अल-मोमिनुन · 38/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا وَمَا نَحْنُ لَهُ بِمُؤْمِنِينَ ۝٣٨
In huwa illaa rajulunif taraa `alal laahi kazibanw wa maa nahnuu lahoo bimu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
और हम तो कभी उस पर ईमान लाने वाले नहीं (ये हालत देखकर) सालेह ने दुआ की ऐ मेरे पालने वाले चूँकि इन लोगों ने मुझे झुठला दिया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ – यह तो बस एक आदमी है।
  • افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا – उसने अल्लाह पर झूठ गढ़ा है।
  • وَمَا نَحْنُ لَهُ بِمُؤْمِنِينَ – और हम उसे मानने वाले नहीं हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन काफ़िरों के कथन को बयान कर रही है, जिन्होंने अपने नबी (हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम) के पैग़ाम को ठुकराते हुए कहा था: "यह शख्स जो हमें ईमान की दावत देता है, कोई और नहीं बल्कि एक साधारण आदमी है जिसने अल्लाह पर झूठ गढ़ा है। उसका दावा कि वह अल्लाह का रसूल है, महज़ एक झूठ है। और हम तो उसकी किसी भी बात को सच नहीं मानते, न ही उस पर ईमान लाते हैं।"

यह वही अंधी सोच और हठधर्मिता है जो हर ज़माने के काफ़िरों ने अपने नबियों के साथ की। उन्होंने सच्चाई को सुनने और समझने की कोशिश ही नहीं की, बल्कि पहले से ही इनकार का फैसला कर लिया। उनका कहना था कि यह आदमी हमारी तरह ही इंसान है, फिर उसे नबूवत कैसे मिल सकती है? और उन्होंने उसके पैग़ाम को झूठ कहकर खारिज कर दिया, बिना किसी दलील के।

दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई को कभी भी इसलिए नकारना नहीं चाहिए कि वह किसी इंसान के ज़रिए आई है। नबियों की नबूवत का सबूत उनके चरित्र, उनकी शिक्षाओं और अल्लाह की तरफ से दिए गए चमत्कारों में होता है। जो लोग सच्चाई से मुँह मोड़ते हैं, वे अक्सर बहाने बनाते हैं और दूसरों पर झूठे इलज़ाम लगाते हैं। लेकिन अल्लाह का रास्ता साफ़ है — जो सच्चे दिल से तलाश करता है, उसे हिदायत ज़रूर मिलती है। हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को अहंकार और पूर्वाग्रह से पाक रखें, और हर सच्ची दावत को खुले दिमाग़ से परखें। याद रखें, अल्लाह ने जिन्हें नबूवत दी, उनकी सच्चाई के निशान उनके अख़लाक़ और उनके पैग़ाम में साफ़ दिखते हैं। काश! ये लोग अपनी ज़िद छोड़कर सोचते, तो ईमान की नेमत उन्हें भी मिलती।



📜 आयत 36-40 — अल-मोमिनुन

36۞ هَيْهَاتَ هَيْهَاتَ لِمَا تُوعَدُونَ
बिल्कुल (अक्ल से) दूर और क़यास से बईद है (दो बार ज़िन्दा होना कैसा) बस यही तुम्हारी दुनिया की ज़िन्दगी है
37إِنْ هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ
कि हम मरते भी हैं और जीते भी हैं और हम तो फिर (दुबारा) उठाए नहीं जाएँगे हो न हो ये (सालेह) वह शख्स है जिसने खुदा पर झूठ मूठ बोहतान बाँधा है
38إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا وَمَا نَحْنُ لَهُ بِمُؤْمِنِينَ
और हम तो कभी उस पर ईमान लाने वाले नहीं (ये हालत देखकर) सालेह ने दुआ की ऐ मेरे पालने वाले चूँकि इन लोगों ने मुझे झुठला दिया
39قَالَ رَبِّ انصُرْنِي بِمَا كَذَّبُونِ
तू मेरी मदद कर ख़ुदा ने फरमाया (एक ज़रा ठहर जाओ)
40قَالَ عَمَّا قَلِيلٍ لَّيُصْبِحُنَّ نَادِمِينَ
अनक़रीब ही ये लोग नादिम व परेशान हो जाएँगे
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 38

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Tuesday, August 18, 2026

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