अल-अंबिया · 64/112
अनुवाद उच्चारण — अल-अंबिया
فَرَجَعُوا إِلَىٰ أَنفُسِهِمْ فَقَالُوا إِنَّكُمْ أَنتُمُ الظَّالِمُونَ ۝٦٤
Faraja`ooo ilaaa anfusihim faqaalooo innakum antumuz zaalimoon
📖 हिंदी अर्थ
इस पर उन लोगों ने अपने जी में सोचा तो (एक दूसरे से) कहने लगे बेशक तुम ही लोग खुद बर सरे नाहक़ हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَرَجَعُوا إِلَىٰ أَنفُسِهِمْ: वे अपने मन-मस्तिष्क में लौटे, अर्थात उन्होंने अपनी अक्ल और समझ से काम लिया।
  • الظَّالِمُونَ: अत्याचारी, जो हद से बढ़कर ज़ुल्म करते हैं (यहाँ अर्थ: अपनी आत्मा पर ज़ुल्म करने वाले, क्योंकि उन्होंने अल्लाह के सिवा दूसरों की इबादत की)।

तफसीर (व्याख्या):

जब हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम के बुतों को तोड़ दिया, तो उनकी क़ौम के लोग पहले ग़ुस्से में आए और इब्राहीम को दोषी ठहराने लगे। लेकिन फिर अल्लाह ने उनके दिलों में विचार और चिंतन पैदा किया, और वे अपने ही मन में लौटकर सोचने लगे। उन्होंने अपनी अक्ल से काम लिया और अपने ज़मीर से पूछा कि आख़िर ये बुत जो न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं, न किसी को नुक़सान पहुँचा सकते हैं और न फ़ायदा, क्या ये इबादत के लायक़ हैं? इसी दौरान उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने एक-दूसरे से कहा: "बेशक तुम ही ज़ालिम हो।" यानी उन्होंने अपने ऊपर ज़ुल्म का इक़रार किया, क्योंकि उन्होंने अल्लाह को छोड़कर ऐसी चीज़ों की पूजा की जो न तो कोई फ़ायदा दे सकती हैं और न नुक़सान।

यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को चाहिए कि वह अपनी अक्ल और फ़ितरत की तरफ़ लौटे। जब इंसान सच्चे दिल से सोचता है, तो उसे सच्चाई नज़र आ जाती है। यही वजह है कि इस्लाम हमें तफ़क्कुर (चिंतन) और तदब्बुर (ग़ौर-फ़िक्र) की तालीम देता है। अल्लाह ने इंसान को अक्ल दी है ताकि वह सही और ग़लत में फ़र्क़ कर सके। जो लोग बुतों या किसी और चीज़ की इबादत करते हैं, वह दरअसल अपनी ही आत्मा पर ज़ुल्म करते हैं, क्योंकि वे अपनी फ़ितरत के ख़िलाफ़ जाकर ऐसी चीज़ों के आगे झुकते हैं जो उन्हें अल्लाह से दूर कर देती हैं।

यह आयत हमारे लिए एक प्यारा पैग़ाम रखती है: जब भी इंसान से कोई ग़लती हो जाए, तो उसे चाहिए कि वह अपने दिल की तरफ़ लौटे, अपनी अक्ल से काम ले और सच्चाई को क़बूल करे। अल्लाह उन लोगों को बहुत पसंद करता है जो अपनी ग़लती पर पछतावा करके सच्चाई की तरफ़ लौट आते हैं। इस्लाम दिलों की सफ़ाई और सच्चाई की तरफ़ लौटने का दीन है। जो इंसान अपने रब की इबादत करता है, वह कभी ज़ालिम नहीं होता, बल्कि वह अपनी आत्मा को ज़ुल्म से बचाकर सच्ची कामयाबी हासिल करता है।



📜 आयत 62-66 — अल-अंबिया

62قَالُوا أَأَنتَ فَعَلْتَ هَٰذَا بِآلِهَتِنَا يَا إِبْرَاهِيمُ
(ग़रज़ इबराहीम आए) और लोगों ने उनसे पूछा कि क्यों इबराहीम क्या तुमने माबूदों के साथ ये हरकत की है
63قَالَ بَلْ فَعَلَهُ كَبِيرُهُمْ هَٰذَا فَاسْأَلُوهُمْ إِن كَانُوا يَنطِقُونَ
इबराहीम ने कहा बल्कि ये हरकत इन बुतों (खुदाओं) के बड़े (खुदा) ने की है तो अगर ये बुत बोल सकते हों तो उनही से पूछ देखो
64فَرَجَعُوا إِلَىٰ أَنفُسِهِمْ فَقَالُوا إِنَّكُمْ أَنتُمُ الظَّالِمُونَ
इस पर उन लोगों ने अपने जी में सोचा तो (एक दूसरे से) कहने लगे बेशक तुम ही लोग खुद बर सरे नाहक़ हो
65ثُمَّ نُكِسُوا عَلَىٰ رُءُوسِهِمْ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا هَٰؤُلَاءِ يَنطِقُونَ
फिर उन लोगों के सर इसी गुमराही में झुका दिए गए (और तो कुछ बन न पड़ा मगर ये बोले) तुमको तो अच्छी तरह मालूम है कि ये बुत बोला नहीं करते
66قَالَ أَفَتَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنفَعُكُمْ شَيْئًا وَلَا يَضُرُّكُمْ
(फिर इनसे क्या पूछे) इबराहीम ने कहा तो क्या तुम लोग खुदा को छोड़कर ऐसी चीज़ों की परसतिश करते हो जो न तुम्हें कुछ नफा ही पहुँचा सकती है और न तुम्हारा कुछ नुक़सान ही कर सकती है
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अनुवाद — अल-अंबिया 64

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Tuesday, August 18, 2026

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