मरियम · 4/98
अनुवाद उच्चारण — सूरा मरियम
قَالَ رَبِّ إِنِّي وَهَنَ الْعَظْمُ مِنِّي وَاشْتَعَلَ الرَّأْسُ شَيْبًا وَلَمْ أَكُن بِدُعَائِكَ رَبِّ شَقِيًّا ۝٤
Qaala Rabbi innee wahanal`azmu minnee washta`alar raasu shaibanw wa lam akum bidu`aaa`ika Rabbi shaqiyyaa
📖 हिंदी अर्थ
(और) अर्ज़ की ऐ मेरे पालने वाले मेरी हड्डियां कमज़ोर हो गई और सर है कि बुढ़ापे की (आग से) भड़क उठा (सेफद हो गया) है और ऐ मेरे पालने वाले मैं तेरी बारगाह में दुआ कर के कभी महरूम नहीं रहा हूँ

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَهَنَ الْعَظْمُ – हड्डियाँ कमज़ोर हो गईं।
  • وَاشْتَعَلَ الرَّأْسُ شَيْبًا – सिर में बुढ़ापे के सफ़ेद बाल फैल गए (जैसे आग की लपटें फैलती हैं)।
  • شَقِيًّا – अभागा, निराश, दुआ से महरूम।

तफ़सीर (व्याख्या):

हज़रत ज़करिय्या (अलैहिस्सलाम) ने अपनी दुआ में अल्लाह के सामने अपनी कमज़ोरी और बुढ़ापे का हाल बयान किया। उन्होंने कहा: "ऐ मेरे रब! मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो गई हैं, मेरा शरीर बूढ़ा हो गया है, और मेरे सिर के बाल सफ़ेदी से चमकने लगे हैं — यानी बुढ़ापे का असर मेरे पूरे वजूद पर दिखाई दे रहा है।" ये अल्फ़ाज़ उनकी इब्तिहाल (गिड़गिड़ाहट) और अल्लाह के सामने अपनी हाजत बयान करने की निहायत खूबसूरत सूरत है।

फिर उन्होंने ये बात कही जो उनकी उम्मीद और यक़ीन की गहराई को दिखाती है: "ऐ मेरे रब! मैं अपनी दुआओं में तुझसे कभी निराश नहीं लौटा। तूने हमेशा मेरी दुआ सुनी और मुझे कभी महरूम नहीं किया।" ये जुमला दरअसल उनके अल्लाह पर भरोसे और उसकी रहमत से जुड़े पुराने तजुर्बे का इज़हार है। वो ये कहना चाहते थे कि ऐ अल्लाह! तूने मुझे आज तक कभी नाउम्मीद नहीं किया, इसलिए मुझे पूरा यक़ीन है कि इस बार भी तू मेरी दुआ क़बूल करेगा और मुझे एक नेक औलाद अता करेगा।

इस आयत में हमें कई अहम सबक़ मिलते हैं:

  1. दुआ में अपनी कमज़ोरी और हाजत का इज़हार करना – अल्लाह के सामने अपनी मजबूरी बयान करना अच्छा है, क्योंकि ये अल्लाह के सामने इब्तिहाल और इन्किसार की निशानी है।
  2. अल्लाह पर भरोसा और उसकी रहमत से उम्मीद – हज़रत ज़करिय्या (अलैहिस्सलाम) ने अपनी पुरानी दुआओं की क़बूलियत का ज़िक्र करके अल्लाह से उम्मीदवारी का सबक़ सिखाया। हमें भी चाहिए कि अल्लाह की पिछली नेअमतों को याद करके उससे और ज़्यादा उम्मीद रखें।
  3. बुढ़ापे में भी दुआ की ताक़त – ये आयत हमें बताती है कि इंसान चाहे कितना ही बूढ़ा और कमज़ोर हो जाए, उसे अल्लाह से दुआ माँगना नहीं छोड़ना चाहिए। अल्लाह की रहमत और क़ुदरत किसी भी हाल में बड़ी है।

ये दुआ हमें सिखाती है कि अल्लाह से माँगते वक़्त हमें अपनी कमज़ोरी का इज़हार करना चाहिए और साथ ही उसकी रहमत पर पूरा यक़ीन रखना चाहिए। अल्लाह अपने बंदे की दुआ कभी बेकार नहीं करता, बल्कि उसे सबसे अच्छे तरीक़े से क़बूल करता है। हमें भी चाहिए कि अपनी हर हाजत में अल्लाह से दुआ करें और उसकी रहमत से कभी मायूस न हों।



📜 आयत 2-6 — सूरा मरियम

2ذِكْرُ رَحْمَتِ رَبِّكَ عَبْدَهُ زَكَرِيَّا
ये तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी का ज़िक्र है जो (उसने) अपने ख़ास बन्दे ज़करिया के साथ की थी
3إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُ نِدَاءً خَفِيًّا
कि जब ज़करिया ने अपने परवरदिगार को धीमी आवाज़ से पुकारा
4قَالَ رَبِّ إِنِّي وَهَنَ الْعَظْمُ مِنِّي وَاشْتَعَلَ الرَّأْسُ شَيْبًا وَلَمْ أَكُن بِدُعَائِكَ رَبِّ شَقِيًّا
(और) अर्ज़ की ऐ मेरे पालने वाले मेरी हड्डियां कमज़ोर हो गई और सर है कि बुढ़ापे की (आग से) भड़क उठा (सेफद हो गया) है और ऐ मेरे पालने वाले मैं तेरी बारगाह में दुआ कर के कभी महरूम नहीं रहा हूँ
5وَإِنِّي خِفْتُ الْمَوَالِيَ مِن وَرَائِي وَكَانَتِ امْرَأَتِي عَاقِرًا فَهَبْ لِي مِن لَّدُنكَ وَلِيًّا
और मैं अपने (मरने के) बाद अपने वारिसों से सहम जाता हूँ (कि मुबादा दीन को बरबाद करें) और मेरी बीबी उम्मे कुलसूम बिनते इमरान बांझ है पस तू मुझको अपनी बारगाह से एक जाँनशीन फरज़न्द अता फ़रमा
6يَرِثُنِي وَيَرِثُ مِنْ آلِ يَعْقُوبَ ۖ وَاجْعَلْهُ رَبِّ رَضِيًّا
जो मेरी और याकूब की नस्ल की मीरास का मालिक हो ऐ मेरे परवरदिगार और उसको अपना पसन्दीदा बन्दा बना
मरियमकुरान सूची
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अनुवाद — मरियम 4

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Monday, September 28, 2026

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