अल-मोमिनुन · 56/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
نُسَارِعُ لَهُمْ فِي الْخَيْرَاتِ ۚ بَل لَّا يَشْعُرُونَ ۝٥٦
Nusaari`u lahum fil khairaat; bal laa yash`uroon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐसा नहीं) बल्कि ये लोग समझते नहीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نُسَارِعُ لَهُمْ فِي الْخَيْرَاتِ: हम उनके लिए भलाइयों में जल्दी करते हैं, यानी उन्हें खूब नेमतें और सुख-सुविधाएँ देते हैं।
  • بَل لَّا يَشْعُرُونَ: बल्कि वे महसूस नहीं करते कि यह उनके लिए परीक्षा और धीरे-धीरे पकड़ का ज़रिया है।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन काफिरों और ग़ाफिल लोगों के बारे में है जो दुनिया की नेमतों और ऐश-ओ-आराम को देखकर यह समझ बैठते हैं कि यह अल्लाह की उन पर मेहरबानी और उनकी अच्छाई का इनाम है। वे सोचते हैं कि जो कुछ उन्हें मिल रहा है—धन, संतान, सुख-सुविधाएँ—यह इस बात का सबूत है कि अल्लाह उनसे राज़ी है। लेकिन अल्लाह तआला फ़रमाता है: "नहीं, ऐसा नहीं है! हम उन्हें यह सब कुछ इसलिए दे रहे हैं ताकि उन्हें धीरे-धीरे पकड़ें और उनकी परीक्षा लें।" यह एक तरह का इस्तिदराज (استدراج) है, यानी अल्लाह उन्हें नेमतें देता रहता है, और वे गुमान में डूबे रहते हैं, यहाँ तक कि जब अज़ाब आता है तो वे अचानक पकड़ लिए जाते हैं।

वे लोग यह नहीं समझते कि यह दुनिया की चीज़ें उनके लिए रहमत नहीं, बल्कि उनकी सरकशी और ग़फलत की वजह से उन्हें मोहलत दी जा रही है। अगर वे अक्ल से काम लेते, तो समझ जाते कि यह सब कुछ उन्हें धोखे में डालने के लिए है, न कि उनकी इज़्ज़त के लिए।

दावती पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें एक बहुत बड़ी हक़ीक़त से आगाह करती है। दुनिया की नेमतें और सुख-सुविधाएँ हमेशा अल्लाह की रज़ामंदी की निशानी नहीं होतीं। कई बार अल्लाह किसी को दुनिया देकर आख़िरत में उसके हिस्से की भलाई छीन लेता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम नेमतों को देखकर अल्लाह के शुक्रगुज़ार बनें और उसकी इबादत में लगे रहें, न कि उन नेमतों पर इतराएँ और अल्लाह से दूर हो जाएँ। याद रखिए, अल्लाह की राह में खर्च करना, भलाई के कामों में जल्दी करना और उसकी रज़ा के लिए जीना ही असली कामयाबी है। दुनिया की चमक-दमक को अपने दिल में जगह न दें, क्योंकि यह एक इम्तिहान है, और जो लोग इस इम्तिहान में कामयाब हो जाते हैं, उनके लिए आख़िरत में ऐसी नेमतें हैं जो कभी ख़त्म नहीं होंगी। अल्लाह हमें सच्ची समझ और अमल की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 54-58 — अल-मोमिनुन

54فَذَرْهُمْ فِي غَمْرَتِهِمْ حَتَّىٰ حِينٍ
तो (ऐ रसूल) तुम उन लोगों को उन की ग़फलत में एक ख़ास वक्त तक (पड़ा) छोड़ दो
55أَيَحْسَبُونَ أَنَّمَا نُمِدُّهُم بِهِ مِن مَّالٍ وَبَنِينَ
क्या ये लोग ये ख्याल करते है कि हम जो उन्हें माल और औलाद में तरक्क़ी दे रहे है तो हम उनके साथ भलाईयाँ करने में जल्दी कर रहे है
56نُسَارِعُ لَهُمْ فِي الْخَيْرَاتِ ۚ بَل لَّا يَشْعُرُونَ
(ऐसा नहीं) बल्कि ये लोग समझते नहीं
57إِنَّ الَّذِينَ هُم مِّنْ خَشْيَةِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
उसमें शक नहीं कि जो लोग अपने परवरदिगार की वहशत से लरज़ रहे है
58وَالَّذِينَ هُم بِآيَاتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ
और जो लोग अपने परवरदिगार की (क़ुदरत की) निशानियों पर ईमान रखते हैं
अल-मोमिनुनकुरान सूची
118आयत
मक्कीRevelation
56आयत

अनुवाद — अल-मोमिनुन 56

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Tuesday, August 18, 2026

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