अल-बकरा · 78/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَمِنْهُمْ أُمِّيُّونَ لَا يَعْلَمُونَ الْكِتَابَ إِلَّا أَمَانِيَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَظُنُّونَ ۝٧٨
Wa minhum ummiyyoona laa ya`lamoonal kitaaba illaaa amaaniyya wa in hum illaa yazunnoon
📖 हिंदी अर्थ
और कुछ उनमें से ऐसे अनपढ़ हैं कि वह किताबे खुदा को अपने मतलब की बातों के सिवा कुछ नहीं समझते और वह फक़त ख्याली बातें किया करते हैं,
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أُمِّيُّونَ (उम्मिय्यून): अनपढ़ लोग, जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते।
  • أَمَانِيَّ (अमानिय्य): यह "أُمْنِيَّة" का बहुवचन है, जिसका अर्थ है झूठी आशाएँ, मनगढ़ंत बातें, या केवल तिलावत (पढ़ना) जिसका अर्थ समझ में न आए।
  • يَظُنُّونَ (यज़ुन्नून): वे केवल अटकल और गुमान पर चलते हैं, निश्चित ज्ञान नहीं रखते।

तफसीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला यहूदियों के एक और गिरोह का हाल बयान कर रहा है। उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पढ़ना-लिखना बिल्कुल नहीं जानते। वे तौरात (तोराह) के वास्तविक ज्ञान से महरूम हैं। उन्हें अपनी किताब का सही इल्म नहीं, बल्कि उन्होंने अपने बड़ों और राहबरों से कुछ मनगढ़ंत बातें और झूठी आशाएँ सीख रखी हैं, जिन्हें वे सच समझते हैं। वे केवल तिलावत कर लेते हैं, लेकिन उसके मायने और मतलब से बेखबर हैं। उनका यह ज्ञान किसी ठोस दलील और यक़ीन पर आधारित नहीं, बल्कि सिर्फ़ गुमान, अटकल और तक़लीद (अंधी पैरवी) पर टिका हुआ है। वे न तो खुद समझते हैं और न ही उन्हें सच्चाई की तलाश है, बल्कि वे अपने बुज़ुर्गों की बनाई हुई बातों पर भरोसा किए हुए हैं, जिनका अल्लाह की नाज़िल की हुई किताब से कोई ताल्लुक़ नहीं।


फ़ायदे (सीख):

  1. ज्ञान का महत्व: यह आयत सिखाती है कि अल्लाह की किताब को सिर्फ़ पढ़ना काफ़ी नहीं, बल्कि उसका अर्थ समझना और उस पर अमल करना ज़रूरी है। अंधी तक़लीद और बिना समझे केवल तिलावत करना इंसान को सच्चाई तक नहीं पहुँचाता।
  2. सच्ची राहनुमाई: इस्लाम हमें सिखाता है कि हर बात को दलील और सबूत के साथ क़बूल करना चाहिए, न कि सिर्फ़ इसलिए कि हमारे बड़ों ने कहा। क़ुरआन और सुन्नत हमारे लिए सच्चा इल्म और यक़ीन का ज़रिया हैं।
  3. अल्लाह की रहमत: यह आयत हमें शुक्रगुज़ार बनाती है कि अल्लाह ने हमें क़ुरआन समझने की तौफ़ीक़ दी और हमें उन लोगों की तरह नहीं बनाया जो सिर्फ़ गुमान और अटकल पर चलते हैं। यह हमारे लिए बड़ी नेमत है कि हम अपने दीन को समझकर उस पर अमल कर सकते हैं।
  4. सावधानी: हमें चाहिए कि हम अपने इल्म की कमी को पूरा करने की कोशिश करें, क्योंकि जो लोग जानबूझकर अज्ञानता में रहते हैं और सच्चाई की तलाश नहीं करते, वे गुमराही में पड़े रहते हैं। इस्लाम हमें सीखने, समझने और सच्चाई की खोज करने की तरग़ीब देता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 76-80 — अल-बकरा

76وَإِذَا لَقُوا الَّذِينَ آمَنُوا قَالُوا آمَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ قَالُوا أَتُحَدِّثُونَهُم بِمَا فَتَحَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَاجُّوكُم بِهِ عِندَ رَبِّكُمْ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
जो ईमान लाए तो कह देते हैं कि हम तो ईमान ला चुके और जब उनसे बाज़-बाज़ के साथ तख़िलया करते हैं तो कहते हैं कि जो कुछ खुदा ने तुम पर (तौरेत) में ज़ाहिर कर दिया है क्या तुम (मुसलमानों को) बता दोगे ताकि उसके सबब से कल तुम्हारे खुदा के पास तुम पर हुज्जत लाएँ क्या तुम इतना भी नहीं समझते
77أَوَلَا يَعْلَمُونَ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ
लेकिन क्या वह लोग (इतना भी) नहीं जानते कि वह लोग जो कुछ छिपाते हैं या ज़ाहिर करते हैं खुदा सब कुछ जानता है
78وَمِنْهُمْ أُمِّيُّونَ لَا يَعْلَمُونَ الْكِتَابَ إِلَّا أَمَانِيَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَظُنُّونَ
और कुछ उनमें से ऐसे अनपढ़ हैं कि वह किताबे खुदा को अपने मतलब की बातों के सिवा कुछ नहीं समझते और वह फक़त ख्याली बातें किया करते हैं,
79فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ يَكْتُبُونَ الْكِتَابَ بِأَيْدِيهِمْ ثُمَّ يَقُولُونَ هَٰذَا مِنْ عِندِ اللَّهِ لِيَشْتَرُوا بِهِ ثَمَنًا قَلِيلًا ۖ فَوَيْلٌ لَّهُم مِّمَّا كَتَبَتْ أَيْدِيهِمْ وَوَيْلٌ لَّهُم مِّمَّا يَكْسِبُونَ
पस वाए हो उन लोगों पर जो अपने हाथ से किताब लिखते हैं फिर (लोगों से कहते फिरते) हैं कि ये खुदा के यहाँ से (आई) है ताकि उसके ज़रिये से थोड़ी सी क़ीमत (दुनयावी फ़ायदा) हासिल करें पस अफसोस है उन पर कि उनके हाथों ने लिखा और फिर अफसोस है उनपर कि वह ऐसी कमाई करते हैं
80وَقَالُوا لَن تَمَسَّنَا النَّارُ إِلَّا أَيَّامًا مَّعْدُودَةً ۚ قُلْ أَتَّخَذْتُمْ عِندَ اللَّهِ عَهْدًا فَلَن يُخْلِفَ اللَّهُ عَهْدَهُ ۖ أَمْ تَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
और कहते हैं कि गिनती के चन्द दिनों के सिवा हमें आग छुएगी भी तो नहीं (ऐ रसूल) इन लोगों से कहो कि क्या तुमने खुदा से कोई इक़रार ले लिया है कि फिर वह किसी तरह अपने इक़रार के ख़िलाफ़ हरगिज़ न करेगा या बे समझे बूझे खुदा पर बोहताव जोड़ते हो
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अनुवाद — अल-बकरा 78

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Tuesday, August 18, 2026

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