Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- يَنقُضُونَ: तोड़ना, भंग करना।
- عَهْدَ اللَّهِ: अल्लाह का वचन और आदेश।
- مِيثَاقِهِ: उसकी पक्की प्रतिज्ञा (जो अल्लाह ने ली थी)।
- يَقْطَعُونَ: काटना, तोड़ना।
- أَمَرَ اللَّهُ بِهِ أَن يُوصَلَ: जिसे जोड़ने का अल्लाह ने आदेश दिया है (जैसे रिश्ते-नाते, ईमान, रसूलों पर ईमान)।
- يُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ: धरती में बिगाड़ पैदा करना, अवज्ञा और पाप फैलाना।
- الْخَاسِرُونَ: घाटे में रहने वाले, नुकसान उठाने वाले।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों का वर्णन करती है जो अल्लाह की ली गई प्रतिज्ञा को तोड़ते हैं। अल्लाह ने इंसानों से यह वचन लिया था कि वे उसकी एकता (तौहीद) को मानेंगे, उसकी आज्ञा का पालन करेंगे और उसके भेजे हुए रसूलों पर ईमान लाएँगे। यह वचन अत्यंत पक्का था, जिसे अल्लाह ने रसूलों के भेजने और किताबों के उतारने से और भी मज़बूत कर दिया। इसके बावजूद ये लोग इस वचन को भंग कर देते हैं।
इसके अलावा, वे उन चीज़ों को काटते हैं जिन्हें अल्लाह ने जोड़ने का आदेश दिया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है अल्लाह और उसके रसूल (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर ईमान लाना, सभी नबियों को मानना, और रिश्तेदारों (अर्हाम) के साथ अच्छा व्यवहार करना और उनसे नाता जोड़ना शामिल है। ये लोग इन सबको तोड़ते हैं।
फिर वे धरती में फ़साद फैलाते हैं, यानी पाप और अवज्ञा करते हैं, लोगों को सत्य मार्ग से रोकते हैं, और अल्लाह के दीन में रुकावटें डालते हैं। ऐसे लोगों के बारे में अल्लाह फ़रमाता है कि यही सच्चे घाटे में हैं—दुनिया में भी, क्योंकि वे सत्य और भलाई से वंचित रहते हैं, और आख़िरत में भी, क्योंकि उनका ठिकाना जहन्नम है। उनका यह नुकसान पूर्ण और स्पष्ट है, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की रहमत और सफलता के बदले ग़ुस्सा और असफलता खरीद ली।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- वचन की पवित्रता: अल्लाह से किया गया वचन अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक मुसलमान को चाहिए कि वह अल्लाह से किए गए वादे (ईमान, इबादत, आज्ञाकारिता) को पूरा करे और उसे तोड़ने से बचे।
- रिश्तों की अहमियत: इस्लाम रिश्तेदारों से जुड़ने और उनके साथ भलाई करने पर बहुत ज़ोर देता है। रिश्ते तोड़ना कबीरा गुनाह है और अल्लाह की नाराज़गी का कारण बनता है।
- फ़साद से बचाव: धरती में फ़साद फैलाना (चाहे वह सामाजिक, आर्थिक या नैतिक हो) इस्लाम में सख्त मना है। मुसलमान को चाहिए कि वह सुधार और भलाई का ज़रिया बने, न कि बिगाड़ का।
- सच्चा नुकसान: यह आयत हमें सिखाती है कि असली नुकसान वह नहीं जो दुनिया के माल-दौलत में हो, बल्कि असली नुकसान अल्लाह से दूरी और उसकी नाराज़गी है। जो इंसान अल्लाह की राह से भटक जाए, वही सबसे बड़ा घाटे में है।
- ईमान की पक्की नींव: यह आयत हमें याद दिलाती है कि अल्लाह ने हमसे जो वचन लिया है—उसकी इबादत और रसूलों की पैरवी—उसे मज़बूती से थामे रहना चाहिए, ताकि हम दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब हों।
📜 आयत 25-29 — सूरा अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 27
सूरा अल-बकरा आयत 27 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : जो लोग खुदा के एहदो पैमान को मज़बूत हो जाने…सूरा आयत 27/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 25–29. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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