अल-हज · 46/78
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हज
أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَتَكُونَ لَهُمْ قُلُوبٌ يَعْقِلُونَ بِهَا أَوْ آذَانٌ يَسْمَعُونَ بِهَا ۖ فَإِنَّهَا لَا تَعْمَى الْأَبْصَارُ وَلَٰكِن تَعْمَى الْقُلُوبُ الَّتِي فِي الصُّدُورِ ۝٤٦
Afalam yaseeroo fil ardi fatakoona lahum quloobuny ya`qiloona bihaaa aw aazaanuny yasm`oona bihaa fa innahaa laa ta`mal absaaru wa laakin ta`mal quloobul latee fissudoor
📖 हिंदी अर्थ
क्या ये लोग रूए ज़मीन पर चले फिरे नहीं ताकि उनके लिए ऐसे दिल होते हैं जैसे हक़ बातों को समझते या उनके ऐसे कान होते जिनके ज़रिए से (सच्ची बातों को) सुनते क्योंकि ऑंखें अंधी नहीं हुआ करती बल्कि दिल जो सीने में है वही अन्धे हो जाया करते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَسِيرُوا – चलें-फिरें, यात्रा करें
  • يَعْقِلُونَ – समझें, विचार करें
  • تَعْمَى – अंधी हो जाती है
  • الْأَبْصَارُ – आँखें (देखने की शक्ति)
  • الْقُلُوبُ – दिल (समझने और विचार करने की जगह)

तफ़सीर (व्याख्या):

क्या ये मक्का के इनकार करने वाले लोग धरती पर चलते-फिरते नहीं हैं? क्या वे उन बस्तियों के खंडहरों को नहीं देखते जो उनसे पहले गुज़री हुई क़ौमों के हैं? वे क़ौमें जिन्होंने अपने नबियों को झुठलाया और अल्लाह के आदेशों की अवहेलना की, और अंततः अल्लाह के अज़ाब का शिकार होकर तबाह हो गईं। क्या उनके पास ऐसे दिल नहीं हैं जिनसे वे सोच-समझकर सीख लें? क्या उनके पास ऐसे कान नहीं हैं जिनसे वे उन क़ौमों की दास्तानें सुनकर सबक़ हासिल करें?

यहाँ अल्लाह तआला हमें बताता है कि असली अंधापन आँखों का अंधापन नहीं है, बल्कि असली अंधापन दिलों का अंधापन है। आँखें तो देखती हैं, लेकिन अगर दिल में समझ और विचार की शक्ति न हो, तो देखना बेकार है। बहुत से लोग अपनी आँखों से सब कुछ देखते हैं, लेकिन उनके दिल अंधे होते हैं – वे न तो अल्लाह की निशानियों से सबक़ लेते हैं, न ही सच्चाई को पहचान पाते हैं।

यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारी आँखें खुली हैं या बंद? हमारे दिल ज़िंदा हैं या मुर्दा? क्या हम उन लोगों की तरह हैं जो दुनिया की सैर करते हैं, लेकिन उनसे कोई सबक़ नहीं लेते? या फिर हम उन लोगों में से हैं जो हर निशानी में अल्लाह की क़ुदरत देखते हैं और अपने ईमान को मज़बूत करते हैं?

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बुलाती है कि हम अपनी आँखों से नहीं, बल्कि अपने दिलों से देखें। हर जगह अल्लाह की निशानियाँ बिखरी पड़ी हैं – पहाड़ों में, समुद्रों में, आसमान और ज़मीन की बनावट में, और इतिहास के पन्नों में। जो लोग इन निशानियों से सबक़ लेते हैं, वही सच्चे ईमान वाले हैं। अल्लाह हमें दिल की आँखें खोलने की तौफ़ीक़ दे, आमीन।



📜 आयत 44-48 — सूरा अल-हज

44وَأَصْحَابُ مَدْيَنَ ۖ وَكُذِّبَ مُوسَىٰ فَأَمْلَيْتُ لِلْكَافِرِينَ ثُمَّ أَخَذْتُهُمْ ۖ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ
और मदियन के रहने वाले (अपने-अपने पैग़म्बरों को) झुठला चुके हैं और मूसा (भी) झुठलाए जा चुके हैं तो मैंने काफिरों को चन्द ढील दे दी फिर (आख़िर) उन्हें ले डाला तो तुमने देखा मेरा अज़ाब कैसा था
45فَكَأَيِّن مِّن قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا وَهِيَ ظَالِمَةٌ فَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا وَبِئْرٍ مُّعَطَّلَةٍ وَقَصْرٍ مَّشِيدٍ
ग़रज़ कितनी बस्तियाँ हैं कि हम ने उन्हें बरबाद कर दिया और वह सरकश थीं पस वह अपनी छतों पर ढही पड़ी हैं और कितने बेकार (उजडे क़ुएँ और कितने) मज़बूत बड़े-बड़े ऊँचे महल (वीरान हो गए)
46أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَتَكُونَ لَهُمْ قُلُوبٌ يَعْقِلُونَ بِهَا أَوْ آذَانٌ يَسْمَعُونَ بِهَا ۖ فَإِنَّهَا لَا تَعْمَى الْأَبْصَارُ وَلَٰكِن تَعْمَى الْقُلُوبُ الَّتِي فِي الصُّدُورِ
क्या ये लोग रूए ज़मीन पर चले फिरे नहीं ताकि उनके लिए ऐसे दिल होते हैं जैसे हक़ बातों को समझते या उनके ऐसे कान होते जिनके ज़रिए से (सच्ची बातों को) सुनते क्योंकि ऑंखें अंधी नहीं हुआ करती बल्कि दिल जो सीने में है वही अन्धे हो जाया करते हैं
47وَيَسْتَعْجِلُونَكَ بِالْعَذَابِ وَلَن يُخْلِفَ اللَّهُ وَعْدَهُ ۚ وَإِنَّ يَوْمًا عِندَ رَبِّكَ كَأَلْفِ سَنَةٍ مِّمَّا تَعُدُّونَ
और (ऐ रसूल) तुम से ये लोग अज़ाब के जल्द आने की तमन्ना रखते हैं और खुदा तो हरगिज़ अपने वायदे के ख़िलाफ नहीं करेगा और बेशक (क़यामत का) एक दिन तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक तुम्हारी गिनती के हिसाब से एक हज़ार बरस के बराबर है
48وَكَأَيِّن مِّن قَرْيَةٍ أَمْلَيْتُ لَهَا وَهِيَ ظَالِمَةٌ ثُمَّ أَخَذْتُهَا وَإِلَيَّ الْمَصِيرُ
और कितनी बस्तियाँ हैं कि मैंने उन्हें (चन्द) मोहलत दी हालाँकि वह सरकश थी फिर (आख़िर) मैंने उन्हें ले डाला और (सबको) मेरी तरफ लौटना है
अल-हजकुरान सूची
78आयत
मदनीअवतरण स्थान
46आयत

अनुवाद — अल-हज 46

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Wednesday, September 30, 2026

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