अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ – उनके सामने जो कुछ है (आख़िरत और क़यामत के मामले)
- وَمَا خَلْفَهُمْ – और उनके पीछे जो कुछ है (दुनिया के मामले)
- لَا يُحِيطُونَ بِهِ عِلْمًا – वे उसे (अल्लाह को) अपने ज्ञान से घेर नहीं सकते
तफ़सीर:
अल्लाह तआला अपने बंदों के हर हाल से पूरी तरह वाक़िफ़ है। वह जानता है जो कुछ उनके सामने है, यानी आख़िरत, क़यामत, हश्र-नश्र, जन्नत-जहन्नम और उन सब हालात को जो मौत के बाद पेश आएँगी। और वह जानता है जो कुछ उनके पीछे है, यानी दुनिया की ज़िंदगी, उनके अमल, उनकी नीयतें, उनके किए-धरे सारे काम, और वह सब कुछ जो वे दुनिया में कर चुके हैं या करेंगे। अल्लाह के इल्म में न तो कोई चीज़ पुरानी है और न कोई चीज़ उससे छिपी है — न माज़ी (गुज़रा हुआ), न हाज़िर (वर्तमान), न मुस्तक़बिल (आने वाला)। सब कुछ उसके इल्म में एक जैसा हाज़िर और वाज़ेह है।
लेकिन इंसान और तमाम मख़लूक़ात — चाहे वे फ़रिश्ते हों या जिन्न या इंसान — अल्लाह की ज़ात और उसकी सिफ़ात को अपने इल्म से हरगिज़ घेर नहीं सकते। उसकी क़ुदरत, उसकी हिकमत, उसके इल्म की कुंजियाँ, उसके फ़ैसले — ये सब उसकी मख़लूक़ की समझ से बालातर हैं। इंसान चाहे कितना ही ज्ञान हासिल कर ले, चाहे विज्ञान की कितनी ही ऊँचाइयों पर पहुँच जाए, वह अल्लाह के इल्म के मुक़ाबले में कुछ भी नहीं जानता। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और उन्हें उसके इल्म में से कुछ भी हासिल नहीं, मगर जितना वह चाहे" (सूरह बक़रा: 255)।
यह आयत हमें अल्लाह की अज़मत और उसके इल्म की बेपनाह वुसअत का एहसास दिलाती है। जब हमें यह यक़ीन हो जाए कि अल्लाह हमारे हर अमल, हर नीयत, हर ख़याल से वाक़िफ़ है — जो हमने किया और जो हम करेंगे — तो हमारे दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ पैदा होता है और हम गुनाहों से बचने की कोशिश करते हैं। साथ ही, यह जानकर कि अल्लाह हमारे सामने वाली हर मुश्किल और हर परेशानी से बाख़बर है, हमें सुकून और इत्मिनान मिलता है। वह हमारी कमज़ोरियों को जानता है, हमारी मजबूरियों को समझता है, और अपनी रहमत से हम पर नज़र रखता है।
यह आयत हमें अल्लाह के सामने अपनी निहायत कमज़ोरी और उसकी बेपनाह क़ुदरत का एहसास कराती है। हम जितना भी इल्म हासिल कर लें, उसकी ज़ात और उसके इल्म के मुक़ाबले हमारा इल्म कुछ भी नहीं। इसलिए हमें अपने इल्म पर घमंड नहीं करना चाहिए, बल्कि अल्लाह की तरफ़ झुकना चाहिए, उससे दुआ करनी चाहिए कि वह हमें सीधी राह दिखाए और उसके दीन की समझ अता फ़रमाए। यही इंसान की कामयाबी है — कि वह अपने रब को पहचाने, उसके सामने अपनी लाचारी का इज़हार करे, और उसकी रहमत और मग़फ़िरत का तालिब बने।
📜 आयत 108-112 — ताहा
अनुवाद — ताहा 110
सूरा ताहा आयत 110 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ग़रज़ सब कुछ) वह जानता है और ये लोग अपने…सूरा आयत 110/135 — ताहा طه (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: ताहा सुनें, ताहा अनुवाद, ताहा mp3, ताहा pdf. आयत 108–112. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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