहरें बहती हों।"

अल्लाह तआला ने इस आयत में उनकी यह माँग बयान की है। वे कहते थे कि हम उस आदमी की पैरवी कैसे करें जो हमारी तरह ही खाता-पीता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है? अगर वह सच्चा नबी है तो उसे अपनी नबुव्वत के सुबूत में ये काम करके दिखाने चाहिए।

यह आयत उनके इसी रवैये की तरफ़ इशारा करती है। वे चाहते थे कि मुहम्मद ﷺ के पास खजूर और अंगूर का एक ऐसा शानदार बाग़ हो जिसके बीच से नदियाँ बहती हों। यानी उन्होंने दुनियावी आसाइश और माल-दौलत को नबुव्वत की शर्त बना दिया था, जबकि नबुव्वत अल्लाह की तरफ़ से बख़्शी जाने वाली चीज़ है, यह किसी की ज़ाती कमाई या दुनियावी हैसियत पर मुनहसिर नहीं।

इस आयत में अल्लाह तआला ने उनकी इन माँगों को बयान करके यह सबक़ सिखाया है कि ईमान का ताल्लुक़ दिल से होता है, न कि दुनियावी चमत्कारों और माल-दौलत से। अल्लाह के रसूल ﷺ की सबसे बड़ी निशानी क़ुरआन है, जो हमेशा के लिए ज़िंदा चमत्कार है। जो शख्स दिल की आँखों से देखना चाहे, उसके लिए क़ुरआन ही काफ़ी है।

और ईमान लाने वालों के लिए इस आयत में बड़ी नसीहत है कि वे दुनिया की चमक-दमक को कभी ईमान और दीन पर तरजीह न दें। असली कामयाबी अल्लाह की रज़ा और उसके रसूल की पैरवी में है, न कि खजूर और अंगूर के बाग़ों और बहती नहरों में।



📜 आयत 89-93 — अल-इसरा

89وَلَقَدْ صَرَّفْنَا لِلنَّاسِ فِي هَٰذَا الْقُرْآنِ مِن كُلِّ مَثَلٍ فَأَبَىٰ أَكْثَرُ النَّاسِ إِلَّا كُفُورًا
और हमने तो लोगों (के समझाने) के वास्ते इस क़ुरान में हर क़िस्म की मसलें अदल बदल के बयान कर दीं उस पर भी अक्सर लोग बग़ैर नाशुक्री किए नहीं रहते
90وَقَالُوا لَن نُّؤْمِنَ لَكَ حَتَّىٰ تَفْجُرَ لَنَا مِنَ الْأَرْضِ يَنبُوعًا
(ऐ रसूल कुफ्फार मक्के ने) तुमसे कहा कि जब तक तुम हमारे वास्ते ज़मीन से चश्मा (न) बहा निकालोगे हम तो तुम पर हरगिज़ ईमान न लाएँगें
91أَوْ تَكُونَ لَكَ جَنَّةٌ مِّن نَّخِيلٍ وَعِنَبٍ فَتُفَجِّرَ الْأَنْهَارَ خِلَالَهَا تَفْجِيرًا
या (ये नहीं तो) खजूरों और अंगूरों का तुम्हारा कोई बाग़ हो उसमें तुम बीच बीच में नहरे जारी करके दिखा दो
92أَوْ تُسْقِطَ السَّمَاءَ كَمَا زَعَمْتَ عَلَيْنَا كِسَفًا أَوْ تَأْتِيَ بِاللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ قَبِيلًا
या जैसा तुम गुमान रखते थे हम पर आसमान ही को टुकड़े (टुकड़े) करके गिराओ या ख़ुदा और फरिश्तों को (अपने क़ौल की तस्दीक़) में हमारे सामने (गवाही में ला खड़ा कर दिया
93أَوْ يَكُونَ لَكَ بَيْتٌ مِّن زُخْرُفٍ أَوْ تَرْقَىٰ فِي السَّمَاءِ وَلَن نُّؤْمِنَ لِرُقِيِّكَ حَتَّىٰ تُنَزِّلَ عَلَيْنَا كِتَابًا نَّقْرَؤُهُ ۗ قُلْ سُبْحَانَ رَبِّي هَلْ كُنتُ إِلَّا بَشَرًا رَّسُولًا
और जब तक तुम हम पर ख़ुदा के यहाँ से एक किताब न नाज़िल करोगे कि हम उसे खुद पढ़ भी लें उस वक्त तक हम तुम्हारे (आसमान पर चढ़ने के भी) क़ायल न होगें (ऐ रसूल) तुम कह दो कि सुबहान अल्लाह मै एक आदमी (ख़ुदा के) रसूल के सिवा आख़िर और क्या हूँ
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अनुवाद — अल-इसरा 91

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Tuesday, August 18, 2026

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