अल-फुरकान · 38/77
अनुवाद उच्चारण — अल-फुरकान
وَعَادًا وَثَمُودَ وَأَصْحَابَ الرَّسِّ وَقُرُونًا بَيْنَ ذَٰلِكَ كَثِيرًا ۝٣٨
Wa `Aadanw Samooda wa As haabar Rassi wa quroonam baina zaalika kaseeraa
📖 हिंदी अर्थ
और (इसी तरह) आद और समूद और नहर वालों और उनके दरमियान में बहुत सी जमाअतों को (हमने हलाक कर डाला)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अस्हाबुर-रस्स: "रस्स" का अर्थ है कुआँ। यह उस कौम की ओर इशारा है जो एक कुएँ के पास रहती थी और अल्लाह के नबी को झुठलाने के कारण हलाक कर दी गई।
  • क़ुरून: बहुत सी उम्मतें या पीढ़ियाँ।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में अपनी उन नेमतों और इबरतों (सबक) को याद दिला रहा है जो उसने पिछली उम्मतों के साथ कीं। वह फ़रमाता है कि हमने आद को हलाक किया, जो हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की कौम थी, और समूद को, जो हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की कौम थी। इन दोनों कौमों ने अपने-अपने नबियों को झुठलाया और सरकशी की, तो अल्लाह ने उन्हें अपने अज़ाब से पकड़ लिया।

इसके अलावा, अल्लाह ने अस्हाबुर-रस्स (कुएँ वालों) को भी हलाक किया। ये वे लोग थे जो एक कुएँ के पास रहते थे और बुतों (मूर्तियों) की पूजा करते थे। उनके पास एक नबी आए, लेकिन उन्होंने उन्हें झुठलाया और यहाँ तक कि उन्हें कुएँ में डाल दिया या शहीद कर दिया। नतीजा यह हुआ कि अल्लाह का अज़ाब उन पर नाज़िल हुआ, उनके घर और माल तबाह हो गए और उनका कुआँ भी ढह गया।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: "और हमने उनके बीच बहुत सी उम्मतों को हलाक किया" — यानी आद, समूद और अस्हाबुर-रस्स के अलावा भी कई कौमें थीं जो इन्हीं के दौर में या इनके बीच में गुज़रीं। उन्होंने भी अल्लाह के रसूलों को झुठलाया और अल्लाह ने उन्हें भी हलाक कर दिया। इनकी तादाद और इनके हालात को सिर्फ़ अल्लाह ही जानता है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें बहुत बड़ा सबक देती है। अल्लाह तआला ने जब भी किसी कौम को हलाक किया, उसका सबब यही था कि उन्होंने अल्लाह के नबियों को झुठलाया और हक़ (सच्चाई) को क़बूल करने से इनकार किया। यह हमारे लिए चेतावनी है कि हम अल्लाह के दीन को अपनाएँ, अपने नबी मुहम्मद ﷺ की लाई हुई राह पर चलें और उन लोगों की तरह न बनें जिन्होंने हक़ को नकारा और अल्लाह के अज़ाब का शिकार हुए।

साथ ही, यह आयत अल्लाह की रहमत की तरफ़ भी इशारा करती है कि उसने हमें ये क़िस्से सुनाए ताकि हम इबरत हासिल करें और अपनी ज़िंदगी को सही रास्ते पर लगाएँ। अल्लाह ने हम पर बड़ा एहसान किया है कि हमें आख़िरी नबी ﷺ की उम्मत बनाया, और उसकी किताब (क़ुरआन) हमारे पास महफ़ूज़ है। हमें चाहिए कि इस नेमत की क़द्र करें, क़ुरआन को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें। यही हमारी कामयाबी और निजात का ज़रिया है — दुनिया में भी और आख़िरत में भी।



📜 आयत 36-40 — अल-फुरकान

36فَقُلْنَا اذْهَبَا إِلَى الْقَوْمِ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا فَدَمَّرْنَاهُمْ تَدْمِيرًا
तो हमने कहा तुम दोनों उन लोगों के पास जा जो हमारी (कुदरत की) निशानियों को झुठलाते हैं जाओ (और समझाओ जब न माने) तो हमने उन्हें खूब बरबाद कर डाला
37وَقَوْمَ نُوحٍ لَّمَّا كَذَّبُوا الرُّسُلَ أَغْرَقْنَاهُمْ وَجَعَلْنَاهُمْ لِلنَّاسِ آيَةً ۖ وَأَعْتَدْنَا لِلظَّالِمِينَ عَذَابًا أَلِيمًا
और नूह की क़ौम को जब उन लोगों ने (हमारे) पैग़म्बरों को झुठलाया तो हमने उन्हें डुबो दिया और हमने उनको लोगों (के हैरत) की निशानी बनाया और हमने ज़ालिमों के वास्ते दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है
38وَعَادًا وَثَمُودَ وَأَصْحَابَ الرَّسِّ وَقُرُونًا بَيْنَ ذَٰلِكَ كَثِيرًا
और (इसी तरह) आद और समूद और नहर वालों और उनके दरमियान में बहुत सी जमाअतों को (हमने हलाक कर डाला)
39وَكُلًّا ضَرَبْنَا لَهُ الْأَمْثَالَ ۖ وَكُلًّا تَبَّرْنَا تَتْبِيرًا
और हमने हर एक से मिसालें बयान कर दी थीं और (खूब समझाया) मगर न माना
40وَلَقَدْ أَتَوْا عَلَى الْقَرْيَةِ الَّتِي أُمْطِرَتْ مَطَرَ السَّوْءِ ۚ أَفَلَمْ يَكُونُوا يَرَوْنَهَا ۚ بَلْ كَانُوا لَا يَرْجُونَ نُشُورًا
हमने उनको ख़ूब सत्यानास कर छोड़ा और ये लोग (कुफ्फ़ारे मक्का) उस बस्ती पर (हो) आए हैं जिस पर (पत्थरों की) बुरी बारिश बरसाई गयी तो क्या उन लोगों ने इसको देखा न होगा मगर (बात ये है कि) ये लोग मरने के बाद जी उठने की उम्मीद नहीं रखते (फिर क्यों ईमान लाएँ)
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अनुवाद — अल-फुरकान 38

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Tuesday, August 18, 2026

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