Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- فَرَجَعُوا إِلَىٰ أَنفُسِهِمْ: वे अपने मन-मस्तिष्क में लौटे, अर्थात उन्होंने अपनी अक्ल और समझ से काम लिया।
- الظَّالِمُونَ: अत्याचारी, जो हद से बढ़कर ज़ुल्म करते हैं (यहाँ अर्थ: अपनी आत्मा पर ज़ुल्म करने वाले, क्योंकि उन्होंने अल्लाह के सिवा दूसरों की इबादत की)।
तफसीर (व्याख्या):
जब हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम के बुतों को तोड़ दिया, तो उनकी क़ौम के लोग पहले ग़ुस्से में आए और इब्राहीम को दोषी ठहराने लगे। लेकिन फिर अल्लाह ने उनके दिलों में विचार और चिंतन पैदा किया, और वे अपने ही मन में लौटकर सोचने लगे। उन्होंने अपनी अक्ल से काम लिया और अपने ज़मीर से पूछा कि आख़िर ये बुत जो न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं, न किसी को नुक़सान पहुँचा सकते हैं और न फ़ायदा, क्या ये इबादत के लायक़ हैं? इसी दौरान उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ और उन्होंने एक-दूसरे से कहा: "बेशक तुम ही ज़ालिम हो।" यानी उन्होंने अपने ऊपर ज़ुल्म का इक़रार किया, क्योंकि उन्होंने अल्लाह को छोड़कर ऐसी चीज़ों की पूजा की जो न तो कोई फ़ायदा दे सकती हैं और न नुक़सान।
यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को चाहिए कि वह अपनी अक्ल और फ़ितरत की तरफ़ लौटे। जब इंसान सच्चे दिल से सोचता है, तो उसे सच्चाई नज़र आ जाती है। यही वजह है कि इस्लाम हमें तफ़क्कुर (चिंतन) और तदब्बुर (ग़ौर-फ़िक्र) की तालीम देता है। अल्लाह ने इंसान को अक्ल दी है ताकि वह सही और ग़लत में फ़र्क़ कर सके। जो लोग बुतों या किसी और चीज़ की इबादत करते हैं, वह दरअसल अपनी ही आत्मा पर ज़ुल्म करते हैं, क्योंकि वे अपनी फ़ितरत के ख़िलाफ़ जाकर ऐसी चीज़ों के आगे झुकते हैं जो उन्हें अल्लाह से दूर कर देती हैं।
यह आयत हमारे लिए एक प्यारा पैग़ाम रखती है: जब भी इंसान से कोई ग़लती हो जाए, तो उसे चाहिए कि वह अपने दिल की तरफ़ लौटे, अपनी अक्ल से काम ले और सच्चाई को क़बूल करे। अल्लाह उन लोगों को बहुत पसंद करता है जो अपनी ग़लती पर पछतावा करके सच्चाई की तरफ़ लौट आते हैं। इस्लाम दिलों की सफ़ाई और सच्चाई की तरफ़ लौटने का दीन है। जो इंसान अपने रब की इबादत करता है, वह कभी ज़ालिम नहीं होता, बल्कि वह अपनी आत्मा को ज़ुल्म से बचाकर सच्ची कामयाबी हासिल करता है।
📜 आयत 62-66 — सूरा अल-अंबिया
अनुवाद — अल-अंबिया 64
सूरा अल-अंबिया आयत 64 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : इस पर उन लोगों ने अपने जी में सोचा तो…सूरा आयत 64/112 — सूरा अल-अंबिया الأنبياء (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-अंबिया सुनें, सूरा अल-अंबिया अनुवाद, सूरा अल-अंबिया mp3, सूरा अल-अंबिया pdf. आयत 62–66. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-अंबिया
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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